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वसुंधरा राजे की वापसी या परमानेंट विदाई?


राजस्थान की राजनीति में एक नाम है जो न चुप होता है, न थकता है, और न ही मिटता है। दो बार मुख्यमंत्री, तीन दशकों से राजस्थान BJP की धुरी, लेकिन आज 2026 में उस नाम के आगे एक सवाल लटक रहा है जो पहले कभी नहीं था। नाम है वसुंधसरा राजे और सवाल है क्या वसुंधरा राजे की राजनीतिक पारी खत्म होने वाली है? क्या जो जंग वो लड़ रही हैं अपनी ही सरकार से, दिल्ली में बैठे आलाकमान से, अपनी ही पार्टी के भीतर से, क्या वो जंग वसुंधरा जीत पाएंगी? या राजस्थान की सबसे ताकतवर महिला नेता की राजनीतिक विदाई का आगाज़ हो चुका है? आज हम इस सवाल को डिकोड करेंगे।

आगे बढ़ने से पहले वसुंधरा और राजस्थान बीजेपी का इतिहास समझ लेते हैं। वसुंधरा राजे वो नाम है, जिन्होंने BJP को उस राज्य में बहुमत के लिए खड़ा किया, जहाँ कभी कांग्रेस का एकछत्र राज था। सत्ता तो भाजपा ने दो बार पहले भी पाई थी, लेकिन लूली—लंगड़ी सरकार बनाकर बमुश्किल 8 साल शासन किया। वसुंधरा राजे 2003 में पहली बार मुख्यमंत्री बनीं, और ऐसे बनीं जैसे तूफान आता है। जनता ने BJP को 200 में से 120 सीटें दीं। इसके बाद 2008 में हारीं, लेकिन अपने ही साथी नेताओं की बेवफाई से सत्ताहीन हुईं। हालांकि, इसके बाद विपक्ष में रहकर भी पार्टी की रीढ़ बनी रहीं। कांग्रेस सरकारी नीति के चलते 2013 में फिर सत्ता में आईं, और इस बार 163 सीटों के प्रचंड़ बहुमत पर सवार होकर सीएम पद पर पहुंचीं। यह राजस्थान के इतिहास का सबसे बड़ा जनादेश था। इसके कारण वसुंधरा राजे का कद तब इतना बड़ा था कि दिल्ली में बैठे बड़े-बड़े नेता भी उनसे सीधे पंगा नहीं लेते थे, लेकिन 2018 में हारीं, और उस हार के बाद जो हुआ, वो वसुंधरा राजे की राजनीतिक ज़िंदगी का सबसे कठिन दौर था। सत्ता में होने के कारण हार का ठीकरा उनके सिर फूटना ही था। इस हार के बाद दिल्ली ने धीरे-धीरे उनसे दूरी बनानी शुरू की। वसुंधरा की मर्जी के खिलाफ 3—3 प्रदेश अध्यक्ष बनाए गए, और 2023 में जब BJP राजस्थान में वापस आई तो वो जीत वसुंधरा राजे की जीत नहीं थी।

2023 में जब चुनाव नतीजे आए और 115 सीटों के साथ BJP सरकार बनाने की स्थिति में आई तो दिल्ली ने वो फैसला किया, जिसने राजस्थान की राजनीति को झकझोर दिया। वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद की कमान नहीं सौंपी गई, बल्कि पहली बार विधायक बने भजनलाल शर्मा को राजस्थान की कमान सौंप दी गई। यह फैसला वसुंधरा के लिए सिर्फ एक राजनीतिक झटका नहीं था, यह उनका सार्वजनिक रुप से अपमान था। दो बार की मुख्यमंत्री, जिस पार्टी की सबसे बड़ी चेहरा थीं, उसी पार्टी ने उन्हें किनारे कर दिया। लेकिन इसके बाद भी वसुंधरा राजे खामोश नहीं रहीं, उनका दर्द बार-बार उभरता रहा, कभी इशारों में, कभी कटाक्षों में, और कभी कार्यों में। उन्होंने बिना नाम लिए कहा कि कुछ लोग पीतल की लौंग मिलने पर भी खुद को सर्राफ समझने लगते हैं। यह तीर किस पर था, यह बात राजस्थान का बच्चा-बच्चा समझता है।

दिसंबर 2023 में सरकार गठन के बाद मंत्रिमंडल में वसुंधरा राजे समर्थक विधायकों को मौका नहीं मिला। कई सीनियर विधायक होने के बावजूद उन्हें मंत्री पद नहीं दिया गया। यह महज़ संयोग नहीं था, यह एक सुनियोजित रणनीति थी राजे के खेमे को कमज़ोर करने की। यहाँ तक कि वसुंधरा राजे के कार्यकाल का जो जनसुनवाई का फार्मूला था, जिसे कांग्रेस ने भी अपनाया था, उसे भी सरकार ने नकार दिया। यानी वसुंधरा की विरासत को मिटाने की कोशिश हर मोर्चे पर हो रही थी। लोकसभा चुनाव में BJP ने स्टार प्रचारकों की सूची जारी की, जिसमें राजस्थान से सिर्फ भजनलाल शर्मा का नाम था, वसुंधरा राजे को जगह नहीं मिली। आलाकमान से संकेत साफ था।

