आज बात करते हैं राजस्थान की उस सियासी हलचल की, जो इन दिनों जयपुर से दिल्ली तक गलियारों में गूँज रही है। 21 जून 2026, यह वो तारीख है जब राजस्थान की तीन राज्यसभा सीटें खाली होने वाली हैं, और इन तीन सीटों को लेकर राजस्थान की राजनीति में जो खिचड़ी पक रही है, उसे समझना ज़रूरी है। क्योंकि यह सिर्फ तीन सीटों का चुनाव नहीं है, यह राजस्थान की ज़मीनी सियासत, जातीय समीकरण और दोनों बड़े दलों की रणनीति का आईना है।
पहले सीटों का गणित समझते हैं। भाजपा के रवनीत सिंह बिट्टू, राजेंद्र गहलोत और कांग्रेस के नीरज डांगी का कार्यकाल 21 जून 2026 को समाप्त हो रहा है। तीन सीटें खाली, और अब शुरू होती है असली कहानी। राजस्थान विधानसभा में उपचुनावों के बाद भाजपा के 119, कांग्रेस के 67, भारतीय आदिवासी पार्टी के 4, बसपा के 2, राष्ट्रीय लोकदल के 1 और निर्दलीय 8 विधायक हैं। राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए करीब 51 वोट चाहिए।
भाजपा के पास 119, यानी दो सीटें आराम से जीत जाएगी। कांग्रेस के पास 67 विधायक हैं, जिससे एक सीट पर जीत सुनिश्चित नज़र आ रही है, लेकिन दूसरी सीट के लिए निर्दलीयों का साथ जुटाना होगा जो मुश्किल दिख रहा है। यानी तस्वीर साफ़ है, भाजपा 2, कांग्रेस 1, लेकिन राजनीति में गणित अकेले नहीं जीतता... जाति, क्षेत्र और व्यक्तित्व भी उतना ही मायने रखते हैं।
अब बात करते हैं उन नामों की जो इन दिनों सबसे ज़्यादा चर्चा में हैं। भाजपा की दूसरी सीट के लिए सबसे ऊपर पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ का नाम है। इनके अलावा सतीश पूनियां का नाम भी मज़बूत दावेदार के रूप में सामने आ रहा है, जो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और किसान समुदाय में बीजेपी की ओर से मजबूत पकड़ मानी जाती है। तीसरा नाम अशोक परनामी का भी चर्चा में है, जो वसुंधरा राजे के करीबी वफादार माने जाते हैं।
यहाँ एक बात गौर करने वाली है, भाजपा इस चुनाव को सिर्फ राज्यसभा की सीट नहीं मान रही। भाजपा इन नामों से आने वाले स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में अपना आधार मज़बूत करना चाहती है। यानी राज्यसभा का यह टिकट आने वाले ज़मीनी चुनावों की तैयारी का हिस्सा है। राजेंद्र राठौड़ और सतीश पूनियां के बीच की यह होड़ दिलचस्प है।
राजेंद्र राठौड़ राजपूत चेहरा और राजस्थान की राजनीति के लंबे अनुभवी नेता हैं। सतीश पूनिया किसान समुदाय का भरोसेमंद चेहरा और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष हैं। दोनों के बीच चुनाव का मतलब है कि भाजपा को तय करना होगा राजपूत को साधें या जाट को? और यही फ़ैसला तय करेगा कि भाजपा 2028 के विधानसभा चुनाव की नींव कहाँ से रखना चाहती है।
अब कांग्रेस की तरफ आते हैं। कांग्रेस की एक सीट को लेकर पार्टी के भीतर मंथन तेज़ है। अंतिम निर्णय पार्टी आलाकमान को करना है, लेकिन उससे पहले प्रदेश स्तर पर सियासी बिसात बिछ चुकी है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा भी अपनी दावेदारी मज़बूत कर रहे हैं। कांग्रेस महासचिव भंवर जितेंद्र सिंह का नाम भी चर्चा में है। इसके अलावा चूरू से चुनाव लड़ चुके रफ़ीक़ मंडेलिया ने भी राज्यसभा जाने की इच्छा जताई है।
कांग्रेस के सामने एक और बड़ा सियासी पेंच है। वर्तमान में प्रदेश अध्यक्ष OBC वर्ग से हैं और नेता प्रतिपक्ष दलित वर्ग से, ऐसे में पार्टी अल्पसंख्यक या सामान्य वर्ग के किसी चेहरे को मौका देने पर विचार कर सकती है। यानी कांग्रेस के लिए यह सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं, यह सामाजिक संतुलन का सवाल है। गलत चुनाव हुआ तो किसी एक जाति या वर्ग में नाराज़गी तय है। यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है जो राजस्थान की राजनीति में अक्सर दब जाता है। राज्यसभा का टिकट मिलता किसे है? जो सबसे ज़्यादा काबिल हो? या जो सबसे ज़्यादा पैसा लगा सके? या जो जातीय समीकरण को साध सके?
राजस्थान के मतदाता से पूछिए, वो बताएगा कि उसके विधायक ने पिछले पाँच साल में उसके लिए क्या किया। लेकिन उस विधायक का वोट किस आधार पर जाएगा राज्यसभा में, यह सवाल हमेशा अँधेरे में रहता है। यही लोकतंत्र की वो खिड़की है जो आम जनता की नज़रों से छुपी है। राजस्थान की इस राज्यसभा लड़ाई में आने वाले हफ़्तों में कई नाम उभरेंगे, और दावेदारियाँ तेज़ होंगी।
भाजपा के लिए चुनौती है कि दो सीटों पर किस-किस को बिठाए, बिना किसी धड़े को नाराज़ किए। और कांग्रेस के लिए चुनौती है कि एक सीट बचाते हुए अपना घर एकजुट रखे। दोनों के लिए यह राज्यसभा चुनाव 2028 की विधानसभा की रिहर्सल है। राजस्थान की ज़मीन बदलने का संकेत इन तीन सीटों में छुपा है।

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