बीते 11 में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने भारतीय राजनीति में एक ऐसी परंपरा स्थापित की है जो पहले कभी इतने सुनियोजित तरीके से नहीं हुई। राज्यों के अनुभवी मुख्यमंत्रियों को केंद्र की राजनीति में लाकर राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने की अद्भुत रणनीति ने भाजपा को एक अलग धारा में बहने को मजबूर किया गया है। मोदी शाह की यह रणनीति एक तीर से कई निशाने साधती है।
इस रणनीति की शुरुआत गोवा से हुई। मनोहर पर्रिकर गोवा के लोकप्रिय और कुशल मुख्यमंत्री थे। मोदी के पीएम बनने के बाद उनको नवंबर 2014 में दिल्ली बुलाकर रक्षामंत्री बनाया गया। यह मोदी के प्रयोग का पहला चरण था, लेकिन यह प्रयोग उल्टा पड़ा और गोवा में पार्टी कमजोर पड़ने लगी तो मजबूरी में पर्रिकर को मार्च 2017 में वापस भेजना पड़ा। बाद में मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद प्रमोद सावंत मुख्यमंत्री बने।
मोदी के गृह राज्य गुजरात में यह प्रयोग दो बार किया गया। मोदी के पीएम बनने के बाद रिक्त हुई सीएम सीट पर पहले आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन अगस्त 2016 में इस्तीफा लेकर उन्हें राज्यपाल बनाया गया। आनंदी की जगह आए विजय रुपाणी को सितंबर 2021 में हटाकर राज्यसभा सांसद बनाया गया। हालांकि, पिछले साल अहमदाबाद विमान हादसे में उनका निधन हो गया। विजयी रुपाणी को 2021 में हटाया तो भूपेंद्र पटेल गुजरात को नया मुख्यमंत्री बनाया। 2022 के चुनाव के बाद पटेल दूसरी बार सीएम बने। गुजरात में दो-दो बार यह प्रयोग किया गया।
उत्तराखंड में तो तीन-तीन मुख्यमंत्री बदले गए। त्रिवेंद्र सिंह रावत को मार्च 2021 में हटाया गया। उनकी जगह आए तीरथ सिंह रावत को महज 114 दिनों में जुलाई 2021 में पद छोड़ना पड़ा। दोनों को दिल्ली लाया गया और पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री बने। पिछले चुनाव में विधायक का चुनाव हारने के बाद भी धामी को सीएम बना दिया गया। यह उत्तराखंड प्रयोग बताता है कि मोदी-शाह नेता की लोकप्रियता से ज्यादा पार्टी पर अपने नियंत्रण की परवाह करते हैं।
कर्नाटक में तीन पूर्व मुख्यमंत्री दिल्ली पहुंचे। येदियुरप्पा ने जुलाई 2021 में इस्तीफा दिया और अब BJP पार्लियामेंट्री बोर्ड के सदस्य हैं। 2023 का चुनाव हारने के बावजूद बसवराज बोम्मई और जगदीश शेट्टर दोनों को सांसद बनाकर दिल्ली लाया गया। कर्नाटक हारने के बावजूद तीनों पूर्व मुख्यमंत्रियों को राष्ट्रीय स्तर पर खपाया गया। असम में सर्बानंद सोनोवाल को 2021 में हटाकर केंद्र में मंत्री बनाया गया और हिमंत बिस्वा सरमा नए मुख्यमंत्री बने। ऐसे ही त्रिपुरा में मई 2022 में बिप्लब कुमार देब को हटाकर राज्यसभा सांसद बनाया गया और माणिक साहा मुख्यमंत्री बने।
2023 का बदलाव सबसे बड़ा और सबसे साहसी कदम था। तीन बड़े राज्यों में एक साथ मुख्यमंत्री बदले गए। मध्यप्रदेश में 18 वर्षों तक राज करने वाले शिवराज सिंह चौहान को दिसंबर 2023 में हटाकर केंद्र में कृषि मंत्री बनाया गया और मोहन यादव मुख्यमंत्री बने। हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को मार्च 2024 में हटाकर आवास मंत्री बनाया गया और नायब सिंह सैनी मुख्यमंत्री बने। छत्तीसगढ़ के रमन सिंह इस पूरी सूची में एक अपवाद हैं। उन्हें दिल्ली नहीं लाया गया, बल्कि छत्तीसगढ़ में ही विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया।
राजस्थान में वसुंधरा राजे को दिसंबर 2023 में दरकिनार किया गया और भजनलाल शर्मा मुख्यमंत्री बने, लेकिन वसुंधरा का मामला बाकी सभी से बिल्कुल अलग है। उन्हें न केंद्र में मंत्री बनाया गया, न राज्यपाल, न सांसद, सिर्फ “राष्ट्रीय उपाध्यक्ष” का एक खोखला औपचारिक पद दिया गया। इसके पीछे कई ठोस राजनीतिक कारण हैं।
