अमेरिका में एक जीबी इंटरनेट के लिए 550 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, तो पूरी दुनिया में ओन एन एवरेज एक जीबी इंटरनेट डेटा के लिए 215 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। जबकि भारत की बात की जाए तो एक जीबी डेटा के लिए केवल 8 रुपये देने पड़ते हैं। आज दुनिया की सबसे बड़ी और अमीर इंटरनेट कंपनी भले ही एलन मस्क की स्टारलिंक होगी, लेकिन विश्व में सबसे बड़ी इंटरनेट उपलब्ध करवाने वाली कंपनी मुकेश अंबानी की रिलायंस जिओ है, जो केवल भारत में ही करीब 50.8 करोड़ कस्टमर्स के साथ टॉप पर है।
दूसरे नंबर पर 49.2 करोड़ के साथ भारती एयरटेल है, 20 करोड़ के साथ वोडाफोन तीसरे और 9.4 करोड़ ग्राहकों वाली बीएसएनएल चौथे नंबर पर है। भारत में इस वक्त करीब 110 करोड़ से ज्यादा इंटरनेट यूजर हैं और इसी बड़े बाजार से माल लूटने के लिए एलन मस्क भारत में अपनी स्टारलिंक को उतारना चाहते हैं।
एफसीआरए का नाम आपने सुना होगा, वही फोरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट, जिसके द्वारा विदेशों से भारत में आने वाले धन को रेगुलेट किया जाता है। इसे 1976 में बनाया गया था, जिसमें यूपीए की मनमोहन सरकार ने 2010 में संशोधन किया और मोदी सरकार ने 2020 में इसमें दूसरा संशोधन किया, लेकिन अवैध रूप से विदेशों से भारत में आ रहे पैसे को पारदर्शी और कंट्रोल करने के लिए अब मोदी सरकार इसे अधिक मजबूत करना चाहती है, जिसके लिए एफसीआर कानून में तीसरी बार बदलाव करने का प्रयास किया जा रहा है...
जिसके बाद एनजीओ, ट्रस्ट, सोसाइटी, गैर लाभकारी संस्थाओं को विदेशों से मिलने वाली फंडिंग की सम्पूर्ण जानकारी सरकार को देना अनिवार्य होगा। इसे लेकर 12 अक्टूबर को जेपीसी की महत्वपूर्ण बैठक होने जा रही है, जिसे विपक्षी सांसद टालने की मांग कर रहे थे, उससे पहले 10 अक्टूबर को ही दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ एक प्रोटेस्ट कॉल किया गया है, जिसके असली मकसद लोगों को अब समझ आ रहे हैं।
डीप स्टेट क्या होता है, इसके बारे में विस्तार से बात करने की जरुरत नहीं, लेकिन भारत में आज कैसे काम कर रहा है, इसपर चर्चा करना जरूरी है। डीप स्टेट चाहता है कि भारत में जो एफसीआरए संशोधन के जरिये मोदी सरकार विदेशी फंडिंग को कंट्रोल करना चाह रही है, वो नहीं हो और विदेशों से आने वाला पैसा पहले की तरह निर्बाध आता रहे, उसका हिसाब सरकार नहीं मांगे, एनजीओ, सोसाइटी, ट्रस्ट अपने हिसाब से खर्च करें, इसकी जानकारी सरकार को नहीं देनी पड़े।
विदेशी फंडिंग से चलने वाले तमाम एनजीओ हैं, मिश्नरीज स्कूल्स हैं, मदरसे हैं या फिर कोई कॉलेज या विवि हैं, वो अभी तक फॉरेन फंडिंग लेते हैं और इसका हिसाब सरकार को नहीं देना होता है। आपके दिमाग में कई बार सवाल आया होगा कि जो ईसाइयों की स्कूलें हैं, वो इतनी शानदार क्यों होती हैं, जबकि स्कूल फीस तो भारत की प्राइवेट स्कूलों को भी मिलती है, फिर भी इतने बड़े नहीं बन पाते हैं, जितनी मिश्नरीज की स्कूलें हैं।
