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पश्चिमी राजस्थान में सियासी पारा क्यों उबल रहा है?


पश्चिमी राजस्थान राजनीतिक रूप से हमेशा सुर्खियों में रहता है। कभी लोकसभा चुनाव, कभी विधानसभा चुनाव और कभी जिलों के गठन को लेकर। इन दिनों पश्चिमी राजस्थान का बाड़मेर जिला फिर से चर्चा का विषय बना हुआ है। बाड़मेर जिले में बालोतरा और धोरीमन्ना को लेकर खड़ा हुआ विवाद सिर्फ एक प्रशासनिक फैसले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्ता, क्षेत्रीय वर्चस्व, जातीय-सामाजिक संतुलन और आने वाले विधानसभा परिसीमन की राजनीति से गहराई से जुड़ा हुआ मामला बन चुका है, जिसमें भाजपा सरकार के मंत्री केके विश्नोई और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री हेमाराम चौधरी आमने-सामने आ गए हैं। इस पूरे विवाद की जड़ 2023 में कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए जिला पुनर्गठन में है, जब अशोक गहलोत सरकार ने बालोतरा को बाड़मेर से अलग कर नया जिला बनाया था। उस समय बायतू को बालोतरा जिले में शामिल किया गया था, जबकि गुड़ामालानी और धोरीमन्ना को बाड़मेर जिले में ही रखा गया था। उस फैसले के पीछे तर्क यह दिया गया था कि गुड़ामालानी और धोरीमन्ना का सामाजिक-भौगोलिक और प्रशासनिक जुड़ाव बाड़मेर के साथ अधिक स्वाभाविक है और लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों, अदालत, कलेक्ट्रेट, अस्पताल और अन्य प्रशासनिक कार्यों के लिए बाड़मेर ज्यादा सुविधाजनक है। गुड़ामलानी और बाड़मेर की दूरी करीब 80 किलोमीटर है, जबकि बालोतरा से गुड़ामलानी 104 किलोमीटर है। ठीक ऐसे ही धोरीमन्ना की बाड़मेर से दूरी 71 किलोमीटर है, जबकि धोरीमन्ना की बोलोतरा से दूरी 121 किलोमीटर है। यानी भोगौलिक तौर पर गुड़ामलानी और धोरीमन्ना बालोतरा के बजाए बाड़मेर के नजदीक हैं। 

कांग्रेस की अशोक गहलोत वाली सरकार ने इसी भोगौलिक समझ के अनुसार गुड़ामलानी और धोरीमन्ना को बालोतरा के बजाए बाड़मेर जिले में रखा था, लेकिन 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और राजस्थान में भाजपा सरकार बनी। सरकार बनने के करीब एक साल बाद दिसंबर 2024 के अंत और जनवरी 2025 की शुरुआत में भाजपा सरकार ने जिला सीमाओं में बड़ा बदलाव करते हुए बायतू को बालोतरा जिले से हटाकर वापस बाड़मेर में शामिल कर दिया और इसके उलट गुड़ामालानी और धोरीमन्ना को बाड़मेर से काटकर बालोतरा जिले में जोड़ दिया। सरकार का यही फैसला इस पूरे विवाद का केंद्र बिंदु बन गया। भाजपा सरकार का तर्क है कि यह बदलाव पैनवार कमेटी की सिफारिशों और प्रशासनिक संतुलन के आधार पर किया गया है, ताकि दोनों जिलों का क्षेत्रफल, जनसंख्या और प्रशासनिक दबाव संतुलित हो सके। लेकिन कांग्रेस और स्थानीय जनता का आरोप है कि यह फैसला न तो जनता से राय लेकर किया गया और न ही जमीनी हकीकत को ध्यान में रखा गया। इस फैसले के कारण गुड़ामलानी और धोरीमन्ना के लोगों को ज्यादा दूर बालोतरा मुख्यालय जाना होगा, जो बेहद खर्चीला साबित होता है। 

