राजस्थान की राजनीति एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां सत्ता से ज्यादा महत्व गुटों का, मुद्दों से ज्यादा अहमियत व्यक्तिगत समीकरणों की और जनता से ज्यादा चिंता नेतृत्व की कुर्सियों की हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले के बाद अरावली जैसे संवेदनशील और व्यापक जनहित के मुद्दे ने राजनीति की इस सच्चाई को और नंगा कर दिया है कि आज राजस्थान कांग्रेस ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी भाजपा भी अंदरखाने गंभीर गुटबाजी से जूझ रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि कांग्रेस में यह गुटबाजी खुलकर सड़कों पर दिखाई देती है, जबकि भाजपा में यह संगठनात्मक अनुशासन की परत के नीचे दबाई जाती है, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं होती।
अरावली पर्वतमाला को लेकर कांग्रेस के भीतर जो तस्वीर उभरी, वह बेहद विरोधाभासी रही। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस मुद्दे पर जिस तरह का रुख अपनाया, उसने पार्टी संगठन को असहज कर दिया। गहलोत ने खुद को पार्टी से अलग रखकर सोशल मीडिया पर अरावली बचाओ अभियान छेड़ दिया। उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि पर्यावरण और जनहित की लड़ाई में वही कांग्रेस का असली चेहरा हैं, और यहीं से टकराव शुरू हो गया। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने पार्टी लाइन पर चलते हुए अलवर से अरावली बचाने के अलग अभियान की शुरुआत कर दी। यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि एक ही पार्टी, एक ही मुद्दा और दो अलग-अलग राजनीतिक मंच आखिर किस कमजोरी की ओर इशारा कर रहे हैं।
इस पूरी बहस में सबसे ज्यादा चर्चा सचिन पायलट की चुप्पी को लेकर हुई। गहलोत सरकार के खिलाफ युवाओं के बहाने सीएम की सीट पाने के लिए अनशन किया, धरना दिया और अजमेर से जयपुर की 5 दिनी यात्रा निकालकर 15 मई 2022 को आरपार के आंदोलन की हूंकार भरी, लेकिन उसके बाद आंदोलनकारी नीति से लगातार नेपथ्य में जा रहे हैं। पायलट से यह उम्मीद थी कि वे कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव होने के नाते सरकार के खिलाफ तीखा और आक्रामक रुख अपनाएंगे, उन्होंने कुछ ट्वीट्स तक खुद को सीमित रखा। न कोई धरना, न कोई स्पष्ट राजनीतिक लाइन और न ही आंदोलन किया। यही वजह है कि राजस्थान में पायलट की निष्क्रियता पर सवाल उठने लगे। बीते दो साल में सचिन पायलट ने जैसे खुद को दिल्ली में समेट लिया है। विपक्ष में होने के बावजूद जनता के मुद्दों को लेकर जयपुर में उनकी निष्क्रियता सवालों के घेरे में आ रही है। अरावली क्षेत्र से आने वाले कांग्रेस नेताओं की खामोशी ने यह संकेत दिया कि पार्टी के भीतर न तो लीडरशिप को लेकर स्पष्टता है और न ही साझा रणनीति। गहलोत ने शुरुआत में सरकार को घेरने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही भाजपा ने गहलोत की पहली सरकार के दौरान तय की गई अरावली की परिभाषा का हवाला दिया तो वे बैकफुट पर चले गए। यह वही पल था, जिसने कांग्रेस की राजनीतिक धार को कुंद कर दिया।
