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वसुंधरा की भाजपा को फिर याद आएगी!

झालावाड़ जिले की अंता विधानसभा सीट राजस्थान की राजनीति में इस वक्त सबसे अहम और चर्चित सीट बनी हुई है। मई 2025 से यह सीट रिक्त है, क्योंकि यहां से चुने गए भाजपा विधायक कंवरलाल मीणा को 20 साल पुराने एक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो गई। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार जब भी किसी सीट पर रिक्ति होती है, तो छह माह के भीतर उपचुनाव कराना आवश्यक होता है। 

लिहाजा अब अंता उपचुनाव अगले तीन महीनों में हर हाल में होना तय है। यह उपचुनाव न केवल झालावाड़ बल्कि पूरे राजस्थान की राजनीति के लिए निर्णायक साबित हो सकता है, क्योंकि इसके जरिये कई समीकरणों की परीक्षा होगी और खासतौर पर वसुंधरा राजे की भूमिका और भाजपा के भीतर उनकी हैसियत का भी आकलन होगा।

अंता सीट का राजनीतिक इतिहास बेहद रोचक है। यह विधानसभा क्षेत्र 2008 में अस्तित्व में आया और तब से यहां कांग्रेस और भाजपा ने बारी-बारी से जीत दर्ज की है। 2008 में कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रमोद जैन भाया ने करीब 30 हजार वोटों से बड़ी जीत हासिल की थी और वे अशोक गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। इसके बाद 2013 में भाजपा के प्रभुलाल सैनी ने 3400 वोटों से जीतकर वसुंधरा राजे सरकार में कैबिनेट मंत्री बने। 

2018 में एक बार फिर कांग्रेस के प्रमोद जैन भाया ने 34000 वोटों से जीत हासिल कर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की, लेकिन 2023 के चुनाव में भाजपा ने कंवरलाल मीणा को टिकट दिया और उन्होंने प्रमोद जैन भाया को 5900 वोटों से मात दी। यह भाजपा के लिए राहत की जीत थी, लेकिन केवल 17 महीनों के भीतर ही कंवरलाल की सदस्यता समाप्त हो गई, जिससे भाजपा की रणनीति बुरी तरह ध्वस्त हो गई। इस तरह से देखा जाए तो प्रमोद जैन भाया काफी मजबूत स्थिति में हैं। 

उनको यहां पर दातार के नाम से जाना जाता है। प्रमोद जैन कारोबारी हैं और स्थानीय जनता को सहायता करने के तौर पर जाने जाते हैं। हालांकि, कांग्रेस के पूर्व मंत्री भरत सिंह कुंदनपुरा ने लंबे समय से उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। पिछले दिनों भी उन्होंने नरेश मीणा के पक्ष में काफी कुछ लिखा है। ऐसे में कांग्रेस को नुकसान होने की संभावना भी है।

इस सीट पर जातिगत समीकरण बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। मीणा, धाकड़, गुर्जर, ब्राह्मण और मुस्लिम मतदाता यहां निर्णायक स्थिति में होते हैं। खासकर मीणा समाज का झुकाव चुनाव परिणाम तय करने में बड़ी भूमिका निभाता है। यही कारण है कि कंवरलाल मीणा के अयोग्य होने के बाद भाजपा के सामने बड़ी चुनौती यह है कि क्या वे फिर से मीणा समाज से ही कोई उम्मीदवार उतारेंगे या किसी नए चेहरे पर दांव खेलेंगे। 

इधर, कांग्रेस की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जा रही है। प्रमोद जैन भाया का राजनीतिक आधार मजबूत है और कांग्रेस उन्हें एक बार फिर से मैदान में उतारने पर गंभीरता से विचार कर रही है। झालावाड़ की राजनीति को समझने के लिए वसुंधरा राजे और उनके परिवार की भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। वसुंधरा राजे 2003 से झालरापाटन से लगातार विधायक हैं और कई बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। इससे पहले वे झालावाड़ से पांच बार सांसद भी रह चुकी हैं। वहीं, उनके बेटे दुष्यंत सिंह 2004 से अब तक झालावाड़-बरान संसदीय सीट से लगातार सांसद हैं। 

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि झालावाड़ की राजनीति में वसुंधरा परिवार का दबदबा कायम है और उनके बिना भाजपा की जीत की कल्पना करना मुश्किल है। अंता सीट पर भी भाजपा तभी मजबूती से चुनाव लड़ पाएगी, जब वसुंधरा राजे सक्रिय होकर प्रचार में उतरेंगी। ईमानदारी से देखा जाए तो भाजपा के पास राजस्थान में वसुंधरा राजे के मुकाबले दूसरा कोई नेता है भी नहीं।