वसुंधरा राजे राजस्थान में अपना स्वतंत्र सत्ता केंद्र रखती हैं। उनके समर्थक विधायक और कार्यकर्ता सीधे उनसे जुड़े हैं, पार्टी से जुड़कर भी जुड़े हुए नहीं दिखते हैं। मोदी-शाह किसी भी ऐसे नेता को केंद्र में लाना नहीं चाहते जो दिल्ली में भी अपना अलग गुट बना सके। वसुंधरा राजे सिंधिया परिवार से हैं और उनके पुत्र दुष्यंत सिंह भी सांसद हैं, जो BJP की परिवारवाद विरोधी छवि से मेल नहीं खाते। 2018 और 2023 दोनों विधानसभा चुनावों में वसुंधरा ने टिकट वितरण से लेकर प्रचार तक हाईकमान की नहीं सुनी, यह “अनुशासनहीनता” मोदी-शाह की केंद्रीकृत नेतृत्व शैली को स्वीकार्य नहीं। बीजेपी सूत्रों के अनुसार वसुंधरा ने राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति जैसे बड़े संवैधानिक पद की इच्छा जताई थी, इस मोलभाव की राजनीति ने मोदी-शाह को नाराज किया। बावजूद इसके वसुंधरा को पूरी तरह निष्क्रिय भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनके बिना राजस्थान में पार्टी कमजोर होगी, लेकिन इतना सशक्त भी नहीं करना कि वे मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के समानांतर सत्ता चलाने लगें। इसीलिए एक औपचारिक पद दे रखा है जिसमें न पूरी शक्ति, न पूरी उपेक्षा है। वसुंधरा राजे इस पूरे मॉडल में एकमात्र “अटकी हुई” नेता हैं, जो न पूरी तरह अंदर, न पूरी तरह बाहर हैं। यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक त्रासदी है।
मोदी के तीसरे कार्यकाल में भी यह सिलसिला जारी है। मणिपुर में एन. बीरेन सिंह को फरवरी 2025 में हटाकर युमनाम खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया और अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को राज्यसभा सांसद बनाकर दिल्ली बुला लिया गया है। वर्तमान उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का बिहार का अगला मुख्यमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है। ठीक वैसे ही जैसे महाराष्ट्र में उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया गया।
सबसे बड़ा सवाल है 2029 तक और कौन-कौन मुख्यमंत्री दिल्ली आएगा? मोदी-शाह की रणनीति के अनुसार दो और नाम आने की संभावना है, जिनमें से एक नाम बहुत चौंकाने वाला होगा। वह चौंकाने वाला नाम यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ हो सकता है। उत्तरप्रदेश जैसे सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री को दिल्ली लाना BJP के लिए जोखिम भरा है, लेकिन रणनीतिक रूप से अमित शाह के लिए बेहद फायदेमंद हो सकता है। योगी का अपना जनाधार मोदी-शाह के लिए एक चुनौती भी है और संपत्ति भी, इसीलिए उन्हें केंद्र में लाकर “नियंत्रित” करना इस रणनीति का स्वाभाविक अगला कदम हो सकता है। दूसरा संभावित नाम हिमंत बिस्वा सरमा हो सकते हैं, जिन्हें पूर्वोत्तर की राजनीति के सबसे धुरंधर खिलाड़ी के रूप में राष्ट्रीय भूमिका देना BJP के पूर्वोत्तर विस्तार की दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा।
इस पूरी रणनीति के पाँच स्तंभ हैं। राज्य में 10-15 साल काम करने वाले मुख्यमंत्री के प्रशासनिक अनुभव को केंद्रीय मंत्रालयों में लगाना। पुराने चेहरों को हटाकर युवा और OBC/दलित नेताओं को आगे लाना, सैनी, मोहन यादव, भजनलाल, धामी— सभी नई पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। शिवराज जैसे 18 साल के दिग्गज को भी हटाकर यह संदेश देना कि पार्टी किसी एक व्यक्ति से बड़ी है, जिससे बाकी मुख्यमंत्री हाईकमान के प्रति अधिक उत्तरदायी रहते हैं। पुराने नेताओं को बेइज्जत करने की बजाय केंद्र में लाकर “प्रमोशन” का आभास देना, ताकि विद्रोह की संभावना कम हो। 2029 के लोकसभा चुनाव में अनुभवी चेहरों को राष्ट्रीय प्रचार में उतारने की तैयारी करना।
मोदी-शाह की यह “दिल्ली वापसी” रणनीति दरअसल केंद्रीकृत नेतृत्व का सबसे परिपक्व मॉडल है। इसमें न तो पुराने नेताओं को बर्बाद किया जाता है, न ही उन्हें इतना शक्तिशाली रहने दिया जाता है कि वे हाईकमान को चुनौती दे सकें। राज्यों में नए और आज्ञाकारी चेहरे लाए जाते हैं, पुराने अनुभवी नेताओं को राष्ट्रीय मंच मिलता है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इससे पार्टी का नियंत्रण हमेशा मोदी-शाह के हाथ में रहता है।

Post a Comment