राजस्थान सरकार के कृषिमंत्री किरोड़ीलाल मीणा अपनी ही सरकार और अपनी ही पार्टी में पूरी तरह अकेले पड़ चुके हैं। पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा व अशोक गहलोत के भीषण हमलों के बीच बीजेपी आलाकमान और मंत्रियों की रहस्यमयी चुप्पी किरोड़ीलाल की सियासत को खत्म करने के अंदरूनी प्लान की ओर इशारा कर रही है? आज मैं राजस्थान की राजनीति के उस सबसे बड़े कड़वे सच और इनसाइड स्टोरी का पर्दाफाश करने जा रहा हूं, जिसे देखकर आप हैरान रह जाएंगे, क्योंकि सरकार के दो दर्जन मंत्रियों में से केवल शिक्षामंत्री मदन दिलावर ने किरोड़ी के पक्ष में बयान दिया है, और वो भी इसलिए, क्योंकि उनकी खुद डोटासरा के साथ पुरानी रायवलरी चल रही है, अन्यथा पूरी सरकार के एक भी मंत्री ने किरोड़ी के समर्थन में एक शब्द तक नहीं बोला है।
इस राजनीतिक एकांतवास और अंदरूनी रार की कहानी तब शुरू हुई जब किरोड़ीलाल मीणा ने परोक्ष रूप से सीधे अपने ही मुख्यमंत्री पर बेहद गंभीर आरोप लगा दिए। दरअसल पिछले दिनों जब एसीबी ने बीज निगम के निदेशक जुगल किशोर विश्नोई समेत 6 लोगों से 2.44 करोड़ रुपये की भारी-भरकम नकदी पकड़ी, तो उसके अगले दिन अखबारों की सुर्खियों में एक 'डॉक्टर और मंत्री' शब्द का जिक्र प्रमुखता से छपा था। इसी बात को लेकर किरोड़ी बुरी तरह भड़क गए। उन्होंने सरेआम बयान दे डाला कि सरकार के भीतर ही उनके खिलाफ बहुत बड़ी साजिश रची जा रही है और वो सीधे एसीबी के डीजी के पास पहुंच गए, जहां उन्होंने दावा किया कि उन्हें राजनीतिक और सामाजिक रूप से बदनाम करने के लिए जानबूझकर इतने बड़े स्तर पर अखबारों में 'डॉक्टर और मंत्री' शब्द छपवाए गए हैं ताकि उनकी छवि पर कालिख पोती जा सके।
उनका नाम होने पर गिरफ्तारी देने का नाटक करने पहुंचे किरोड़ीलाल मीणा ने बहुत चालाकी से अपने बयानों में गृहमंत्री या मुख्यमंत्री का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन चूंकि एसीबी सीधे मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के अंडर में ही आती है, ऐसे में यह साफतौर पर समझ आ रहा है कि किरोड़ी के आरोपों का असली निशाना और इशारा किस नेता की तरफ था।
किरोड़ी के इन सनसनीखेज आरोपों ने विपक्ष को बैठे-बिठाए एक बहुत बड़ा मुद्दा दे दिया और पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर मुख्यमंत्री से कृषिमंत्री किरोड़ीलाल मीणा की बर्खास्तगी और उनके इस्तीफे की पुरजोर मांग कर डाली। डोटासरा ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि कृषिमंत्री किरोड़ीलाल मीणा बीज और खाद बनाने वाले गोदामों पर गैर-कानूनी तरीके से छापेमारी करके व्यापारियों को ब्लैकमेल करते हैं, और पैसे उगाही करते हैं, जबकि वो खुद हकीकत में किसानों के सबसे बड़े दुश्मन हैं। डोटासरा के इन बेहद गंभीर और व्यक्तिगत आरोपों से तिलमिलाए किरोड़ीलाल मीणा ने जवाबी कार्रवाई करते हुए सीधे मुख्यमंत्री को एक 6 पन्नों का लंबा और कड़क पत्र लिख डाला, जिसमें उन्होंने डोटासरा के बेटे, बहू और अन्य रिश्तेदारों की सरकारी नौकरियों की तुरंत उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग कर डाली।
हालांकि, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा या सरकार की तरफ से अभी तक डोटासरा के परिवार के खिलाफ किसी भी तरह की जांच का कोई आधिकारिक ऐलान नहीं किया गया है, लेकिन किरोड़ी के इस पत्र से डोटासरा का खून खौल उठा। डोटासरा ने इसके दूसरे ही दिन एक और बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके न केवल किरोड़ीलाल मीणा को जमकर खरी-खोटी सुनाई, बल्कि उनके खुद के कथित भ्रष्टाचारों की जांच की मांग उठाते हुए खुला चैलेंज दे दिया कि 'यदि मेरी जांच कराते हैं तो साथ में किरोड़ी की भी जांच करवाई जाए।' दोनों तरफ से आए इन तीखे बयानों ने राजस्थान की राजनीति में कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि डोटासरा का यह कहना कि 'उनकी जांच तभी हो सकती है जब किरोड़ी की भी जांच कराई जाएगी', राजनीतिक पंडितों के लिए एक बड़ा संकेत है।
