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39% वोट से 3% तक कैसे कांग्रेस ने खुद अपने हाथों से गंवाया पश्चिम बंगाल का किला


कोलकाता। 

18 अप्रैल 1975, जयप्रकाश नारायण का काफिला कलकत्ता विश्वविद्यालय के ऑडिटोरियम के सामने से गुजर रहा था। अचानक भीड़ में से एक 20 साल की लड़की निकली और जेपी की एंबेसेडर कार के बोनट पर चढ़कर नाचने लगी। उस लड़की का नाम था ममता बनर्जी। उस एक पल ने न सिर्फ ममता की ज़िंदगी बदली, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति का भविष्य भी तय कर दिया, लेकिन ममता की कहानी से पहले उस पार्टी की कहानी समझनी होगी जिसने पश्चिम बंगाल में 25 साल राज किया और फिर ऐसे गायब हुई जैसे कभी थी ही नहीं।

25 साल की सत्ता, फिर अचानक शून्य

1952 में पश्चिम बंगाल में पहली बार चुनाव हुए। 238 में से 150 सीटें कांग्रेस ने जीतीं। वामपंथी CPI को 41 और जनसंघ के राइट ब्लॉक को 13 सीटें मिलीं। प्रधानमंत्री नेहरू और महात्मा गांधी के निजी चिकित्सक रहे बिधान चंद्र रॉय मुख्यमंत्री बने। इसके बाद कांग्रेस लगातार 20 साल और कुल 25 साल सत्ता में रही।

लेकिन 1977 के बाद से आज तक कांग्रेस पश्चिम बंगाल में अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई। कभी 39 प्रतिशत से ज़्यादा रहा वोट शेयर आज 3 प्रतिशत से भी कम है। एक भी विधायक नहीं है। तो आख़िर यह हुआ कैसे?

ममता ने कांग्रेस का 30% वोट झपट लिया

जेपी के काफिले पर चढ़कर ममता ने जो ध्यान खींचा वो इंदिरा गांधी की नज़रों तक पहुंचा और वो रातों-रात इंदिरा की चहेती बन गईं। 1984 के लोकसभा चुनाव में महज 29 साल की ममता ने वामपंथ के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हरा दिया। उसी साल उन्हें प्रदेश युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया।

लेकिन 1992 में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के चहेते सोमेन मित्रा से हार के बाद ममता का कद प्रणब मुखर्जी, प्रियरंजन दासमुंशी और सोमेन मित्रा जैसे दिग्गजों को चुभने लगा। आखिरकार ममता को युवा कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा।

फिर आई वो तारीख जो कांग्रेस के लिए कब्र खोद गई। 9 अगस्त 1997 को कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में कांग्रेस अधिवेशन हो रहा था और ममता को न्योता नहीं था। नाराज ममता ने स्टेडियम के बाहर रैली बुला ली। वरिष्ठ पत्रकार कल्याणी शंकर अपनी किताब 'Pandora's Daughters' में लिखती हैं कि सीताराम केसरी ने ममता की रैली रोकने की पूरी कोशिश की, कई नेताओं को मनाने के लिए भेजा, लेकिन ममता अड़ी रहीं। हज़ारों लोगों की भीड़ देखकर ममता ने ऐलान किया कि "हमारी रैली में आने वाले ही असली तृणमूल कांग्रेस वर्कर हैं।"

घबराए कांग्रेस नेताओं ने आनन-फानन में दिल्ली में आधी रात को ममता और सोनिया गांधी की बैठक कराई। ममता ने कहा कि "मैं पार्टी से अलग नहीं हो रही, लेकिन तृणमूल को तभी भंग करूंगी जब सोनिया राष्ट्रीय अध्यक्ष बनेंगी।" लेकिन वो मुलाकात बेनतीजा रही। ममता ने बाद में कहा कि "अब मैं सोनिया गांधी या कांग्रेस से बात करने से नफरत करती हूं, क्योंकि उन्होंने 9 दिन इंतज़ार कराया और बदले में मुझे पार्टी से निष्कासन मिला।"

1 जनवरी 1998 को ममता ने तृणमूल कांग्रेस बनाई। अगले ही चुनाव में TMC को करीब 25 प्रतिशत वोट मिले जो कांग्रेस से 9 प्रतिशत ज़्यादा था। कांग्रेस का करीब 30 प्रतिशत वोट एक झटके में खिसक गया और फिर कभी वापस नहीं आया।

तीन बड़ी वजहें जो कांग्रेस को ले डूबीं

पहली वजह सामाजिक थी। बंगाल की सामाजिक संरचना ने ही कांग्रेस के पतन की नींव रखी। एक तरफ भद्रलोक यानी जमींदार और शिक्षित मध्यवर्ग, दूसरी तरफ भूमिहीन किसान और मजदूर। कांग्रेस की पकड़ मुख्य रूप से भद्रलोक तक सीमित रही। वामपंथी लेफ्ट ने इसी खाई को हथियार बनाया। हर गांव और हर मोहल्ले में कैडर खड़ा किया। संदेश साफ था कि कैडर से जुड़ो तो रोज़गार मिलेगा, ज़मीन मिलेगी, न्याय मिलेगा।