असल में इन स्कूलों को विदेश से खूब पैसा मिलता है और इसे ये अपनी मर्जी से खर्च करते हैं, जबकि स्टेट या सेंट्रल गर्वंमेंट भी इनमें हस्तक्षेप नहीं कर पाती हैं, इनके उपर राइट टू एजुकेशन कानून भी लागू नहीं होता, जबकि ये स्कूल भारत में ही कमाते हैं, यहीं पर संचालित होते हैं, यहीं की जमीनें लेकर बैठै हैं।
आपने देखा होगा कई एनजीओ के सदस्य करोड़ों और अरबों रुपयों में खेलते हैं, जबकि उनको सरकार कोई फंड भी नहीं देती हैं, लेकिन फिर भी अथाह पैसा खर्च किया जाता है, ये सारा पैसा विदेशों से ही आता है। कई बार यही पैसा आतंकवाद से लेकर नकस्लवाद और देश विरोधी कामों में खर्च होता है, लेकिन कठोर कानून नहीं होने के कारण सरकार कुछ नहीं कर पाती है। एफसीआरए संशोधन बिल इसी अवैध धन को रेगुलेट करने के लिए लाया जा रहा है।
अब बात करते हैं एलन मस्क के ताजा दर्द पर, जिसमें राहुल गांधी साझेदार बन गए हैं। चुनाव में कथित धांधली को लेकर बोलिविया में 2020 में गृहयुद्ध जैसा माहौल चल रहा था, तब एलन मस्क ने कहा था कि वो जहां चाहें, वहां सत्ता बदल सकते हैं। बाद में विवाद हुआ तो एलन मस्क ने ट्वीट डिलीट कर दिया, लेकिन तब तक सुर्खियां बन चुकी थीं। इसी प्लेटफॉर्म को 2022 में एलन मस्क ने 45 बिलियन डॉलर में खरीदा था।
एलन को पता था कि यह ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहां से दुनियाभार में खबरे सर्कूलेट होती हैं और इसे कंट्रोल करके अपना एजेंडा चलाया जाता है। आपने देखा होगा, भारत सरकार के पक्ष के ट्वीट, खबर या वीडियो ब्रेक डाउन कर दिया जाता है, जबकि इन दिनों दिल्ली में चल रहे प्रोटेस्ट के वीडियो और खबरें खूब दिखाई देती हैं। एलन मस्क ने एक्स के जरिए सोशल मीडिया पर जैसा नियंत्रण किया है, वैसा ही कंट्रोल स्टारलिंक के जरिए इंटरनेट पर करना चाहते हैं।
रूस के साथ यूक्रेन युद्ध में रूस ने इंटरनेट बंद किया तो स्टारलिंक ने अपने डिब्बों से यूक्रेन को इंटरनेट दिया, जिसका फायदा उसको मिला। ऐसे ही जब ईरान में सरकार के खिलाफ प्रोटेस्ट हो रहे थे, तब स्टारलिंक ने अपना सेटेलाइट इंटरनेट एक्सेस दिया, जिसके कारण सरकार विरोधी चीजें चलीं और ईरान सरकार के खिलाफ माहौल बनाया गया।
करीब दो साल पहले अमेरिका चाहता था कि भारत का कृषि और डेयरी बाजार 100 फीसदी अमेरिका के लिए खोल दिया जाए। अमेरिका हर साल अपने किसानों को 27 लाख करोड़ की सब्सिडी देता है, लेकिन भारत इतना नहीं दे सकता।
यदि भारत के एग्रीकल्चर और डेयरी बाजार अमेरिकी किसानों के लिए खुल जाएंगे तो भारत के किसान उनसे मुकाबला नहीं कर पाएंगे और यहां की किसानी और पशुपालन बर्बाद हो जाएगा, कुछ ही बरसों में भारत पूरी तरह से अमेरिका पर निर्भर हो जाएगा। इन परिस्थितियों को भांपते हुए भारत सरकार ने अपने किसानों और पशुपालकों को बचाने के लिए कृषि और डेयरी में 100 फीसदी एफडीआई से इनकार कर दिया। इस वजह से अमेरिका आज मोदी सरकार को बदलने के लिए उतावला हो रहा है।