इसी बीच इस लड़ाई में एक मजेदार और विवादित मोड़ तब आया जब राजस्थान के शिक्षामंत्री मदन दिलावर ने किरोड़ी के पक्ष में एक बेहद आपत्तिजनक बयान देते हुए कहा कि 'डोटासरा के ये आरोप बिल्कुल ऐसे ही हैं, जैसे कोई वैश्या किसी पतिव्रता स्त्री पर चरित्रहीनता के आरोप लगाए', और सबसे ज्यादा विवाद की बात यह रही कि जब दिलावर यह बयान सरेआम दे रहे थे, तब उनके ठीक दाईं ओर एक महिला अधिकारी भी बैठी हुई थीं, जिसके बाद कांग्रेस ने इस अमर्यादित भाषा को लेकर दिलावर को भी चौतरफा निशाने पर ले लिया है। डोटासरा और किरोड़ी की इस ज़ुबानी जंग का अंजाम जो भी हो, लेकिन जिस तरह से इस वक्त दोनों तरफ से बेहद निजी और अमर्यादित स्तर पर छींटाकसी की जा रही है और सबसे बढ़कर किरोड़ी के साथ उनकी खुद की सरकार का कोई भी मंत्री या संगठन का नेता खड़ा नहीं दिखाई दे रहा, उससे यह बात पूरी तरह शीशे की तरह साफ हो चुकी है कि पूरी सरकार और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी किरोड़ीलाल मीणा की इन विवादित गतिविधियों और अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करने की आदत से अंदर ही अंदर बेहद नाराज है, और शायद यही सबसे बड़ी वजह है कि डोटासरा और पूर्व सीएम अशोक गहलोत के इतने बड़े और चौतरफा हमलों के बाद भी सरकार के बाकी तमाम मंत्री चुपचाप किनारे होकर इस पूरे तमाशे का मजा ले रहे हैं।
यह बात बिल्कुल सही है कि किरोड़ी ने सीधे तौर पर सीएम या गृहमंत्री का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका साफ इशारा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पर ही था, जिसके कारण सरकार के मंत्रियों ने अब किरोड़ी को पूरी तरह उनके हाल पर अकेला छोड़ दिया है और शायद इसी अकेलेपन और डोटासरा के बेहद तीखे व आक्रामक तेवरों को देखकर अब किरोड़ीलाल मीणा के बयान थोड़े नरम और रक्षात्मक होने लगे हैं। वैसे भी किरोड़ीलाल मीणा के साथ राजनीति में यही सबसे बड़ी दिक्कत मानी जाती है कि वो खुद तो दूसरों के खिलाफ बिना सोचे-समझे कैसे भी बड़े आरोप लगा देते हैं, लेकिन जैसे ही खुद उनके ऊपर उंगलियां उठती हैं, तो वो तुरंत तिलमिला जाते हैं, उनका ब्लड प्रेशर हाई हो जाता है और वो गुस्से में आकर उल्टे-सीधे बयान दागने लगते हैं, फिर सामने से जब कोई कड़ा पलटवार होता है या तो वो पूरी तरह चुप हो जाते हैं या फिर हनुमान बेनीवाल जैसा कड़क नेता जब पलटवार करता है तो महज एक घंटे के भीतर सरेंडर करके माफी भी मांग लेते हैं।
अगर हम पार्टी के आंतरिक समीकरणों पर गौर करें, तो पूरी भाजपा और सरकार के भीतर किरोड़ीलाल मीणा को व्यक्तिगत रूप से पसंद करने वाले नेताओं की संख्या इतनी कम है कि उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है, लेकिन पार्टी की सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि पूरे पूर्वी राजस्थान में और खासकर मीणा समाज के भीतर फिलहाल बीजेपी के पास ऐसा कोई दूसरा बड़ा चेहरा नहीं है जो किरोड़ीलाल मीणा का स्थान भर सके। यही कारण है कि किरोड़ी के इन तमाम आंतरिक आरोपों और बगावती तेवरों के बाद भी पार्टी लीडरशिप उन्हें मजबूरन टॉलरेट कर रही है और बेहद खामोशी के साथ खुद-ब-खुद किरोड़ी की इस आक्रामक सियासत के खत्म होने का इंतजार कर रही है।
देखा जाए तो किरोड़ीलाल मीणा की उम्र अब 73 साल पूरी हो चुकी है और अगले विधानसभा चुनाव तक उनकी उम्र 76 वर्ष हो जाएगी। ऐसे में इस बात की कोई दूर-दूर तक गारंटी नहीं है कि तब बीजेपी उन्हें दोबारा टिकट देगी भी या नहीं, और यदि किसी राजनीतिक दबाव में उन्हें टिकट मिल भी गया, तो वो आगे क्या ही बड़ा कर लेंगे, क्योंकि अगर हम भारतीय जनता पार्टी की स्थापित रीति-नीति और उम्र के कड़े नियमों को देखें, तो इन सब बगावती हरकतों के बाद यह तो तय है कि पार्टी उन्हें कभी भी मुख्यमंत्री तो नहीं बनाने वाली है।
अब देखना यह होगा कि किरोड़ीलाल मीणा अपनी ही सरकार में इस अकेलेपन से कैसे उबरते हैं और राजस्थान की जनता इस पूरी सियासी जंग को किस तरह देखती है। इस पूरे घटनाक्रम पर आपकी क्या बेबाक राय है, क्या सचमुच बीजेपी किरोड़ी को दरकिनार कर रही है, कमेंट बॉक्स में हमें जरूर बताएं

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