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गहलोत के मंच पर चांदना का बम: पायलट पर गुर्जर लीडरशिप खत्म करने का आरोप!


एक मंच, जिसपर एक तरफ बैठे हैं अशोक गहलोत, गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली, और उसी मंच पर खड़े होकर अशोक चांदना कह रहे हैं, "राजस्थान में गुर्जरों की लीडरशिप खत्म करने का काम किया जा रहा है।" यह बयान जब उन्हीं नेताओं के सामने से आए, जिनकी तरफ इशारा था, तो समझिए यह एक सियासी बम था, जो सधे हुए हाथों से दूर दिल्ली में फेंका गया।

आज की कहानी है अशोक चांदना की, जो राजस्थान के हिण्डोली से कांग्रेस विधायक हैं, पूर्व मंत्री हैं, और वो नेता जिसकी राजनीतिक यात्रा बदलते माहौल के साथ गुट बदलने के तौर बेहद पेचीदा दिखाई देती है। सचिन पायलट के साथ कंधा मिलाकर चलने से लेकर बगावत के वक्त सत्ता बचाने के लिए अशोक गहलोत के साथ 34 दिन होटलों में रहने तक, यदि किसी एक नेता को सबसे अधिक भला—बुरा बोला गया तो वो अशोक चांदना हैं, जिनको गुर्जर समाज के एक वर्ग में आज भी सामाजिक गद्दार के तौर पर समझा जाता है।

अशोक चांदना हिण्डोली विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस विधायक हैं और पूर्व में राजस्थान कांग्रेस के युवा कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। चांदना गुर्जर समाज से आते हैं, बूंदी जिले की राजनीति में उनकी मज़बूत पकड़ है। जब 2014 में सचिन पायलट PCC अध्यक्ष बनकर राजस्थान आए, तो चांदना उनके सबसे करीबी नेताओं में थे। पायलट के साथ साये की तरह साथ, हर मंच पर, हर दौरे पर, तब माना जाता था कि चांदना और पायलट का साथ कभी नहीं टूटेगा, लेकिन राजनीति में "कभी नहीं" जैसा कोई शब्द नहीं होता। सत्ता में सब बढ़िया चल रहा था, लेकिन 11 जुलाई 2020 की वो तारीख आई, जिसने सबकुछ बदल दिया। सचिन पायलट ने 2020 में 18 अन्य कांग्रेस विधायकों के साथ गहलोत के नेतृत्व के खिलाफ बगावत कर दी थी। यह बगावत मानेसर के एक रिज़ॉर्ट से की गई थी, जहाँ पायलट समर्थक विधायक जमा हुए थे। यह वो पल था जब हर नेता को अपना पक्ष चुनना था। गहलोत या पायलट। सत्ता या बगावत, और अशोक चांदना ने पायलट के बजाए गहलोत को चुना। कांग्रेस की सत्ता को चुना।

जो नेता पायलट के साथ सबसे ज़्यादा दिखता था, वो बगावत के वक्त पायलट के साथ नहीं था। पायलट समर्थकों ने यह कभी नहीं भुलाया। पुष्कर में गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला की अस्थि विसर्जन के एक कार्यक्रम में जब चांदना भाषण देने पहुँचे तो उन पर जूते फेंके गए और "सचिन पायलट ज़िंदाबाद" के नारे लगाए गए। उस घटना के बाद चांदना ने खुद tweet किया, "अगर सचिन पायलट मुझ पर जूता फेंकवाकर मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं तो जल्दी बन जाएं। जिस दिन मैं लड़ने पर आ गया तो फिर एक ही बचेगा।" यह tweet एक बात साफ कर देता था, चांदना और पायलट के बीच की खाई सिर्फ राजनीतिक नहीं, व्यक्तिगत भी बन चुकी थी।

ऐसे कई मौके आए, जब पायलट के समर्थकों ने चांदना को गद्दार कहा, लेकिन पायलट ने कभी भी चांदना को कुछ नहीं कहा। ताजा घटना भरतपुर की है, जहां बयाना के एक कार्यक्रम में गहलोत, डोटासरा, जूली और चांदना एक साथ मंच पर थे, और इसी मंच से चांदना ने कहा, "राजस्थान में गुर्जरों की लीडरशिप खत्म करने का काम किया जा रहा है। कई पूर्व मंत्रियों को, कई नेताओं को सीलके से निपटाया गया। मुझे भी निपटाने की कोशिश हुई थी, लेकिन मैं बच गया।" अब इस बयान को ध्यान से सुनिए। "सीलके से निपटाना।" "कोशिश हुई थी।" "मैं बच गया।" यह शब्द किसी बाहरी दुश्मन के लिए नहीं बोले जाते, यह शब्द तब बोले जाते हैं, जब खतरा अपनों से हो, पार्टी के अंदर से हो। जब गहलोत, डोटासरा और जूली के सामने यह बयान आए, तो इशारा किसकी तरफ था? सचिन पायलट गुर्जर समाज में सबसे बड़ा नाम है। जिनकी लीडरशिप को 2020 से व्यवस्थित तरीके से कमज़ोर किया गया, PCC अध्यक्ष का पद गया, Deputy CM का पद गया, और उनके समर्थक नेताओं को एक-एक करके हाशिए पर धकेला गया। लेकिन यह तय मानकर चलिए कि अशोक चांदना का यह बयान अचानक नहीं आया। यह अशोक गहलोत की रणनीति की कड़ी है, जो सोच समझकर बनाकर चल रहे हैं।