आज़ादी के बाद पूर्वी पाकिस्तान से 50 लाख से ज़्यादा हिंदू शरणार्थी पश्चिम बंगाल आए। कांग्रेस सरकार उनकी ज़रूरतें पूरी करने में नाकाम रही। मीडिया ने तब कांग्रेस को 'स्लीपिंग गवर्नमेंट' कहा। लेफ्ट ने इन्हीं बेघर और बेज़मीन लोगों के बीच जाकर संगठन बनाया। 1967 में नक्सलबाड़ी से उठी चिंगारी ने कॉलेज-यूनिवर्सिटी तक आग फैला दी और लेफ्ट को वो वैचारिक आधार मिला जो कांग्रेस के पास कभी नहीं था।

दूसरी वजह राजनीतिक थी। इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री बनते ही क्षेत्रीय नेताओं को हाशिए पर धकेलना शुरू किया। वरिष्ठ पत्रकार सुमन भट्टाचार्य कहते हैं कि "कांग्रेस में नेता संकट इंदिरा गांधी की देन है। जो ताकतवर क्षेत्रीय नेता थे उन्हें खत्म कर दिया गया। ममता बनर्जी ने कांग्रेस में रहते हुए कई बार कहा था कि लेफ्ट का मुकाबला करने के लिए क्षेत्रीय नेता चाहिए, लेकिन किसी को आगे नहीं किया गया।" 1967 में अजय मुखर्जी ने कांग्रेस तोड़कर 'बांग्ला कांग्रेस' बनाई और लेफ्ट के साथ मिलकर पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बना दी। इमरजेंसी की प्रतिक्रिया में 1977 के चुनाव में लेफ्ट ने 294 में से 231 सीटें जीत लीं और कांग्रेस 20 सीटों पर सिमट गई।

तीसरी वजह आर्थिक थी। आज़ादी के वक्त पश्चिम बंगाल देश के कुल औद्योगिक उत्पादन में 27 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता था, संयुक्त महाराष्ट्र और गुजरात से भी आगे। लेकिन 1956-57 में महाराष्ट्र को 2,741 औद्योगिक लाइसेंस मिले, जबकि बंगाल को सिर्फ 1,493। जूट निर्यात में राज्य का हिस्सा घटाया गया। राजस्व में हिस्सा 20 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत कर दिया गया, जबकि बॉम्बे का 21 प्रतिशत कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि 1960 तक उत्पादन में हिस्सेदारी 27 से घटकर 17 प्रतिशत रह गई। खुद कांग्रेस के मुख्यमंत्री बिधान चंद्र रॉय को नेहरू से कहना पड़ा कि "हमें शरणार्थियों से भी कम फंड मिल रहा है।" सत्ता में आते ही लेफ्ट ने 'ऑपरेशन बर्गा' के तहत बटाईदार किसानों को कानूनी अधिकार दिए और भूमिहीनों को ज़मीनें बांटीं। वही वर्ग जो कभी कांग्रेस का कोर वोट बैंक था, ज़मीन का पट्टा मिलते ही लेफ्ट का हो गया और फिर कभी वापस नहीं आया।

आज भी वापसी का रास्ता नहीं दिख रहा

2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ गठबंधन किया और 92 सीटों पर लड़ी, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई। इस बार कांग्रेस सभी सीटों पर अकेले लड़ रही है।

वरिष्ठ पत्रकार सुमन भट्टाचार्य के अनुसार बंगाल में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों लोकप्रिय हैं, लेकिन भारत जोड़ो यात्रा में वो पश्चिम बंगाल में सिर्फ मुर्शिदाबाद और मालदा ही गए। 2021 के चुनाव में 8 चरणों में से पहले 4 चरणों के दौरान राहुल और प्रियंका प्रचार के लिए नहीं गए। पांचवें चरण में राहुल एक बार आए और फिर कोविड का हवाला देकर सभी रैलियां रद्द कर दीं।

इस बार भी कांग्रेस केरल में पूरी जान लगा रही है, लेकिन पश्चिम बंगाल में वही लगन नहीं दिख रही। सोशल मीडिया पर भी बंगाल को लेकर कांग्रेस खास सक्रिय नहीं है। जानकारों का कहना है कि कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व जानबूझकर खुद को पीछे रख रही है ताकि ममता बनर्जी नाराज न हों और INDIA गठबंधन में दरार न आए। इसलिए यह लगभग तय है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का हाल पिछले चुनाव जैसा ही रहेगा।

जो पार्टी 1952 में 150 सीटें जीती थी, आज उसके पास एक भी विधायक नहीं है। यह महज़ चुनावी हार नहीं है, यह किसी बड़े राजनीतिक दल के धीरे-धीरे खुद को मिटा लेने की दास्तां है।

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