लेकिन यहीं वसुंधरा राजे का असली किरदार सामने आता है। वो जो हैं, वो इतनी आसानी से नहीं जातीं। अप्रैल 2026 में BJP स्थापना दिवस पर वसुंधरा ने राजस्थान BJP कार्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। कई लोग ऐसे होते हैं जो दल तो बदल लेते हैं, लेकिन उनका दिल नहीं बदलता। हमें खतरा उन लोगों से है जो केवल अपना सोचते हैं और पार्टी के भविष्य की चिंता नहीं करते। यह भाषण सीधे सरकार पर निशाना था, और वसुंधरा ने यह निशाना उनके ही पार्टी कार्यालय से, उनके ही कार्यकर्ताओं के सामने साधा था। जुलाई 2025 में वसुंधरा राजे ने PM मोदी से मुलाकात की, शिक्षा विभाग की लापरवाहियों समेत कई मुद्दे उठाए। इसके बाद राजस्थान सरकार के मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल को लेकर पार्टी के भीतर गंभीर मंथन शुरू हो गया। यानी वसुंधरा अभी भी सीधे दिल्ली तक पहुँच रखती हैं, और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है।

फरवरी 2025 में सियासी गलियारों में अटकलें उठीं कि वसुंधरा राजे को BJP का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है, और जब मदन राठौड़ ने राजस्थान BJP प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल किया, तो प्रस्तावकों में एक नाम था वसुंधरा राजे का, यानी पार्टी उन्हें पूरी तरह नकार भी नहीं सकती। उनका जनाधार, उनका नेटवर्क, उनके समर्थक विधायक, यह सब ऐसी ताकत है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आज भी आलाकमान के लिए आसान नहीं है। तो अब असली सवाल कि 2028 में क्या होगा? इसमें तीन संभावनाएँ हैं। पहली संभावना भजनलाल शर्मा 2028 का चुनाव लड़ते हैं और जीतते हैं, तो राजे का राजनीतिक अध्याय धीरे-धीरे बंद हो जाएगा। दूसरी संभावना यह है कि भजनलाल कमज़ोर पड़ते हैं, पार्टी को लगता है कि 2028 में जीत के लिए राजे का चेहरा चाहिए, तो 'महारानी' की वापसी होती है। तीसरी संभावना यह है कि दिल्ली राजे को कोई राष्ट्रीय भूमिका देती है, राज्यपाल पद या केंद्रीय जिम्मेदारी, तो समझो इस तरह उन्हें सम्मान के साथ राजस्थान की राजनीति से बाहर किया जाता है। इन तीनों में से कौन सी संभावना सच होगी, यह निर्भर करता है उस एक सवाल पर, जिसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है, जो है क्या 2028 में बीजेपी सरकार सत्ता रिपीट कर पाएगी?

राजस्थान में हर 5 साल में सरकार बदलती है, यह परंपरा 1993 से चली आ रही है। 1998, 2003, 2008, 2013, 2018, 2023, हर बार सत्ता पलटी, लेकिन 2023 में BJP जीती थी तो 2028 में कांग्रेस की वापसी का खतरा है। और अगर BJP हारती है तो उसका ठीकरा किसके सिर फूटेगा? तब वसुंधरा का पक्ष मज़बूत होगा कि देखिए मुझे हटाया, और क्या हुआ। यानी विडंबना यह है कि वसुंधरा राजे की राजनीतिक वापसी उनकी अपनी पार्टी की हार पर निर्भर है। राजस्थान में जनाधार बनाने में दशकों लगते हैं। वसुंधरा का जो network है, जो समर्थक हैं, वो किसी के रास्ते की रुकावट भी बन सकते हैं। सत्ता को उन्हें साथ लेकर चलिए, उनके खिलाफ नहीं जाना चाहिए।वसुंधरा राजे की ताकत निर्विवाद है, उनका अनुभव अमूल्य है, लेकिन राजनीति में जो सबसे ज़रूरी होता है वो है वक्त की पहचान। अगर वसुंधरा सत्ता के नशे में चूर होकर पार्टी के भीतर लड़ाई में उलझीं होतीं, तो जनता के बीच उनकी जो छवि है, वो मजबूत होती, और सियासत में किसी की छवि ही असली ताकत होती है। राजस्थान की जनता वसुंधरा को 'महारानी' नहीं, एक जन 'नेता' के रूप में देखती है।  इसलिए नेता को सबसे अधिक अपनी छवि के लिए काम करना चाहिए। लेकिन वसुंधरा की वापसी या विदाई, यह फैसला अंततः जनता करेगी, और जनता के दरबार में जो सबसे ज़्यादा पसीना बहाएगा, वही 2028 में जीतेगा। तो अब राजस्थान में नेताओं को इस बात का इंतजार नहीं करना चाहिए कि सत्ता से परेशान जनता खुद ही विपक्ष को चुन लेगी, अब समय बदल रहा है। इसलिए सत्ता की इमेज खराब होने की प्रतीक्षा करने के साथ ही खुद की इमेज बनाने पर काम करना चाहिए, पता नहीं अपनी इमेज के दम पर ही वापसी हो जाए।

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