पिछले कई महीनों से गहलोत अलग-अलग मंचों से सक्रिय हैं। गहलोत ने राधामोहन दास के बयान पर कहा कि भाजपा ने ही पायलट को बहला-फुसलाकर मानेसर भेजा था, और साथ में जोड़ा, "अब सचिन समझ भी गए हैं और संभल भी गए हैं।" यह "बचाव" नहीं, बल्कि backhanded कटाक्ष था? "संभल गए" का मतलब है, "पहले बिगड़े हुए थे।" गहलोत हर बार पायलट की तारीफ करते हुए उनकी बगावत याद दिला देते हैं। अशोक चांदना का बयान गहलोत के मंच से और गहलोत की मौजूदगी में। जब चांदना कहते हैं कि "मुझे निपटाने की कोशिश हुई, लेकिन बच गया", तो यह संदेश गुर्जर समाज तक जाता है कि पायलट समर्थक गुर्जर नेताओं को दबाया गया, और अब जो नेता उनके साथ हैं, वो गहलोत के साथ हैं। आप अच्छे से समझ लीजिए कि यह आज का बयान नहीं है, यह 2028 की बिसात है। चांदना गुर्जर समाज में अपनी पकड़ मज़बूत कर रहे हैं। गहलोत की ज़रूरत है कि गुर्जर वोट उनके साथ रहे, इसलिए चांदना को मंच मिल रहा है, और चांदना को फायदा है कि गहलोत के साथ रहकर वो खुद को "बचा हुआ" और "ज़िंदा" नेता साबित कर रहे हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि गुर्जर समाज की असली ताकत कौन है?

राजस्थान में गुर्जर आरक्षण की लड़ाई दशकों पुरानी है। इसी मुद्दे पर बयाना में गुर्जर आरक्षण महापंचायत हुई थी, जिसमें देशभर के गुर्जर समुदाय के लोगों ने शिरकत की थी। गुर्जर समाज राजनीतिक रूप से काफी संगठित है। राजस्थान में उनकी आबादी लगभग 9 प्रतिशत है। टोंक, भरतपुर, दौसा, सवाई माधोपुर जैसे जिलों में उनका सीधा प्रभाव है। टोंक में जब राधामोहन दास ने पायलट पर हमला किया तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कई जगह राधामोहन दास का पुतला फूंका। यह दिखाता है कि पायलट के समर्थक कितने सक्रिय हैं। तो एक तरफ पायलट के वफादार जो उनके लिए पुतले फूंक रहे हैं। दूसरी तरफ चांदना जो गहलोत के मंच से गुर्जर लीडरशिप खत्म होने की बात कर रहे हैं, और बीच में है गुर्जर समाज, जो देख रहा है कि उनके नाम पर राजनीति हो रही है।

तो सवाल यह उठता है कि क्या चांदना ने जो कहा, वो सच है या राजनीति है? क्या सच में राजस्थान में गुर्जर लीडरशिप खत्म की जा रही है? और अगर हाँ, तो लीडरशिप खत्म किसने की? 2018 से 2023 तक जब कांग्रेस की सरकार थी, तब गुर्जर नेताओं का क्या हुआ? सचिन पायलट, जो गुर्जर समाज का सबसे बड़ा चेहरा हैं, उन्हें Deputy CM बनाकर हाशिए पर क्यों रखा गया? उनके समर्थक मंत्री क्यों कमज़ोर किए गए? और अब जब BJP सत्ता में है, तो गुर्जर समाज के लिए क्या हो रहा है? भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने भी गहलोत के बयान पर कहा कि गहलोत ने पायलट को "नाकारा" और "निकम्मा" जैसे शब्द कहे थे, जो पायलट को हमेशा चुभते रहेंगे। यानी BJP भी इस खेल को देख रही है और अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर रही है।राजस्थान की राजनीति में गुर्जर समाज एक बड़ा vote bank है, और इस vote bank के लिए कांग्रेस के अंदर ही दो लड़ाइयाँ चल रही हैं। पहली गहलोत बनाम पायलट और दूसरी चांदना बनाम पायलट समर्थकों की। दोनों लड़ाइयों में गुर्जर समाज का नाम तो बहुत लिया जाता है, लेकिन उनका फायदा कितना होता है, यह सवाल कोई नहीं पूछता।

राजनीति में जब कोई नेता कहे कि "मुझे निपटाने की कोशिश हुई, लेकिन बच गया" तो समझिए कि या तो वो सच बोल रहा है, या वो अगली चाल चल रहा है, लेकिन राजस्थान कांग्रेस में ये दोनों एक साथ भी हो सकते हैं। 

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