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बीजेपी—कांग्रेस के 9 नेताओं ने जीत लिया दो राज्यों का चुनाव


राजस्थान के 8 नेताओं ने बीजेपी को पश्चिम बंगाल में प्रचंड़ जीत दिलाई, तो कांग्रेस को एक युवा नेता ने केरलम की सत्ता दिला दी। बंगाल में 34 साल का वामपंथी किला ढहा, 15 साल का 'दीदी' का साम्राज्य सिमटा, 90 लाख फर्जी वोटों की सफाई और 'SIR' के प्रहार ने बंगाल में नया इतिहास रच दिया। 206 सीटों वाली बीजेपी की यह प्रचंड जीत केवल सत्ता परिवर्तन नहीं है, लाल झंडे और हरे झंडे से भगवा धारण किए बंगाल के डीएनए का अब पुनर्जन्म होगा। राजस्थान के उन सभी नेताओं का काम और बंगाल में कैसे पहली बार भाजपा ने सत्ता पाई, इसी में छिपा 2029 में भाजपा की चौथी बार सत्ता में आने की कहानी।

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक धरती पर 4 मई 2026 को जो परिणाम आए हैं, उन्होंने भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है। यह रिजल्ट केवल जीत-हार का आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस सत्ता संघर्ष की गाथा है, जिसने बंगाल के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है। बंगाल की राजनीति का पहला बड़ा पड़ाव 1977 में शुरू हुआ था, जब ज्योति बसु के नेतृत्व में वामपंथी मोर्चे ने सत्ता संभाली। 

यह दुनिया का सबसे लंबे समय तक चलने वाला लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित कम्युनिस्ट शासन था, जिसकी ताकत का आधार 'ऑपरेशन बर्गा' के तहत 11 लाख से अधिक किसानों को दिया गया भूमि का अधिकार था, लेकिन 2006 में बुद्धदेव भट्टाचार्य की 'औद्योगिकीकरण' नीति के तहत सिंगूर और नंदीग्राम में हुए संघर्ष और 14 मार्च 2007 की पुलिस फायरिंग ने किसानों को वामपंथ के खिलाफ खड़ा कर दिया, जिससे 34 साल का शासन 2011 में महज 62 सीटों पर सिमटकर खत्म हो गया। यहीं से ममता बनर्जी का उदय हुआ, जिन्होंने 20 मई 2011 को 'मां, माटी, मानुष' के नारे के साथ सत्ता संभाली। 

उन्होंने 'लक्ष्मी भंडार', 'कन्याश्री' और 'स्वास्थ्य साथी' जैसी कल्याणकारी योजनाओं के जरिए महिलाओं का एक अटूट वोट बैंक तैयार किया और 15 साल तक राज किया। हालांकि, पहले नारदा—शारदा और 2021 के बाद शिक्षक भर्ती घोटाला और राशन घोटाले में पार्थ चटर्जी जैसे मंत्रियों की गिरफ्तारी ने उनकी छवि को भारी नुकसान पहुँचाया। मगर 2026 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने जो हासिल किया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं है। जीरो से शुरू होकर 206 सीटों तक पहुँचने के पीछे सबसे बड़ी रणनीति कई लेवल की रही, लेकिन सबसे तेजी से और सबसे अधिक कारगर रही, वाहे 'SIR' (Special Intensive Revision) प्रक्रिया रही। 

चुनाव आयोग द्वारा की गई इस गहन जांच में मतदाता सूचियों से लगभग 90 लाख संदिग्ध और फर्जी नाम हटाए गए, जिसने टीएमसी के 'साइलेंट वोट बैंक' को ध्वस्त कर दिया। इसके साथ ही सीएए के वादे ने मतुआ समुदाय की 40 सीटों पर बीजेपी को क्लीन स्वीप दिलाया और उत्तर बंगाल के राजबंशी व जंगलमहल के आदिवासियों ने बीजेपी का एकमुश्त साथ दिया। इस चुनाव का सबसे चौंकाने वाला पहलू भवानीपुर सीट रही, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद सुवेंदु अधिकारी से 15,105 वोटों के अंतर से ऐतिहासिक हार झेलनी पड़ी। ममता बनर्जी पिछले चुनाव में भी नंदीग्राम से सुवेंदु अधिकारी से हार गई थीं।