भारत में स्टारलिंक नहीं है, लेकिन जब मणिपुर में हिंसा हो रही थी, तब भ्रामक खबरों को रोकने के लिए इंटरनेट बंद किया गया था, लेकिन इसके बावजूद एलन मस्क ने स्टारलिंक की डिवाइस मणिपुर में भेजी, ताकि दंगे भड़के और भारत सरकार को दबाव में लिया जा सके। मस्क जहां चाहते हैं, वहीं पर स्टारलिंक की डिवाइस देकर वहां की सत्ता को अपने हिसाब से चलाने की कोशिश करते हैं।
चीन इस बात को अच्छे से जानता है और इसी वजह से चीन ने स्टारलिंक को बैन कर रखा है, जबकि एलन मस्क की ही टेस्ला चीन में धड़ल्ले से बिक रही है। इसी आधार पर भारत में राहुल गांधी और खुद को बड़ा पत्रकार कहने वाले रवीश कुमार कहते हैं कि जब टेस्ला के लिए नियम बदले जा सकते हैं तो फिर स्टारलिंक के लिए भी बदले जाएं, लेकिन ये भूल जाते हैं कि टेस्ला गाड़ी बेचती है और स्टारलिंक इंटरनेट देता है, जिसकी चालू और बंद करने की चाबी ही एलन मस्क के पास होगी और जब धारा 370, राम मंदिर, तीन तलाक, या किसी भी बड़े विवाद पर सरकार के आदेश से इंटरनेट बंद करके फेक न्यूज फैलने से रोका जाएगा, तब स्टारलिंक इंटरनेट चालू रखकर भारत में दंगे भड़का सकेगा, और एक झटके में सत्ता बदलने का काम भी कर सकेगा।
एलन मस्क कहते हैं कि भारत के उन 1.50 फीसदी गांवों में सेटेलाइट से इंटरनेट देना चाहते हैं, जहां अभी तक 4जी इंटरनेट नहीं पहुंचा है। लेकिन जरा गौर से सुनो, एक तरफ जहां एयरटेल और जिओ भारत में करीब 400 रूपये महीना में 5जी इंटरनेट दे रहे हैं, वहीं 34000 रुपये की डिवाइस और करीब 8500 रुपये महीने का इंटरनेट देकर एनल मस्क भारत के गांवों की सेवा करना चाहते हैं और इस सेवा से उनको रोकने के लिए भारत के कुछ एलिगोर्स आड़े आ रहे हैं। भारत में एलिगोर्स वही हैं, जो अमेरिका में खुद एलन मस्क हैं। तो आप ही सोचो कि जिस देश का गांव का आम आदमी आज 400 रुपये महीना भी खर्च नहीं कर पा रहा है, वहां स्टारलिंक से 34000 रुपये की डिवाइस और 8500 रुपये महीने का 5जी इंटरनेट क्यों लेगा?
एक साल पहले कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा था कि स्टारलिंक को लाइसेंस देने से पहले देश की सिक्युरिटी के बारे में सोचना होगा, लेकिन आज राहुल गांधी उन्हीं एलन मस्क के साथ खड़े हैं, स्वागत कर रहे हैं, जो कहते हैं कि वो जहां चाहे, वहां सत्ता परिवर्तन कर सकते हैं। ऐसी क्या मजबूरी है राहुल गांधी की?
क्या वो पीएम बनने के लिए इतने उतावले हो गए हैं कि 2029 के आम चुनाव तक भी इंतजार नहीं कर पा रहे हैं और चुनी हुई सरकार को नेपाल, बंग्लादेश और श्रीलंका की तरह गिराकर देश के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं? क्या उन्हें इन 12 सालों में पक्का भरोसा हो चुका है कि अब वे चुनकर देश के पीएम नहीं बन पाएंगे?