गहलोत खुद को लगातार पार्टी का वफादार सिपाही और गांंधी परिवार का विश्वासपात्र बताने की कोशिशें करते रहते हैं, लेकिन कांग्रेस में उनकी स्थिति अब धुंधली पड़ती दिखाई दे रही है। गहलोत की इस स्थिति को समझने के लिए 25 सितंबर 2022 की घटना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उस दिन राजस्थान में गहलोत सर्मथक विधायकों की बगावत ने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी में डाल दिया था। इसके बाद से यह साफ दिखाई देने लगा कि गांधी परिवार का भरोसा अशोक गहलोत पर पहले जैसा नहीं रहा। यही कारण है कि गहलोत लगातार अपने हर राजनीतिक कदम को गांधी परिवार से जोड़कर पेश करते हैं और सार्वजनिक रूप से राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी का नाम लेकर अपनी निष्ठा साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन राजनीति में भरोसा शब्दों से नहीं, परिस्थितियों और फैसलों से बनता है, और यही वह जगह है जहाँ कांग्रेस कमजोर दिखाई दे रही है। दूसरी ओर, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी भी गुटबाजी से अछूती नहीं है। भले ही मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा केंद्र नेतृत्व की पसंद हों और उनके अनुसार ही काम कर रहे हों, लेकिन यह मान लेना कि भाजपा पूरी तरह एकजुट है, सच्चाई से मुंह मोड़ने जैसा होगा। पार्टी में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, कुछ पूर्व प्रदेश अध्यक्षों, पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ जैसे कई नेता हैं, जो अपने-अपने भविष्य की फील्डिंग करते दिखाई देते हैं। सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिलने से अंदरखाने असंतोष लगातार उबल रहा है। सोशल मीडिया रील्स की बीमारी ने भाजपा के कई बड़े नेताओं को सियासी तौर पर काफी सीमित कर दिया है।
कभी पेपर लीक और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर मुखर रहने वाले किरोड़ीलाल मीणा को जिस तरह चुप कराया गया, वह भी भाजपा की आंतरिक राजनीति का उदाहरण है। अब उनके हर बयान और कदम सरकार के साथ खड़े नजर आते हैं। इससे यह संकेत जाता है कि भाजपा में विरोध की गुंजाइश सीमित है, लेकिन असंतोष खत्म नहीं हुआ है। वसुंधरा राजे का खेमा एक बार फिर सक्रिय होता दिखाई दे रहा है और यह माना जा रहा है कि यदि केंद्र नेतृत्व से हरी झंडी मिली, तो यह खेमा खुलकर ताकत दिखाने से पीछे नहीं हटेगा। राजस्थान की राजनीति में यह पहली बार नहीं है जब सत्ता और विपक्ष दोनों गुटों में बंटी हुई दिख रही हों। लेकिन इस बार अंतर यह है कि मुद्दे बेहद गंभीर हैं। अरावली सिर्फ पर्यावरण का सवाल नहीं है, यह पानी, हवा, खेती और भविष्य की पीढ़ियों का सवाल है। ऐसे में जब कांग्रेस अपने ही नेताओं के बीच तालमेल नहीं बिठा पा रही और भाजपा में सत्ता के भीतर ही असंतोष पनप रहा है, तो नुकसान अंततः जनता का ही होता है।
तारीखें गवाह हैं कि जब-जब राजस्थान की राजनीति गुटबाजी में उलझी है, तब-तब बड़े फैसले या तो अधूरे रह गए या फिर जनविरोधी साबित हुए। 2022 की राजनीतिक उथल-पुथल, 2023 के चुनावी समीकरण और अब 2024–25 में अरावली को लेकर उठे सवाल, सब एक ही कहानी कहते हैं, राजनीति का केंद्र जनता से हटकर नेताओं की आपसी खींचतान बन चुका है। कांग्रेस में गहलोत, पायलट और संगठन के बीच की खाई लगातार चौड़ी हो रही है, जबकि भाजपा में सत्ता के आसपास रहने और बाहर रहने वालों के बीच अदृश्य संघर्ष जारी है। अंततः यह सवाल उठता है कि क्या राजस्थान की राजनीति कभी गुटों से ऊपर उठकर मुद्दों की राजनीति कर पाएगी। फिलहाल जो तस्वीर दिखाई दे रही है, उसमें कांग्रेस अपनी आंतरिक कलह से जूझती नजर आ रही है और भाजपा अपनी एकजुटता के दावे के बावजूद अंदरखाने अस्थिर है। अरावली का मुद्दा इस बात का प्रतीक बन गया है कि जब राजनीति में दिशा और नेतृत्व स्पष्ट न हो, तो सबसे अहम सवाल भी महज सत्ता की शतरंज में मोहरा बनकर रह जाते हैं। यही राजस्थान की राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है।
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