बीजेपी की इस जीत में राजस्थान के 8 नेताओं का बड़ा योगदान रहा है। इसको लेकर खुद सुवेंदु अधिकारी ने राजेंद्र राठौड़ को विशेष धन्यवाद दिया है। माना जा रहा है कि अब राजेंद्र राठौड़ को राज्यसभा की सीट मिल सकती है। सुनील बंसल संगठन प्रभारी, चुनाव प्रभारी भुपेंद्र सिंह यादव, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत जैसे 40 नेताओं ने बंगाल में रणनीतिक काम किया। इसके साथ ही बूथ स्तर पर मारवाड़ी लोगों से संपर्क कर उनके साथ मैनेजमेंट किया। 

बंगाल भाजपा को पता है कि राजस्थान के लोगों का बंगाल में कितना प्रभाव है, इसलिए सुवेंदु अधिकारी ने राजस्थान के इन नेताओं को खास महत्व दिया है। केरलम में कांग्रेस ने 10 बाद वापसी की है, जहां पर कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट सीनियर ओब्जर्वर थे, और काफी कुछ उनके हाथ में था। मैनेजमेंट को लेकर सचिन पायलट बहुत अच्छे से जानते हैं। केरलम की राजनीति से वामपंथ शासन का अंत होने के साथ ही 1977 के बाद पहली बार अब देश के किसी भी राज्य में कहीं पर भी कम्यूनिस्ट सरकार नहीं है। 

बंगाल चुनाव के आंकड़ों के आईने में देखें तो 2016 में भाजपा को 3 सीट मिली, 2021 में 77 सीटों पर जीती। रफ्तार को बीजेपी ने कायम रखा और महज 10 साल के भीतर भाजपा 3 से सीधे 200 पार पहुंच गई। इस चुनाव में बीजेपी 48.5% वोट शेयर और 206 सीटों के साथ सत्ता में आई है, जबकि टीएमसी महज 81 सीटों पर सिमट गई और वामपंथ-कांग्रेस गठबंधन सिर्फ 7 सीटों पर टिक सका। 

बीजेपी ने संदेशखाली जैसी घटनाओं को "महिला अस्मिता" से जोड़कर और अमित शाह के "बूथ विजय अभियान" के जरिए टीएमसी के डर को खत्म किया। 1977 से 2011 तक लाल झंडा, 2011 से 2026 तक हरा झंडा और अब 2026 से भगवा ध्वज का यह सफर साबित करता है कि बंगाल की जनता अब 'सिंडिकेट राज' के बजाय विकास और औद्योगिक क्रांति की ओर बढ़ना चाहती है। 

यह परिणाम स्पष्ट करते हैं कि बंगाल में अब परिवर्तन का चक्र पूरा हो चुका है और सत्ता की चाबी अब कालीघाट से निकलकर कोलकाता के नए सत्ता केंद्रों की ओर बढ़ गई है। यह चुनाव केवल इस रिजल्ट तक सीमित नहीं रहेगा, इसका असर पक्के तौर पर अब उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और उसके बाद 2029 में आम चुनाव तक जाएगा। 

भाजपा की रणनीति अगले 5 से 10 साल के लिए बनाई जाती है। अगले चुनाव में भाजपा केरलम पर फोकस करेगी और उसी तरह से दक्षिण के बचे हुए राज्यों पर भी भगवा लहराने का काम शुरू हो चुका है। यही भाजपा है, जो बूथ मैनेजमेंट को पांच साल पहले शुरू कर देती है, जब विपक्षी दल जीत का जश्न मना रहे होते हैं।

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