भारत आखिर कंगाल क्यों नहीं होता?


पीएम मोदी अक्सर कहते हैं कि भारत जल्द दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनेगा, लेकिन क्या आपको पता है कि आज भारत के उपर करीब 255 लाख करोड़ रुपये का कर्जा होने के बाद भी इस रेस में जर्मनी और जापान जैसे कर्ज़ में डूबे देशों से कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में खड़ा है? अमेरिका पर 32 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का कर्ज़ है, जापान पर तो उसकी पूरी अर्थव्यवस्था से दोगुना कर्ज़ चढ़ा है, फिर भी ये दोनों देश दुनिया की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाते हैं। न कोई दिवालिया होने की खबर, न करेंसी क्रैश, न ही पाकिस्तान की तरह आईएमएफ के दरवाजे पर लाइन लगाते। 

सवाल यह है कि जितना कर्ज़ किसी गरीब देश को बर्बाद कर सकता है, उतना ही कर्ज़ लेकर भी ये अमीर देश कंगाल क्यों नहीं होते, और इस पूरी लिस्ट में भारत की असली ताकत कहां छिपी है? दुनिया की टॉप 10 अर्थव्यवस्थाओं के जीडीपी, कर्ज़ और उस कर्ज़ के पीछे छिपे राज के साथ आज इसी सवाल का पूरा गणित समझेंगे।

सबसे पहले बात रैंकिंग की करें तो 2026 में नाममात्र जीडीपी के हिसाब से दुनिया की टॉप 10 अर्थव्यवस्थों में नंबर 1 पर अमेरिका है, जिसकी लगभग 32.38 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी है। नंबर 2 पर चीन है, जिसकी जीडीपी करीब 20.85 ट्रिलियन डॉलर है। नंबर 3 पर जर्मनी है, जिसकी 5.45 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी है। नंबर 4 पर जापान है, 4.38 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी के साथ जापान 4 नंबर पर खड़ा है। 

यूनाइटेड किंगडम की 4.26 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी है और यह 5वें नंबर पर है। 4.15 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी के साथ 6ठे नंबर पर है। नंबर 7 पर फ्रांस है, जिसकी करीब 3.60 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी है। इटली 2.74 ट्रिलियन डॉलर के साथ 8वें पायदान पर है। रूस की जीडीपी करीब 2.66 ट्रिलियन डॉलर है, और 10वें स्थान पर ब्राजील है,​ जिसकी जीडीपी करीब 2.64 ट्रिलियन डॉलर है।

यह तो अर्थव्यवस्था के आंकड़े हो गए, अब बात करते हैं इन देशों पर कर्ज़ की, और यहीं से कहानी दिलचस्प होनी शुरू होती है। ऋण की पहली लेयर है सरकारी कर्ज़, यानी डेट टू जीडीपी अनुपात, जो यह बताता है कि देश की सालाना कमाई के मुकाबले सरकार पर कितना बोझ है। 

2025 से 2026 के ताजा अनुमानों के मुताबिक, इस मामले में सबसे ऊपर है जापान, जहां कर्ज़ जीडीपी का करीब 204% तक पहुंच चुका है, यानी देश की पूरी सालाना कमाई से दोगुने से भी ज्यादा है। दूसरे नंबर पर इटली है, जहां यह अनुपात 138% से 149% के बीच है। तीसरे नंबर पर खुद अमेरिका है, जहां यह 121% से 137% के बीच झूलता है, 2025 में करीब 136.8% और 2026 के अनुमान करीब 129% के आसपास हैं। फ्रांस का आंकड़ा 112% से 116% है। 

यूके का करीब 105% आंकड़ा है। चीन आधिकारिक तौर पर अपने केंद्रीय कर्ज़ को कम दिखाता है, लेकिन जब स्थानीय सरकारों और सरकारी कंपनियों, यानी एसओई का कर्ज़ जोड़ दें, तो यह अनुपात 84% से लेकर 100% से भी ऊपर चला जाता है। भारत का आंकड़ा इन सबसे कहीं बेहतर करीब 82% है। ब्राजील का 75%, जर्मनी का करीब 65% और रूस का कर्ज़ वैश्विक औसत से भी काफी नीचे है।

फिर आती है कर्ज की दूसरी लेयर, जो अक्सर लोग समझने में गड़बड़ कर देते हैं, विदेशी कर्ज़ यानी एक्सटर्नल डेट बनाम घरेलू कर्ज़। एक्सटर्नल डेट में अक्सर पूरे देश का हिसाब आता है, यानी सरकार भी और प्राइवेट सेक्टर भी, जबकि डेट टू जीडीपी में ज्यादातर सिर्फ सरकारी कर्ज़ गिना जाता है। भारत का बाहरी कर्ज़ मार्च 2026 तक करीब 762.8 अरब डॉलर है, जो भारत की जीडीपी का करीब 20.8% बैठता है, बाकी बड़ा हिस्सा घरेलू है। 