नीट के आरोपों पर धमेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर कुछ कॉकरोच इस देश के कर्ताधर्ता बने बैठै हैं, जो हर मुद्दे पर खुद ही सही और गलत का फैसला करते हैं, प्रशासन को आदेश देते हैं, हर मामले में जज बनते हैं, कानून का मजाक बनाते हैं और देश के इलेक्शन कमीशन को हटाकर भी चुप नहीं बैठने की धमकी देते हैं।
असल बात यह है कि बेखौफ विदेशी फंडिंग के लिए एफसीआरए कानून, अमेरिका के लिए भारत का 100 फीसदी खुला कृषि बाजार, हमारे देश में बेरोकटोक वाला एलन मस्क का स्टारलिंक सेटेलाइट इंटरनेट, राहुल गांधी को बिना चुनाव सीधे पीएम बनाने का उतावलापन और अरविंद केजरीवाल को दिल्ली की सत्ता के लिए ही ये सबकुछ हो रहा है। भारत सरकार को दबोचने के लिए 2 शक्तियां अमेरिका से रेगुलेट हो रही हैं, तो भारत के 2 नेता अपना स्वार्थ देख रहे हैं।
भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि इंटरनेट के लिए देश की सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाएगा, चाहे कुछ भी हो जाए। हमारे किसानों के हितों के खिलाफ जाकर भारत के बाजारों में अमेरिकी प्रोडेक्ट नहीं आएंगे, चाहे कुछ भी कीमत चुकानी पड़े। एसआईआर करके क्लीन इलेक्शन के लिए जो कुछ भी करना होगा, वो किया जाएगा।
जो लोग भारत में गृहयुद्ध या सत्ता परिवर्तन का सपना देख रहे हैं, वो भूल जाते हैं कि दुनिया की टॉप इंटेलिजेंसी भारत के पास है। विपक्षी ताकतें पूरी तैयारी में हैं तो केंद्र सरकार इस प्रोटेस्ट को रोकने के लिए कोशिशों में जुटी है, देखना यह होगा कि अब तक के सबसे बड़े आंदोलन से मोदी सरकार कैसे मुकाबला करती है।
अंत में आपके लिए सवाल हैं: भारत में दंगा, विवाद या गृहयुद्ध हो जाए और इंटरनेट बंद करना पड़े और इसकी चाबी भारत के बजाए अमेरिकी प्राइवेट कंपनी के पास हो तो क्या दंगा रोका जा सकेगा?
——भारत में मोदी सरकार ने अब तक किसानों को डीबीटी के जरिए करीब 4 लाख करोड़ की सब्सिडी दी है, इसके अलावा करीब 10 लाख करोड़ की खाद्य—बीज सब्सिडी दी जा चुकी है, लेकिन अमेरिका एक साल में ही अपने किसानों को 27 लाख करोड़ रुपये देता है, ऐसे हालात में भारत का किसान क्या अमेरिकी अमीर किसानों से मुकाबला कर सकता है?
——राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनना है, चुनाव लड़कर नहीं, बल्कि मोदी का तख्ता पलट करके। प्रोटेस्ट करेंगे, लेकिन महंगाई और बेरोजगारी के जमीनी मुद्दों पर प्रोटेस्ट नहीं करते, और चुनाव आयोग के खिलाफ सबूतों के साथ कोर्ट में नहीं जाते और सड़क पर कैमरों के सामने पोज देकर, वीडियो बनवाकर पीएम बन जाना चाहते हैं, तो क्या हो पाएगा?
——केजरीवाल एक्सपोज हो चुके हैं, तो अपनी बी टीम को विदेशी फंडिंग के दम पर मैदान में उतार दिया है, क्या इन 10—20 हजार भटके हुए नौजवानों के दम पर सत्ता में आ पाएंगे?

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