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गहलोत की जादूगरी के मोहरे हैं पायलट-डोटासरा-जूली जैसे नेता!


राजस्थान की कांग्रेस राजनीति को अगर किसी एक नाम में समझना हो, तो वह Ashok Gehlot हैं। दशकों से सत्ता के गलियारों में मौजूद यह नेता सिर्फ मुख्यमंत्री या संगठनात्मक चेहरा नहीं रहा, बल्कि एक ऐसी राजनीतिक प्रवृत्ति बन चुका है जो अपने सहयोगियों, शिष्यों और प्रतिस्पर्धियों, तीनों को गढ़ता भी है और ज़रूरत पड़ने पर तोड़ता भी है। इतिहास बताता है कि राजनीति में टिके रहने वाले नेता इसी सूत्र से अमर हुए हैं।

आज जब राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष Govind Singh Dotasra का कद बढ़ता दिख रहा है, Sachin Pilot राष्ट्रीय महासचिव बनकर सत्ता के केंद्र के करीब माने जा रहे हैं और नेता प्रतिपक्ष Tikaram Jully संतुलन की राजनीति में ‘सबका नेता’ कहे जाने लगे हैं, तब भी इस पूरी बिसात पर सबसे भारी मोहरा Ashok Gehlot ही हैं। राजस्थान कांग्रेस का इतिहास गवाह है कि जो नेता Gehlot के सहयोग से बड़ा हुआ या उनके समांतर खड़ा होने लगा, उसे समय आने पर उनकी सियासी जादूगरी ने किनारे भी किया।

Govind Singh Dotasra का उभार अचानक नहीं है। जुलाई 2020 में Gehlot–Pilot टकराव के बीच प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने संगठन को ज़मीनी स्तर तक सक्रिय रखने की कोशिश की। सरकार के कार्यकाल में उनका प्रदर्शन असाधारण नहीं रहा। मंत्री Shanti Dhariwal से लेकर Pratap Singh Khachariyawas तक ने उन्हें खुलकर सर्वमान्य अध्यक्ष स्वीकार नहीं किया। इसके बावजूद 2023 की हार के बाद जिस तरह Dotasra ने किसान राजनीति के रिक्त स्थान को पहचाना, वही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक समझ साबित हुई। MSP, बिजली, खाद, बीमा और फसल कीमत जैसे मुद्दों पर लगातार सड़क पर उतरकर उन्होंने खुद को कांग्रेस का किसान चेहरा बना लिया। यही वजह रही कि जुलाई 2025 में कार्यकाल पूरा होने के बाद भी आलाकमान ने उन्हें हटाने की बजाय खुली छूट दे दी।

यहीं से Ashok Gehlot की राजनीति सक्रिय होती है। कांग्रेस में जैसे ही कोई नेता ‘सर्वमान्य’ होने लगता है, Gehlot की रणनीति पर्दे के पीछे से चलने लगती है। 2022 में विधायकों की बगावत के बाद माना गया कि आलाकमान ने Gehlot को साइडलाइन कर दिया है, लेकिन राजनीति में साइडलाइन होना और अप्रासंगिक होना अलग बातें हैं। Gehlot आज भले किसी पद पर न हों, लेकिन उनके पास समय, अनुभव, नेटवर्क और पांच दशक की राजनीतिक पूंजी है।

अगर पीछे जाएं तो यही पैटर्न बार-बार दिखता है। 1980–90 के दशक में Jai Narayan Vyas और Jagannath Pahadia जैसे नेता बड़े चेहरे बने, लेकिन Gehlot ने संगठन और दिल्ली दरबार में अपनी पकड़ मजबूत की। Pahadia के मुख्यमंत्री रहते ही Gehlot ने सत्ता के असली सूत्र पहचान लिए। एक बयान पर Pahadia के हटने के बाद वे धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए, जबकि केंद्रीय राजनीति में Gehlot उभरते चले गए।