अमेरिका का एक्सटर्नल डेट करीब 28 ट्रिलियन डॉलर के आसपास रिपोर्ट होता है, लेकिन क्योंकि उसका ज्यादातर सरकारी कर्ज़ डॉलर में ही है और घरेलू—विदेशी दोनों तरह के निवेशकों के पास बंटा हुआ है, इसलिए वहां विदेशी मुद्रा संकट का खतरा कम माना जाता है। चीन का एक्सटर्नल डेट करीब 2.4 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है, लेकिन उसका कुल दायित्व स्थानीय सरकार और सरकारी कंपनियों को मिलाकर कहीं ज्यादा बड़ा है। 

यूके, फ्रांस, जर्मनी और इटली के एक्सटर्नल डेट के आंकड़े देखने में बहुत बड़े लगते हैं, यूके का 10 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा, फ्रांस का 8 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा, जर्मनी का 7 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा, लेकिन इनमें प्राइवेट सेक्टर और बैंकिंग सिस्टम के क्रॉस बॉर्डर लेनदेन भी शामिल होते हैं, जबकि सरकारी बॉन्ड का बड़ा हिस्सा घरेलू या यूरो क्षेत्र के भीतर ही रहता है। 

जापान का एक्सटर्नल डेट करीब 4.7 ट्रिलियन डॉलर दिखता है, लेकिन उसके सरकारी कर्ज़ का बहुत बड़ा हिस्सा येन में है और बैंक ऑफ जापान, पेंशन फंड और घरेलू बैंकों के पास ही टिका है, इसीलिए वहां करेंसी क्राइसिस का खतरा बहुत कम आंका जाता है। रूस का एक्सटर्नल डेट महज 312 अरब डॉलर के आसपास है, यानी तुलनात्मक रूप से बहुत कम, प्रतिबंधों के बाद विदेशी फंडिंग पर निर्भरता और भी घट गई है, और ब्राजील का एक्सटर्नल डेट करीब 747 अरब डॉलर है, जहां घरेलू कर्ज़ का हिस्सा भी काफी अहम भूमिका निभाता है।

अब आता है असली सवाल, कि इतना भारी भरकम कर्ज़ होने के बावजूद ये देश कंगाल क्यों नहीं होते। इसका जवाब सात बिंदुओं में समझिए, और यही सात बिंदु आज की पूरी कहानी की रीढ़ हैं।

पहला बिंदु, कर्ज़ किस मुद्रा में लिया गया है। अमेरिका, जापान, यूके और यूरोजोन के बड़े देश अपना ज्यादातर कर्ज़ अपनी ही मुद्रा में जारी करते हैं, यानी डॉलर में, येन में, पाउंड में, यूरो में। जब कर्ज़ अपनी मुद्रा में हो, तो विदेशी मुद्रा संकट का खतरा बहुत कम हो जाता है, क्योंकि जरूरत पड़ने पर देश अपने सेंट्रल बैंक और बैंकिंग सिस्टम के जरिए इस कर्ज़ को दोबारा फाइनेंस कर सकता है।

दूसरा बिंदु, कर्ज़ बिका किसके पास है। अगर सरकारी बॉन्ड ज्यादातर घरेलू निवेशकों, पेंशन फंड, बीमा कंपनियों, बैंकों और खुद केंद्रीय बैंक के पास हैं, तो रीफाइनेंसिंग आसान बनी रहती है। जापान और अमेरिका में सरकारी कर्ज़ का बड़ा हिस्सा घरेलू ही है, और भारत में भी सरकारी कर्ज़ का ज्यादातर हिस्सा घरेलू निवेशकों के पास है, इसीलिए बाहरी झटकों का असर सीमित रहता है।

तीसरा बिंदु, ब्याज लागत बनाम विकास दर का गणित। जब अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट ब्याज दर के करीब या उससे ऊपर हो, तो कर्ज़ का बोझ स्थिर बना रह सकता है। भारत की ग्रोथ 2026 की पहली तिमाही में करीब 7.8% आई है, अमेरिका की करीब 2.3%, और चीन की करीब 4.4% है। ऊंची ग्रोथ का सीधा मतलब है कि भविष्य में टैक्स कलेक्शन बढ़ेगा, जिससे कर्ज़ चुकाने की क्षमता अपने आप मजबूत होती जाएगी।