इसी मुद्दे पर बाड़मेर के धोरीमन्ना क्षेत्र से आने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हेमाराम चौधरी खुलकर मैदान में उतर आए। हेमाराम चौधरी का कहना है कि धोरीमन्ना और गुड़ामालानी को बालोतरा में जोड़ना जनता पर जबरन थोपा गया फैसला है, जिससे लोगों को प्रशासनिक कामों के लिए ज्यादा दूरी तय करनी पड़ेगी और उनका बाड़मेर से ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक जुड़ाव तोड़ा जा रहा है। उन्होंने एक महीने पहले धोरीमन्ना में अनिश्चितकालीन धरना शुरू किया, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, किसान और कांग्रेस कार्यकर्ता शामिल हुए। हेमाराम चौधरी ने साफ कहा कि यह सिर्फ जिला सीमा का सवाल नहीं है, बल्कि लोगों की पहचान, सुविधा और भविष्य से जुड़ा मुद्दा है और जब तक सरकार यह फैसला वापस नहीं लेती, आंदोलन जारी रहेगा। दूसरी ओर बालोतरा क्षेत्र से आने वाले बीजेपी की राजस्थान सरकार में मंत्री केके विश्नोई इस फैसले के सबसे बड़े समर्थक बनकर सामने आए। विश्नोई का तर्क है कि बालोतरा नया जिला है और उसे मजबूत करने के लिए आसपास के उपखंडों को जोड़ना जरूरी है। हालांकि, एक कार्यक्रम में जब उन्होंने लोगों से पूछा कि बालोतरा में जोड़ा जाए या बाड़मेर में, तो जनता ने तीन बार बाड़मेर का नाम लिया, जो यह साबित करता है कि जनता खुद भी नहीं चाहती कि गुड़ामलानी और धोरीमन्ना को बालोतरा में जोड़ा जाए। 

केके विश्नोई का कहना है कि गुड़ामालानी और धोरीमन्ना को बालोतरा से जोड़ने से प्रशासनिक कामकाज तेज होगा और क्षेत्र के विकास को गति मिलेगी। इस मामले में कांग्रेस का आरोप है कि केके विश्नोई अपने राजनीतिक प्रभाव और क्षेत्रीय वर्चस्व बढ़ाने के लिए यह पुनर्गठन करवा रहे हैं, ताकि बालोतरा जिले में उनका दबदबा मजबूत हो और बाड़मेर की कांग्रेकस राजनीति कमजोर पड़े। यही वजह है कि यह टकराव अब सार्वजनिक सियासत के बजाए व्यक्तिगत लड़ाई का रूप ले चुका है। हेमाराम चौधरी ने सीधे-सीधे केके विश्नोई पर आरोप लगाया है कि वे मंत्री पद का दुरुपयोग कर अपने क्षेत्र को फायदा पहुंचा रहे हैं और बाड़मेर की जनता की भावनाओं को नजरअंदाज कर रहे हैं, जैसा कि जिले बनाते वक्त भाजपा नेताओं ने कांग्रेस सरकार पर लगाए थे। कांग्रेस ने इस मुद्दे को विधानसभा से लेकर सड़क तक उठाया है। अशोक गहलोत, गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली जैसे नेताओं ने इसे तुगलकी फैसला बताते हुए कहा है कि भाजपा सरकार जिला और विधानसभा सीमाओं से छेड़छाड़ कर आने वाले परिसीमन और 2028 के चुनावों के लिए जमीन तैयार कर रही है। कांग्रेस का आरोप है कि 2027 की जनगणना और उसके बाद होने वाले विधानसभा सीटों के लिए परिसीमन को ध्यान में रखकर भाजपा पहले से ही जिलों और उपखंडों का राजनीतिक नक्शा बदल रही है, ताकि अपने पक्ष में समीकरण बनाए जा सकें। 

स्थानीय स्तर पर इस फैसले का विरोध इसलिए भी तेज है, क्योंकि धोरीमन्ना और गुड़ामालानी के लोग दशकों से बाड़मेर को ही अपना जिला केंद्र मानते आए हैं और बालोतरा उनके लिए न सिर्फ भोगौलिक तौर पर दूर है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक रूप से भी कम जुड़ा हुआ है। इस दो महीने के काल में कई जगह स्कूलों, सरकारी दफ्तरों और पंचायतों में नए जिले के नाम लिखे जाने का भी विरोध हुआ है। ऐसे में बालोतरा-धोरीमन्ना जिला विवाद अब प्रशासनिक फाइलों से निकलकर सीधा सड़क और सियासत में आ चुका है, जहां एक तरफ भाजपा के मंत्री केके विश्नोई सरकार के फैसले को जिलों के विकास और संतुलन का नाम दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हेमाराम चौधरी और पूरी कांग्रेस पार्टी इसे जनता के साथ अन्याय और राजनीतिक साजिश बता रहे हैं। इसमें कोई दोहराय नहीं है कि यह टकराव आने वाले दिनों में बाड़मेर और बालोतरा की राजनीति को और ज्यादा गरमाने वाला है, क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ बाड़मेर या बालोतरा जिले की नहीं, बल्कि नेताओं के प्रभाव, उनकी राजनीतिक पहचान और जमीनी सियासत की जंग बन चुकी है।

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