40 डिग्री नहीं, बल्कि 42 से 45 डिग्री की तपती आग, और उस आग के सामने धधकती धूणी के पास बैठे वो संत जो न झुके हैं, न डरे हैं और न हटे हैं। यह तप किसी देवता को प्रसन्न करने के लिए नहीं है। यह तप है एक सरकार को जगाने के लिए किया जा रहा है। उस सरकार को, जो खुद कहती है हम धर्म की रक्षा करते हैं, लेकिन जिसके राज में 500 साल पुरानी तपोभूमि को कागज़ पर "झाड़ियाँ" लिखकर 30 हजार पेड़ों को बुलडोजर से साफ कर दिया गया।
जयपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर दूदू में, बिचून के पास बसा है भैराणा धाम है। यह वह पवित्र स्थान है, जहाँ 16वीं सदी के संत दादू दयाल महाराज ने ब्रह्मलीन होने से पहले अपने अनुयायियों को कहा था कि उनका शरीर भैराणा पर्वत की खोल में छोड़ा जाए। तब से यह स्थान दादू संप्रदाय की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र है। इसे दादू पंथ का हरिद्वार भी कहते हैं। यह स्थान लाखों श्रद्धालुओं की मोक्ष स्थली, लेकिन आज इसी पवित्र भूमि पर खतरा है, और खतरा किसी दुश्मन से नहीं, बल्कि अपनी ही सरकार से है।
राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम, यानी रीको इस तपोभूमि को इन्वेस्टमेंट जोन के रूप में विकसित करने की योजना बना रहा है, और इस योजना को ज़मीन पर उतारने के लिए जो हुआ, वो रोंगटे खड़े कर देता है। भैराणा बचाओ संघर्ष समिति का आरोप है कि सरकारी दस्तावेजों में इस पूरे क्षेत्र को "झाड़ियाँ" बताकर पर्यावरणीय मंजूरी ली गई, जबकि हकीकत में यहां हज़ारों हरे-भरे पेड़ मौजूद थे, जिन्हें काट दिया गया। संतों का दावा है कि 30 हज़ार से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं, जिससे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी पूरी तरह बर्बाद हो गया। सिर्फ पेड़ ही नहीं काटे, बल्कि ज़मीन लेवल करते हुए जो जीव-जंतु रास्ते में आए, उन्हें ज़मीन में दफना दिया गया। जानवरों को जिंदा दफनाया, ताकि ज़मीन साफ हो सके, ताकि इन्वेस्टमेंट जोन बन सके, और फाइलों में लिखा रहा, यहां पर सिर्फ "झाड़ियाँ थीं।"
उद्योग मंत्री और रीको के सर्वेसर्वा राज्यवर्धन सिंह राठौड़ से सीधा सवाल, क्या यही है आपका विकास मॉडल? इस घटना की कहानी सुनी, अब आप आंदोलन की timeline देखिए, 5 अप्रैल को प्रशासन को ज्ञापन देकर 10 दिन का अल्टीमेटम दिया गया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई तब 15 अप्रैल से संतों ने अग्नितप शुरू किया। 42 से 45 डिग्री तापमान में उपलों की अग्नि जलाकर तप किया जा रहा है। दादू मोदाचार्य गोपालदास महाराज सहित प्रमुख संतों ने स्पष्ट किया कि जब तक औद्योगिक परियोजना निरस्त नहीं होती, आंदोलन जारी रहेगा। इस दौरान एक साधु की तबीयत बिगड़ी, डिहाइड्रेशन से बेहोशी आ गई, बावजूद इसके संत तप जारी रखे हुए हैं।
चंद दिनों पहले उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा मौके पर पहुँचे, जो यहां के विधायक भी हैं। उन्होंने संतों से बातचीत की, लेकिन संतों ने उनके आश्वासनों को अपर्याप्त बताया, क्योंकि संतों को केवल सरकारी आश्वासन नहीं, पूर्ण निरस्तीकरण चाहिए। वहां मौजूद लोगों ने बताया कि जब प्रेमचंद बैरवा सीएमओ में तैनात एक उच्च अधिकारी से मोबाइल पर स्पीकर चालू कर बात कर रहे थे, तब अधिकारी ने संतों को ही आरोपित कर दिया। जिसके कारण मामला और बिगड़ गया और प्रेमचंद बैरवा को खाली हाथ उल्टे पैर लौटना पड़ा।
एक दिन पहले BJP विधायक बालमुकुंदाचार्य मौके पर पहुँचे, जो खुद को संत बताते हैं और भगवा धारण करते हैं, लेकिन संतों ने विधायक के आश्वासन को भी ठुकरा दिया। साफ कहा कि "हमें आश्वासन नहीं, सरकार हमारी मांग मानें", और अब संतों ने सरकार को 7 मई तक का अल्टीमेटम दे दिया है कि "अगर 7 मई तक रीको की परियोजना निरस्त नहीं हुई, तो हम ज़मीन में जिंदा समाधि ले लेंगे।" यह शब्द सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जो संत बेहोश होकर भी उठ खड़े हुए, जब वो प्राणों की आहुति की बात करें, तो सरकार को समझना चाहिए कि मामला कितना गंभीर है।
अब एक सवाल उद्योग मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ से। आप कहते हैं, हम हिंदू धर्म की रक्षा करते हैं। आपकी सरकार कहती है, 'मां के नाम 50 करोड़ पेड़ लगाएंगे, लेकिन दादू दयाल की मोक्ष स्थली पर 30 हज़ार पेड़ काट दिए। जीव-जंतु ज़िंदा दफन कर दिए, और फाइलों में "झाड़ियाँ" लिख दिया। यह धर्म की रक्षा है या धर्म की हत्या? जब पूरा देश Rising Rajasthan की बात करता है, जब निवेश के MOU होते हैं, तो क्या उन MOU के लिए ज़मीन ढूंढने में 500 साल पुरानी तपोभूमि ही मिली? क्या राजस्थान में बंजर ज़मीन नहीं है? क्या उद्योग के लिए संतों की समाधि स्थली ही चाहिए?
7 मई आने में बस कुछ दिन बचे हैं, अगर सरकार ने अब भी नहीं सुना, तो इसके परिणाम केवल भैराणा धाम तक सीमित नहीं रहेंगे। पूरे राजस्थान में दादू संप्रदाय के लाखों अनुयायी हैं। पूरे देश में संत समाज है, और जब संत अपनी जान देने की बात करें, तो वो आवाज़ किसी भी सरकार के लिए खतरे की घंटी होती है। भैराणा बचाओ, रीको भगाओ का यह नारा आज पूरे राजस्थान में गूंज रहा है, क्योंकि जो ज़मीन 500 साल की तपस्या से बनी थी, वो किसी इन्वेस्टमेंट जोन की फ़ाइल से नहीं बिकेगी। सरकार के पास 7 मई तक का वक्त है, फैसला उसे करना है।

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