चौथा बिंदु, केंद्रीय बैंक और वित्तीय बाजार की गहराई। फेडरल रिजर्व, बैंक ऑफ जापान और यूरोपियन सेंट्रल बैंक जैसे संस्थान बॉन्ड बाजार में स्थिरता बनाए रखते हैं। गहरे और परिपक्व वित्तीय बाजार होने से सरकारें सस्ती दरों पर अपना कर्ज़ रीफाइनेंस कर पाती हैं, ब्याज दरें अचानक नहीं उछलतीं, और निवेशकों का भरोसा टिका रहता है।

पांचवां बिंदु, कर राजस्व और उधार लेने की साख। बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की टैक्स बेस बहुत बड़ी होती है। निवेशक इन देशों को डिफॉल्ट के लिहाज से कम जोखिम भरा मानते हैं, इसलिए इनके बॉन्ड पर प्रीमियम भी कम लगता है, यानी सरकार के लिए नया कर्ज़ लेना बहुत महंगा साबित नहीं होता।

छठा बिंदु, बाहरी कर्ज़ का अनुपात कम होना। भारत जैसे देशों में बाहरी कर्ज़ जीडीपी का महज 20.8% के आसपास है। जब एक्सटर्नल डेट कम हो, तो विदेशी मुद्रा संकट की आशंका खुद ब खुद घट जाती है। रूस का एक्सटर्नल डेट भी तुलनात्मक रूप से बहुत कम है, यही वजह है कि पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद वहां करंट अकाउंट और फिस्कल पोजीशन को संभालना अपेक्षाकृत आसान बना रहा है।

और सातवां बिंदु, संपत्ति पक्ष और नीतिगत गुंजाइश। कई बड़े देशों के पास भारी सार्वजनिक संपत्ति है, सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी है, और कर ढांचे, खर्च की प्राथमिकताओं और सब्सिडी सुधार जैसे नीतिगत औजार भी मौजूद हैं, जो कर्ज़ को स्थिर बनाए रखने में मदद करते हैं। मतलब साफ है, सिर्फ कर्ज़ का आकार मायने नहीं रखता, बल्कि यह मायने रखता है कि उस कर्ज़ की बनावट कैसी है और उसे मैनेज कौन और कैसे कर रहा है। एक उदाहरण के तौर पर समझिए, जब भारत में बैंक खाते कम थे तो सरकार बैंकों से पैसे कम ले पाती थी, क्योंकि लोगों का पैसा नगद में रहता था, जो सरकार की पहुंच से दूर हो जाता था। 2014 के बाद मोदी सरकार ने बड़े पैमाने पर लोगों के बैंक खाते खुलवाए, जिससे लोगों ने पैसे नगद रखने कम कर दिए। उसके बाद यूपीआई के जरिए भुगतान होने लगा तो बैंकों से पैसे निकालने की आदत ही कम हो गई। अब लोगों को जरुरत होती तो बैंक से ही ट्रांसफर कर देते हैं, यानी बैंकों को नगदी नहीं देनी पड़ती। फिर उस पैसे को सरकार कर्जे के रुप में उधार ले लेती है। सरकार जितना पैसा काम लेती है, उतना ही कर्जा बढ़ता दिखाया जाता है। इसका मतलब यह है कि पैसा तो देश के लोगों का ही है, यानी विदेशी कर्ज नहीं है, लेकिन सरकार के उपर उधार गिना जाता है। 

तो निचोड़ यह निकलता है कि जीडीपी के हिसाब से अमेरिका और चीन आज भी शीर्ष पर काबिज हैं, और भारत तेजी से शीर्ष 5 के करीब पहुंचता जा रहा है। कर्ज़ और जीडीपी अनुपात में जापान, इटली, अमेरिका, फ्रांस और यूके सबसे ऊपर के पायदान पर हैं, जबकि जर्मनी, रूस, ब्राजील और भारत अपेक्षाकृत कहीं बेहतर स्थिति में खड़े हैं। और जब बात विदेशी बनाम घरेलू कर्ज़ की आती है, तो साफ पैटर्न यही दिखता है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का कर्ज़ ज्यादातर उनकी अपनी मुद्रा में है और उनके अपने ही घरेलू निवेशकों के पास है, और यही वह मूल कारण है कि इतना भारी कर्ज़ होते हुए भी ये देश कंगाल नहीं होते। आपको इनमें से किस देश का मॉडल सबसे ज्यादा टिकाऊ लगता है, कमेंट में जरूर बताइए। 

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