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जनता के सेवक या सदन के मेहमान?


राजस्थान विधानसभा का बजट सत्र समाप्त हो गया। 24 दिन चला, 200 विधायक मौजूद रहे और जनता को उम्मीद थी कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि उनकी आवाज़ बनेंगे। लेकिन जो तस्वीर सामने आई है, वह लोकतंत्र के माथे पर एक गहरा दाग है। भाजपा के 9 और कांग्रेस के 7 विधायक, कुल 16 विधायकों ने तो सदन में सरकार से सवाल ही नहीं पूछे। उन्होंने न प्रश्न पूछे, न बहस में हिस्सा लिया। बस नाम पुकारा गया और वे सदन की कार्यवाही से गायब रहे। यह महज़ एक आँकड़ा नहीं है। यह उस व्यवस्था का आईना है, जिसमें चुनाव जीतना ही लक्ष्य है, जनता की सेवा करना बिलकुल भी नहीं।

सबसे पहले बात करते हैं उन दो महारथियों की, जिन्हें इस प्रदेश का मुख्यमंत्री पद मिल चुका है। अशोक गहलोत, जो राजस्थान की राजनीति के जादूगर कहलाते हैं, 15 साल शासन किया, 23 फरवरी को सदन में आए और मात्र एक दिन में विधानसभा को अलविदा कह दिया। ना कोई सवाल, ना बहस, ना सरकार ​को सुझाव, सदन के बाहर मीडिया में बाइट दी और राजा की तरह अपने रथ में बैठकर रवाना। वसुंधरा राजे का हाल भी यही रहा। 24 फरवरी को सदन में पधारीं, और वह भी केवल एक दिन के लिए। जिन कंधों पर 10 साल तक पूरे प्रदेश की ज़िम्मेदारी थी, वे कंधे अब एक दिन की उपस्थिति में भी झुक जाते हैं। 

सरदारपुरा की जनता पानी की समस्या से जूझ रही है, जर्जर सड़कें हैं, सीवरेज बदहाल है, लेकिन तीन बार सीएम रहने वाले गहलोत साहब के पास इन सवालों के लिए समय नहीं। झालरापाटन में पेयजल संकट है, नए उद्योग नहीं आ रहे, मेडिकल कॉलेज में सुविधाएं नहीं हैं, लेकिन वसुंधरा राजे जी एक दिन की प्रतीकात्मक उपस्थिति देकर अपना कर्तव्य पूरा मान बैठती हैं। क्या यही लोकतंत्र है? क्या विधानसभा इनके लिए कोई फोटो सेशन की जगह बन गई है?

अब बात करते हैं सचिन पायलट की, जो खुद को जनता का नेता बताते नहीं थकते, जो कांग्रेस के भीतर विद्रोह का झंडा उठाते रहे, जो सीएम बनने पर राज्य में बड़े बदलाव की बात करते हैं। टोंक की जनता के लिए सड़क-सीवरेज की समस्या, अवैध बजरी खनन और इंडस्ट्री के अभाव जैसे सवाल उठाने से वंचित रहे। यानी जनता ने जो मुद्दे बताए, वे सदन की दीवारों तक भी नहीं पहुँचे। राजेंद्र पारीक सीकर से हैं, सभापति बनकर सदन की सर्वोच्च सीट पर बैठते हैं। सीकर संभाग में खनन का संकट है, मास्टर प्लान की अनदेखी है, सिटी परिवहन बदहाल है, लेकिन सभापति बनकर सदस्यों को सीख देने वाले पारीक साबह भी सवाल किसी और के लिए छोड़ दिए गए। नरेंद्र बुडानियां तारानगर से जीतकर आए थे। 

यहां बरसाती पानी की निकासी नहीं, रेल सुविधा नहीं है, नहर का पानी नहीं, लेकिन विधायक महोदय के पास सरकार से पूछने के लिए कोई सवाल नहीं है। मिर्धा परिवार के लाड़ले हरेंद्र मिर्धा नागौर से आते हैं, अनिता जाटव हिंडौनसिटी से, दीपचंद खैरिया किशनगढ़बास से, अतुल भंसाली जोधपुर से, सिद्धि कुमारी बीकानेर से, सुरेंद्र सिंह राठौड़ कुंभलगढ़ से, विश्वराज सिंह नाथद्वारा से, शांता देवी सतलूम्बर से, जितेंद्र गोठवाल खंडार से, जयदीप बियाणी श्रीगंगानगर से, दर्शन सिंह करौली से.... इन सभी के क्षेत्रों में ठोस, जमीनी, जीवन को प्रभावित करने वाली समस्याएं हैं। लेकिन इन सबने सदन में सवाल नहीं उठाए। जनता ने मुद्दे सुझाए और विधायकों ने उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया।

यह सोचना भोलापन होगा कि ये सब महज़ लापरवाही है, यह एक सोची-समझी राजनीतिक संस्कृति है। जब कोई विधायक सवाल नहीं पूछता, तो वह सरकार को जवाबदेह नहीं बनाता। जब विपक्षी विधायक चुप रहता है, तो वह अपनी ही पार्टी की विफलताओं को ढकता है। जब सत्तापक्ष के विधायक मौन रहते हैं, तो वे अपनी सरकार की कमियों पर पर्दा डालते हैं। दोनों दलों के विधायकों का एक साथ सवालों से दूर रहना बताता है कि यह कोई पार्टी-लाइन का मामला नहीं, यह पूरी राजनीतिक जमात की एक सामूहिक विफलता है। एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ विधायक होना केवल टिकट पाने, चुनाव जीतने, और अगले चुनाव की तैयारी करने तक सीमित हो गया है।

तीस विधायकों को शून्यकाल में बोलने के लिए विशेष उल्लेख का प्रस्ताव दिया गया, उनका नाम पुकारा गया और वे अनुपस्थित रहे। यह अनुपस्थिति केवल भौतिक नहीं थी, यह नैतिक अनुपस्थिति है। 

जनता पाँच साल में एक बार वोट डालती है, और उम्मीद करती है कि उनका विधायक उनकी आवाज़ बनेगा, लेकिन जब विधायक ही सदन में नहीं है, तो वह आवाज़ जाएगी कहाँ से? राजस्थान की जनता को अब यह तय करना होगा कि वे उन्हें वोट दें जो सदन में बैठकर लड़ते हैं या उन्हें जो महीने में एक दिन आकर अखबारों में फोटो छपवाते हैं। लोकतंत्र में विधायक का काम केवल जीतना नहीं, जूझना भी है और जो जूझता नहीं, वह सेवक नहीं, सदन का मेहमान है।​​​​​​​​​​​​​​​​


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