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4 नंबर वाला 165 पर! SOG ने खोली पोल

 


-2018 की भर्तियों में अंकों की हेराफेरी का पर्दाफ़ाश, एसओजी ने कर्मचारी चयन बोर्ड के तकनीकी प्रमुख को दबोचा

जयपुर। राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड की भर्ती परीक्षाओं में नौ लाख से ज़्यादा अभ्यर्थियों के भरोसे से हुए खिलवाड़ पर अब कानून का शिकंजा कसता दिख रहा है। भजनलाल शर्मा सरकार के अधीन विशेष अभियान समूह यानी एसओजी ने 20 जनवरी को बोर्ड के तत्कालीन तकनीकी प्रमुख और सिस्टम एनालिस्ट कम प्रोग्रामर संजय माथुर समेत पाँच लोगों को गिरफ्तार किया। उन पर आरोप है कि उन्होंने कंप्यूटर प्रणाली में दर्ज ओएमआर शीट का असली डेटा बदलकर अभ्यर्थियों के अंक बढ़ाए। एसओजी के अतिरिक्त महानिदेशक विशाल बंसल के अनुसार माथुर के साथ प्रवीण गंगवाल, शादान खान, विनोद कुमार गौड़ और पूनम माथुर भी पकड़े गए हैं।

मामला वर्ष 2018 की तीन भर्तियों का है, सुपरवाइज़र महिला सशक्तीकरण, प्रयोगशाला सहायक और कृषि पर्यवेक्षक। इनकी परीक्षाएँ 2019 में हुई थीं। कुल 3,212 पदों के लिए 9,40,038 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था। जाँच में सामने आया कि अंकों को इस तरह फुलाया गया कि इकाई के अंक वाला अभ्यर्थी सैकड़ों अंक तक पहुँच गया। एक मामले में 63 अंक बढ़ाकर 182 कर दिए गए, जबकि कुछ मामलों में अंक 225 तक पहुँचे बताए गए। बाद में गिरफ्तार किए गए प्रयोगशाला सहायक भर्ती के दो अभ्यर्थियों, महेंद्र कुमार मीणा और देवेंद्र सिंह गुर्जर, के मामले में बताया गया कि महेंद्र के रिकॉर्ड में 165 अंक दर्ज थे, जबकि बोर्ड की दोबारा जाँच में उसके असली अंक सिर्फ़ 4 निकले। इस पूरे खेल में स्कैनिंग का काम करने वाली निजी कंपनी के कर्मचारियों और उसके एक कार्यकारी निदेशक की भूमिका भी जाँच के दायरे में है।

इस पर्दाफ़ाश की शुरुआत बोर्ड की ओर से ओएमआर शीट की दोबारा जाँच कराए जाने से हुई, जिसमें असली और दर्ज अंकों का फ़र्क पकड़ में आया। इसके बाद एसओजी ने भारतीय दंड संहिता, राजस्थान सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराओं में कार्रवाई की। जाँच एजेंसी का कहना है कि आगे और गिरफ्तारियाँ संभव हैं। अधिकारियों के मुताबिक कुछ आरोपी ऐसे भी थे जो बोर्ड की आंतरिक जाँच समिति तक में शामिल रहे, यानी जिन हाथों में जाँच थी, वही कठघरे में खड़े हैं।

सरकारी पक्ष के अनुसार, अब तक की पड़ताल में 38 से अधिक ऐसे चयन सामने आए हैं जिन्हें कथित तौर पर ओएमआर डेटा से छेड़छाड़ करके कराया गया। दावा है कि इनमें प्रयोगशाला सहायक से लेकर कृषि पर्यवेक्षक भर्ती तक के मामले शामिल हैं, और एसओजी इनमें भारतीय दंड संहिता तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराओं में कड़े प्रकरण दर्ज कर रही है। यह भी बताया गया है कि ओएमआर स्कैनिंग का काम दिल्ली की एक निजी एजेंसी के पास था और डेटा में हेरफेर के आरोप में उसी के कर्मचारियों पर कार्रवाई हुई है। हालाँकि इन आँकड़ों और ब्योरों की आधिकारिक पुष्टि एसओजी की ओर से अलग से सामने आना बाकी है।

सरकार का यह भी कहना है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने एसओजी को साफ़ निर्देश दिए हैं कि इस पूरे प्रकरण के सूत्रधार तक पहुँचा जाए, चाहे उसकी पहुँच कहीं भी हो, और किसी राजनीतिक सिफ़ारिश या अफ़सरशाही के दबाव को आड़े न आने दिया जाए। सरकार इसे अपनी शून्य सहनशीलता की नीति का नतीजा बताती है और संकेत देती है कि फर्जी थानेदारों के प्रकरण के बाद अब भर्तियों में सेंध लगाने वाले कर्मचारियों और बिचौलियों की बारी है। यह एजेंसी की जाँच और अदालत में सबूतों पर निर्भर करेगा कि ये दावे कितने ठहरते हैं।

पारदर्शिता की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। विवाद के बीच कर्मचारी चयन बोर्ड ने घोषणा की कि अब अभ्यर्थियों की ओएमआर शीट ऑनलाइन उपलब्ध कराई जाएँगी, जिसकी शुरुआत चतुर्थ श्रेणी भर्ती से होगी, ताकि हर अभ्यर्थी अपनी शीट खुद देख सके और भरोसा बहाल हो।

उधर राजनीति भी गरमा गई है। भाजपा का आरोप है कि मामला पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल की भर्तियों से जुड़ा है और उसी दौर में इसे दबाया गया। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पलटवार करते हुए एसओजी की रिपोर्ट के हवाले से कहा कि गड़बड़ी की शुरुआत 2018 से पहले की भाजपा सरकार में हुई और 2026 तक चलती रही। उन्होंने बीते दो वर्षों में हुई सभी भर्ती परीक्षाओं की जाँच की माँग की है और याद दिलाया कि कांग्रेस राज में एसओजी ने 250 से ज़्यादा गिरफ्तारियाँ की थीं। अब असली कसौटी यही है कि जाँच कितनी गहराई तक जाती है, और दोषियों को अदालत से सज़ा मिलती है या नहीं। नौ लाख अभ्यर्थियों की निगाहें इसी पर टिकी हैं।


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