लेकिन यहां बड़ी समस्या यह है कि भाजपा ने दिसंबर 2023 के विधानसभा चुनाव के बाद से वसुंधरा राजे को पूरी तरह हाशिए पर डाल दिया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के मुख्यमंत्री बनने के बाद पार्टी ने राज्य की राजनीति में वसुंधरा को कोई खास भूमिका नहीं दी। राजे अब केवल विधायक की भूमिका निभा रही हैं और इस उप चुनाव में वे सरकार की प्रवक्ता बनने या भजनलाल सरकार का चेहरा बनने को कतई तैयार नहीं हैं। 

यही वजह है कि यदि पार्टी अंता उपचुनाव में उनसे दूरी बनाकर चलती है तो भाजपा को भारी नुकसान हो सकता है। अंता सीट पर नरेश मीणा एक और अहम किरदार हैं। साल 2023 का विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए। उप चुनाव से पहले यदि उन्हें जमानत मिल जाती है और उपचुनाव लड़ते हैं, तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। मीणा समाज में उनका बड़ा प्रभाव है, इसलिए निर्दलीय चुनाव लड़ते हुए भी वे बड़ी संख्या में वोट काट सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो भाजपा के लिए यह सीट जीतना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। 

भजनलाल शर्मा सरकार की विफलताएं भी भाजपा की स्थिति को कमजोर कर रही हैं। सरकार सत्ता में आने के बाद से किसानों, युवाओं और बेरोजगारी के मुद्दे पर फेल मानी जा रही है। प्रदेश में विकास कार्यों की रफ्तार बेहद धीमी है और कानून-व्यवस्था की स्थिति भी सवालों के घेरे में है। इससे जनता में भाजपा सरकार के खिलाफ नाराजगी है और यह सीधे तौर पर उपचुनाव में असर डाल सकती है। दूसरी ओर, कांग्रेस भले ही राज्य में विपक्ष की भूमिका निभा रही हो, लेकिन यहां उसका संगठन काफी हद तक सक्रिय है और प्रमोद जैन भाया जैसे अनुभवी नेता के रहते हुए उसे जनता से जुड़ाव में मदद मिलती है।

कांग्रेस की ओर से उपचुनाव में प्रचार अभियान की जिम्मेदारी सचिन पायलट और गोविंद सिंह डोटासरा जैसे नेताओं पर रहेगी। पायलट युवा और किसान वोटरों को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं, अशोक गहलोत के प्रचार से यहां कोई खास असर पड़ने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि वे झालावाड़ क्षेत्र में कभी भी खास लोकप्रिय नहीं रहे। भाजपा की ओर से प्रचार की कमान किसके हाथ में होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। 

अगर वसुंधरा राजे ने प्रचार करने से इनकार कर दिया, तो भाजपा को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। अंता उपचुनाव का परिणाम केवल एक सीट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके व्यापक राजनीतिक निहितार्थ होंगे। यदि कांग्रेस यहां जीत दर्ज करती है, तो यह भाजपा सरकार के लिए बड़ा झटका होगा और वसुंधरा राजे की निष्क्रियता को लेकर सवाल और तेज होंगे। दूसरी ओर, यदि भाजपा सीट बचाने में सफल रहती है, तो यह मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के लिए राहत की बात होगी और पार्टी का मनोबल बढ़ेगा।

वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि कांग्रेस इस उपचुनाव में मजबूत स्थिति में है। भाजपा की अंदरूनी कलह, वसुंधरा राजे की दूरी, भजनलाल सरकार की विफलताएं और नरेश मीणा की संभावित मौजूदगी—ये सभी कारक भाजपा की हार की भूमिका तैयार कर रहे हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस का मजबूत उम्मीदवार, पायलट और डोटासरा का आक्रामक प्रचार और जनता में भाजपा के प्रति असंतोष, कांग्रेस को निर्णायक बढ़त दिला सकता है। 

अंता उपचुनाव केवल एक विधानसभा क्षेत्र की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की बदलती राजनीतिक तस्वीर का आईना भी साबित होगा। यह उपचुनाव बताएगा कि भाजपा बिना वसुंधरा राजे के कितनी सक्षम है और कांग्रेस किस हद तक जनता का भरोसा फिर से जीत सकती है। तीन महीनों बाद जब यहां मतदान होगा, तो नतीजा राजस्थान की राजनीति में नए संकेत देगा और यह साफ करेगा कि 2028 के विधानसभा चुनाव की राह किस तरह से तय होगी।

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