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राजस्थान विवि: प्रशासनिक हठधर्मिता और छात्र नेताओं की नौटंकी की भेंट चढ़ी कैंटीन


जयपुर।
राजस्थान विश्वविद्यालय (RU) का केंद्रीय जलपान गृह (कैंटीन), जो कभी परिसर की धड़कन हुआ करता था, पिछले तीन महीनों से प्रशासनिक तानाशाही और स्वयंभू छात्र नेताओं की अवसरवादी राजनीति का शिकार होकर बंद पड़ा है। विश्वविद्यालय प्रशासन की कथित 'असंवेदनशीलता' और छात्र संघ चुनाव की जमीन तलाश रहे नेताओं की 'मूक सहमति' के कारण आज हजारों छात्र, शिक्षक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारी भीषण गर्मी में चाय और पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं, लेकिन प्रशासन की कुंभकर्णी नींद टूटने का नाम नहीं ले रही है।

प्रशासनिक हठधर्मिता: संकट काल में भी नहीं दी राहत

मामले की जड़ में विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार अरविंद शर्मा का अड़ियल रवैया बताया जा रहा है। दरअसल, तीन महीने पहले तत्कालीन कैंटीन संचालक बुद्धिराम मान ने वैश्विक महंगाई, दक्षिण एशिया संकट और गैस की भारी किल्लत के चलते विश्वविद्यालय प्रशासन से राहत की गुहार लगाई थी। संचालक ने मांग की थी कि या तो ₹82,000 मासिक के भारी-भरकम किराए में थोड़ी छूट दी जाए, या फिर परिसर में बिकने वाली चाय, समोसे और कचौड़ी की दरों में मामूली बढ़ोतरी की अनुमति दी जाए।


परंतु, डिप्टी रजिस्ट्रार अरविंद शर्मा टस से मस नहीं हुए। इस हठधर्मिता और बेरुखी से अजीज आकर संचालक ने कैंटीन के गेट पर ताला लगा दिया। इस पर संज्ञान लेने और कोई बीच का रास्ता निकालने के बजाय, विश्वविद्यालय प्रशासन ने तानाशाही फरमान जारी करते हुए कैंटीन खाली करने के आदेश दे दिए। बाद में जयपुर डेयरी के साथ एक एमओयू (MoU) का झुनझुना भी थमाया गया, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि 90 दिन बीत जाने के बाद भी आज तक केंद्रीय जलपान गृह का ताला नहीं खुल पाया है।

छात्र राजनीति का घटिया चेहरा: ताला तोड़ा, सामान लूटा और अब गायब!

इस पूरे घटनाक्रम ने विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति के खोखलेपन को भी सरेआम बेनकाब कर दिया है। जब मजबूर होकर संचालक ने कैंटीन बंद की, तब परिसर में अपनी नेतागिरी चमकाने के शौकीन छात्र नेता लक्ष्यराज सिंह लुहारिया ने अपने साथियों के साथ मिलकर कैंटीन का ताला तोड़ दिया। आरोप है कि इस दौरान कैंटीन के सामान की जमकर लूटपाट की गई। लक्ष्यराज सिंह लुहारिया और उसके गुट ने करीब एक सप्ताह तक कैंटीन में डेरा जमाकर केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने और अखबारों में सुर्खियां बटोरने का काम किया।

इस गुंडागर्दी की लिखित शिकायत विश्वविद्यालय प्रशासन को दी गई, लेकिन 'नेताओं' के रसूख के आगे प्रशासन ने आँखें मूंद लीं और कोई कार्रवाई नहीं की। आज जब कैंटीन को बंद हुए तीन महीने बीत चुके हैं और आम छात्र परेशान है, तब लक्ष्यराज सिंह जैसे तथाकथित छात्र हितैषी नेता मैदान से पूरी तरह गायब हैं।


लाखों का राजस्व नुकसान, बाहर जाने को मजबूर छात्र और शिक्षक

विश्वविद्यालय अशैक्षणिक कर्मचारी संघ के पूर्व अध्यक्ष मोहम्मद मुस्तफा ने इस पूरे ढर्रे पर तीखा आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन की इस अदूरदर्शिता के कारण अब तक करीब ₹2.50 लाख से अधिक के राजस्व (किराए) का सीधा नुकसान हो चुका है।

मुस्तफा ने सवाल उठाया कि एक तरफ विश्वविद्यालय वित्तीय संकट का रोना रोता है, वहीं दूसरी तरफ अपनी ही हठधर्मिता के कारण लाखों का नुकसान झेल रहा है। कैंटीन बंद होने से सबसे बड़ी मार सुदूर ग्रामीण इलाकों से आने वाले गरीब छात्रों, महिला कर्मचारियों और प्रोफेसर्स पर पड़ रही है, जिन्हें दोपहर के लंच या चाय के लिए तपती धूप में विश्वविद्यालय परिसर से बाहर जाना पड़ रहा है।

'सियासी भारत' के कड़े सवाल:

—डिप्टी रजिस्ट्रार अरविंद शर्मा से सवाल: जब दक्षिण एशिया संकट और गैस किल्लत जैसी वैश्विक परिस्थितियां थीं, तो एक शिक्षण संस्थान के भीतर व्यावसायिक लाभ कमाने की ऐसी क्या जिद थी कि आपने छात्रों की बुनियादी सुविधा की ही बलि दे दी?

—विश्वविद्यालय प्रशासन से सवाल: जयपुर डेयरी के साथ एमओयू हुए हफ्तों बीत गए, फिर भी कैंटीन चालू क्यों नहीं हुई? क्या प्रशासन केवल कागजी खानापूर्ति में व्यस्त है?

—छात्र नेता लक्ष्यराज सिंह लुहारिया से सवाल: कैंटीन का ताला तोड़कर हफ्ता भर हुड़दंग मचाने वाले और खुद को 'छात्रों का मसीहा' बताने वाले नेताजी आज आम छात्रों की इस परेशानी पर मौन क्यों हैं? क्या आपकी राजनीति सिर्फ सुर्खियां बटोरने और तोड़फोड़ करने तक ही सीमित है?

राजस्थान विश्वविद्यालय की यह बंद पड़ी कैंटीन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी 'अहंकार' को नीति बना लें और छात्र नेता 'अवसरवाद' को राजनीति, तो नुकसान सिर्फ और सिर्फ आम छात्र का होता है। प्रशासन को चाहिए कि वह तुरंत इस गतिरोध को तोड़े, वरना यह आक्रोश जल्द ही एक बड़े आंदोलन की शक्ल अख्तियार कर सकता है।

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