इसके बाद 90 और 2000 के दशक में Parasram Maderna और Mahipal Maderna का दौर आया। उस समय Maderna परिवार बेहद ताकतवर माना जाता था। Gehlot ने उनके साथ काम भी किया और उनसे सीखा भी, लेकिन जैसे ही यह परिवार मुख्यमंत्री पद की राह में बाधा बना, सत्ता संतुलन ने करवट ली। Parasram Maderna को किनारे करना और Mahipal Maderna का पतन व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि सत्ता संघर्ष का परिणाम था, जिसमें विजेता Gehlot ही बने।

2003 में सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस में नए चेहरे तलाशे गए। CP Joshi, Girija Vyas, Narayan Singh जैसे नेता उभरे, लेकिन संगठन और विधायक दल में Gehlot की पकड़ के आगे वे टिक नहीं पाए। यही कहानी 2018 में Rameshwar Dudi के साथ दोहराई गई। नेता प्रतिपक्ष रहते उनका कद बढ़ा, लेकिन जैसे ही वे निर्णायक दिखे, नोखा से चुनाव हारकर धीरे-धीरे हाशिये पर चले गए।

सबसे बड़ा उदाहरण Sachin Pilot हैं। 2018 की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार Pilot को उपमुख्यमंत्री बनाकर सत्ता Gehlot के पास रही। 2020 का विद्रोह महत्वाकांक्षा और अधूरे वादों का नतीजा था, लेकिन उसका अंत इसी सच्चाई के साथ हुआ कि Rajasthan Congress में Gehlot को मात दिए बिना मुख्यमंत्री बनना आसान नहीं। आज Pilot राष्ट्रीय महासचिव हैं और उन्हें लगता है कि गांधी परिवार के करीब होने से 2028 की राह आसान होगी, लेकिन इतिहास चेतावनी देता है कि Gehlot को हल्के में लेना भारी पड़ सकता है।

Govind Singh Dotasra की स्थिति भी अलग नहीं है। वे आज संगठन के सबसे स्वीकार्य चेहरे हैं, किसान राजनीति के प्रतिनिधि हैं और पार्टी पर पकड़ भी रखते हैं, लेकिन यही उनकी कमजोरी भी है। कांग्रेस में मुख्यमंत्री दौड़ में सबसे पहले प्रदेश अध्यक्ष ही निशाने पर आता है। मीडिया का एक वर्ग Dotasra की नकारात्मक छवि गढ़ने में लगा है, जबकि उसी वर्ग के लिए Gehlot आज भी ‘अनुभवी प्रशासक’ हैं। सोशल मीडिया पर भी Gehlot का आक्रामक निवेश साफ दिखता है। बिना किसी पद के वे रणनीति, नैरेटिव और विरोधियों को कमजोर करने की पूरी तैयारी में हैं।

Tikaram Jully की भूमिका संतुलन की राजनीति की उपज है। वे न Gehlot से टकराते हैं, न Pilot को चुनौती देते हैं, न Dotasra की राह रोकते हैं। इसी कारण वे ‘सबका नेता’ बने हुए हैं, लेकिन राजनीति में तटस्थता स्थायी नहीं होती। जैसे-जैसे 2028 नज़दीक आएगा, Jully को भी किसी धड़े के साथ खड़ा होना पड़ेगा—और तब निर्णायक भूमिका फिर Ashok Gehlot की ही होगी।

आज की सच्चाई यह है कि भले ही कांग्रेस आलाकमान ने औपचारिक रूप से Gehlot को आगे न रखा हो, लेकिन Rajasthan Congress में सबसे बड़ी चुनौती वही हैं। Dotasra का बढ़ता कद, Pilot की राष्ट्रीय भूमिका और Jully की संतुलनकारी राजनीति—तीनों के ऊपर Gehlot की छाया है। उनका इतिहास, नेटवर्क और रणनीतिक क्षमता बताती है कि कांग्रेस में सत्ता का अंतिम निर्णायक आज भी वही हैं। जो उनके सहयोग से बना है या उन्हें ओवरटेक करने की कोशिश करता है, उसे अंततः Gehlot की राजनीति का सामना करना ही पड़ता है। यही कारण है कि Dotasra, Pilot और Jully के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती सत्ताधारी BJP नहीं, बल्कि Ashok Gehlot हैं।

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