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राहुल गांधी फिर माफी मांगने की दिशा में बढ़ रहे हैं

राहुल गांधी भारतीय राजनीति में विपक्ष के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक हैं, लेकिन उनके राजनीतिक करियर का एक बड़ा हिस्सा विवादों और बार-बार माफी मांगने की घटनाओं से भी जुड़ा रहा है। संसद से लेकर सड़क तक और अदालतों से लेकर चुनावी मंचों तक राहुल गांधी ने कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा पर गंभीर आऱोप लगाए, लेकिन सबूतों के अभाव में अंततः उन्हें माफी मांगनी पड़ी। अब एक बार फिर स्थिति वैसी ही बन रही है जब राहुल गांधी ने बिहार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को “वोट चोर” कह दिया है। चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस़़ भेजा और पूछा कि उनके पास क्या सबूत हैं। आयोग ने यहां तक कह दिया कि अगर सबूत हैं तो शपथपत्र के साथ पेश करें, अन्यथा यह झूठा आरोप मान लिया जाएगा। लेकिन राहुल गांधी न तो सबूत दे पा रहे हैं और न ही शपथपत्र। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राहुल गांधी को एक बार फिर माफी मांगनी पड़ सकती है।

दरअसल राहुल गांधी का झूठे आरोप लगाकर फंस जाना और फिर माफी मांग लेना कोई नई बात नहीं है। यदि हम पिछले एक दशक का घटनाक्रम देखें तो पाएंगे कि कई बार उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर व्यक्तिगत और संस्थागत आरोप लगाए, बाद में सबूत पेश करने में असफल रहे और अदालत या जनता के सामने माफी मांगने की नौबत आई।

सबसे पहले बात करते हैं राफेल मामले की। 2018-19 में राहुल गांधी ने राफेल सौदे को लेकर प्रधानमंत्री मोदी पर “चौकीदार चोर है” का नारा गढ़ा। यह नारा इतना लोकप्रिय हुआ कि कांग्रेस ने इसे चुनावी हथियार बना लिया। लेकिन 10 अप्रैल 2019 को राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को तोड़-मरोड़ कर कहा कि “सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि चौकीदार चोर है।” भाजपा ने तुरंत इस बयान को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना बताया। 15 अप्रैल 2019 को राहुल गांधी को नोटिस जारी हुआ और 22 अप्रैल को उन्होंने पहली बार अदालत में खेद जताया। इसके बाद 30 अप्रैल को उन्होंने लिखित माफी मांगी। अंततः 10 मई 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें चेतावनी देकर मामला खत्म किया। यानी इस मामले में उन्होंने तीन बार खेद या माफी प्रकट की और यह तय हो गया कि बिना सबूत के लगाए गए आरोप कानूनी रूप से टिक नहीं सकते।

इसी तरह मोदी की डिग्री विवाद में भी राहुल गांधी उलझे। 2016 में उन्होंने बार-बार कहा कि नरेंद्र मोदी ने अपनी शैक्षिक योग्यता छुपाई है और उनकी डिग्रियां फर्जी हैं। दिल्ली हाई कोर्ट में मामला पहुंचा। अदालत ने 30 अगस्त 2016 को साफ कर दिया कि मोदी की डिग्रियां असली हैं और दिल्ली यूनिवर्सिटी ने भी प्रमाणपत्र जारी किया। राहुल गांधी इस मामले में कानूनी शिकंजे से तो बचे, लेकिन सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करना पड़ा कि उनके आरोप साबित नहीं हो पाए।

इसके अलावा राहुल गांधी पर कई बार मानहानि के मुकदमे भी चल चुके हैं। 2014 में उन्होंने आरएसएस पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाया। उन्होंने महाराष्ट्र में चुनावी भाषण के दौरान कहा कि “गांधीजी की हत्या आरएसएस ने की।” इस पर कई आरएसएस कार्यकर्ताओं ने मानहानि के मुकदमे दर्ज कराए। 2016 में मुंबई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने उनसे जवाब मांगा। 1 सितंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सलाह दी कि या तो आप सबूत दें या माफी मांगें। अंततः 14 नवंबर 2016 को उन्होंने हलफनामा दायर कर कहा कि उन्होंने आरएसएस संस्था को नहीं, बल्कि कुछ व्यक्तियों को दोषी कहा था। यानी इस मामले में भी उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से पीछे हटकर माफी मांगी।

2018 में भी राहुल गांधी को अमित शाह के खिलाफ बयान को लेकर माफी मांगनी पड़ी। उन्होंने कहा था कि अमित शाह हत्या के आरोपी हैं, जबकि अदालत पहले ही शाह को बरी कर चुकी थी। भाजपा नेताओं ने मानहानि का केस किया और 2018 के अंत में राहुल गांधी ने अदालत में लिखित खेद जताया।

इन सबके बाद अब “वोट चोर” वाला मामला नया विवाद है। राहुल गांधी ने बिहार चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि नरेंद्र मोदी वोट चुराते हैं और चुनाव आयोग उनके साथ मिला हुआ है। लेकिन चुनाव आयोग ने 17 अगस्त 2025 को उन्हें नोटिस देकर कहा कि सबूत पेश करें। आयोग ने यह भी कहा कि यदि आपके पास कोई तथ्य नहीं है तो यह गंभीर चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है। आयोग ने शपथपत्र की मांग की है, लेकिन राहुल गांधी आज तक इसे दाखिल नहीं कर पाए हैं। जिन पत्रकारों, संस्थाओं और विपक्षी दलों के हवाले से राहुल गांधी ने यह आरोप लगाया था, उनमें से कई ने पहले ही पलटी मार दी है। उदाहरण के लिए, कुछ स्वतंत्र पत्रकारों ने अपने लेखों में लिखा था कि ईवीएम में गड़बड़ी होती है, लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि यह व्यक्तिगत शक है, पुख्ता सबूत नहीं। वहीं, विपक्षी दलों में से भी कई नेता अब राहुल गांधी की लाइन से सहमत नहीं हैं, क्योंकि उनके पास भी कोई ठोस प्रमाण नहीं है।

यही कारण है कि यह मामला राहुल गांधी की मुश्किलें बढ़ा सकता है। यदि वे शपथपत्र नहीं देते हैं तो चुनाव आयोग के पास उनके खिलाफ कार्रवाई करने का विकल्प होगा। भाजपा नेता पहले से ही उन पर मानहानि का केस करने की तैयारी कर रहे हैं। यदि यह केस अदालत तक गया तो राहुल गांधी को एक बार फिर माफी मांगनी पड़ सकती है।

कुल मिलाकर देखें तो राहुल गांधी का यह राजनीतिक पैटर्न बन गया है—पहले भारी-भरकम आरोप लगाना, फिर सबूत न दे पाना, और अंततः माफी मांगना। 2016 से 2023 के बीच ही उन्होंने चार बड़े मामलों में माफी मांगी—आरएसएस पर बयान (2016), मोदी डिग्री विवाद (2016), अमित शाह पर आरोप (2018), और राफेल “चौकीदार चोर है” मामला (2019)। अब 2025 में “वोट चोर” विवाद भी उसी दिशा में जाता दिख रहा है।

यह स्थिति कांग्रेस पार्टी के लिए भी असहज है। एक ओर राहुल गांधी विपक्ष की सबसे बड़ी उम्मीद हैं, दूसरी ओर उनकी आदत बार-बार कांग्रेस को बचाव की मुद्रा में खड़ा कर देती है। जब भी वह अदालत या आयोग से टकराते हैं, अंत में कांग्रेस को सफाई देनी पड़ती है और भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलता है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी “चौकीदार चोर है” का नारा उल्टा पड़ गया और भाजपा भारी बहुमत से जीत गई। अब यदि “वोट चोर” का मामला भी उसी दिशा में जाता है, तो इसका नुकसान कांग्रेस को ही होगा।

राहुल गांधी के समर्थकों का कहना है कि वे बेबाक हैं और भ्रष्टाचार या सत्ता के दुरुपयोग पर सीधे बोलते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि राजनीति में केवल आरोप लगाने से काम नहीं चलता, सबूत भी पेश करने होते हैं। अदालतें और आयोग आरोपों पर सबूत मांगते हैं, और यदि सबूत न हो तो माफी ही एकमात्र रास्ता बचता है। यही कारण है कि राहुल गांधी की राजनीतिक छवि बार-बार कमजोर होती जा रही है।

इस पूरे घटनाक्रम से साफ है कि राहुल गांधी का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वे आगे राजनीति में आरोप लगाने की शैली बदलते हैं या नहीं। यदि वे पहले ठोस तथ्य जुटाकर बोलेंगे तो शायद विपक्ष के नेता के रूप में उनकी साख मजबूत होगी। लेकिन यदि यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा—बड़े आरोप, सबूत न देना, और बार-बार माफी मांगना—तो यह न केवल उनकी छवि को नुकसान पहुंचाएगा, बल्कि कांग्रेस पार्टी की साख भी लगातार गिरती जाएगी।

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