बिहार में चल रहे SIR—Special Intensive Revision—को लेकर जबरदस्त बहस छिड़ी हुई है। सतह पर यह मतदाता सूची का एक विशेष, घर-घर सत्यापन आधारित पुनरीक्षण है; गहराई में यह जनाधार, लोकतांत्रिक प्रत्याशा और चुनावी वैधता की असल परीक्षा है। चुनाव आयोग (ECI) ने 24 जून 2025 को बिहार के लिए SIR की घोषणा की—उद्देश्य था कि मृत, डुप्लीकेट और स्थानांतरित मतदाताओं को छांटकर और पात्र पर अनपंजीकृत नागरिकों को जोड़कर रोल को “साफ-सुथरा” बनाया जाए। विपक्ष को शंका है कि इस प्रक्रिया की आड़ में व्यापक स्तर पर वैध मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं; सत्ता पक्ष इसे आवश्यक शुचिता और पारदर्शिता का कदम बताता है। सच क्या है? सटीक और निष्पक्ष विश्लेषण के लिए हमें प्रक्रिया, आँकड़ों, आपत्तियों, आयोग के पक्ष, अदालती हस्तक्षेप और राजनीतिक निहितार्थों की परत-दर-परत जाँच करनी होगी।
SIR है क्या—और क्यों ज़रूरी बताया गया?
भारतीय निर्वाचन व्यवस्था में मतदाता सूची की नियमित “समरी रिवीज़न” के साथ-साथ “स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न” तब कराई जाती है जब किसी राज्य/क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जनसांख्यिकीय बदलाव, संदिग्ध प्रविष्टियाँ या राजनीतिक कैलेंडर के हिसाब से अद्यतन की विशेष ज़रूरत महसूस हो। SIR में बूथ लेवल पर घर-घर जाकर फॉर्म भरवाए जाते हैं, पुराने रिकॉर्ड से मिलान होता है, और शंकास्पद प्रविष्टियों को नोटिस देकर हटाने/सुधारने की कार्यवाही होती है। ECI के प्रेस नोट के मुताबिक बिहार में SIR की रीढ़ थी “हाउस-टू-हाउस वेरिफिकेशन”, साथ ही राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी पर खास ज़ोर।
कानूनी ढांचा—संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत ECI को रोल तैयार करने/संशोधित करने की शक्तियाँ, आरपी एक्ट 1950 और रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960—इस प्रक्रिया को वैधता देते हैं। ERO/ AERO की भूमिका, फॉर्म-6 (नया नाम), 7 (विलोपन के लिए आपत्ति), 8/8A (शुद्धि/स्थानांतरण), नोटिस की अनिवार्यता और सुनवाई—ये सब ECI के हैंडबुक और नियम-पुस्तिकाओं में परिभाषित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी व्यापक रूप से ECI की शक्ति को मान्यता दी है—हालिया सुनवाई में कोर्ट ने अधिकार-संदेह के तर्क को ठुकराया और फोकस “वोटर-फ्रेंडली” क्रियान्वयन पर रखा।
पहले चरण के आँकड़े: ‘छँटाई’ बनाम ‘सुधार’
ECI और मीडिया में आए आधिकारिक/रिपोर्टेड आँकड़ों के अनुसार SIR के प्रथम चरण (घर-घर गणना) में 99.8% कवरेज का दावा हुआ और बड़े पैमाने पर विसंगतियाँ सामने आईं—लगभग 22 लाख मृत मतदाता, लगभग 7 लाख डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ पहचानी गईं। यह संख्या “ड्राफ्ट” अवलोकन और आगे की स्क्रूटनी/दावों-आपत्तियों के अधीन है, यानी अंतिम सूची बनने तक इनमें परिवर्तन सम्भव है। यही वह बिंदु है जिसे आयोग “क्लेम्स-एंड-ऑब्जेक्शन्स” अवधि की अहमियत बता कर रेखांकित कर रहा है।
बिहार CEO दफ्तर और PIB के अपडेट्स बताते हैं कि 27 जून से 25 जुलाई के बीच घर-घर सर्वे के बाद 1 अगस्त को ड्राफ्ट रोल प्रकाशित हुए और 1 अगस्त से 1 सितंबर तक दावे/आपत्तियाँ बुलाने की समय-सीमा तय हुई। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि जिनका नाम हटाया गया है, वे निर्धारित फॉर्म और पहचान-पत्रों के साथ पुनः सम्मिलन के लिए दावा कर सकते हैं।
एक अन्य अहम डेटा पॉइंट: पहले चरण में “7.24 करोड़ से अधिक फॉर्म” भरवाए जाने की रिपोर्ट और “लाखों” संभावित त्रुटिपूर्ण/दोहरे/मृत नामों की पहचान—यह पैमाना बताता है कि ऑपरेशन कितना बड़ा है और जितनी बड़ी छानबीन, उतना ही अधिक विवाद का जोखिम।
विपक्ष की आपत्तियाँ: “वैध मतदाताओं की बड़े पैमाने पर ‘डिलीशन’”
विपक्षी गठबंधन (INDIA) और उसके नेता कह रहे हैं कि SIR की आड़ में वैध मतदाताओं—खासकर गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और हाशिये के समुदाय—के नाम हटाए गए। इसे लेकर धरना-प्रदर्शन, यात्राएँ और बंद के आह्वान तक हुए। राहुल गांधी की “वोटर अधिकार यात्रा” के लॉन्च इवेंट में बिहार में SIR का मुद्दा केंद्रीय रहा; RJD–कांग्रेस–वाम दलों के नेताओं ने मंच से “लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा” की थीम पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। इसी क्रम में ट्रेड यूनियनों की हड़ताल के साथ “बिहार बंद” का नैरेटिव भी SIR पर केंद्रित हो गया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने तो मतदाता सूची का रूपक देते हुए कहा—“अगर वोटर लिस्ट को दीमक खा जाएगी तो चुनाव कैसे होगा?”—और ECI की प्रक्रिया पर तीखे सवाल उठाए। कुल मिलाकर विपक्ष की माँग है कि “बिना पर्याप्त नोटिस और समय दिए” किसी का नाम न हटे, तथा सभी संभावित दावेदारों को सरल दस्तावेज़ी विकल्पों के साथ पुनः शामिल होने का वास्तविक अवसर मिले।
ECI का पक्ष: “कोई भी डिलीशन नोटिस के बिना नहीं; दावे-आपत्तियों के लिए चौड़े दरवाज़े”
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में और प्रेस नोट्स के जरिए दो-टूक कहा कि ड्राफ्ट रोल से किसी भी नाम का विलोपन बिना विधिसम्मत नोटिस और सुनवाई के नहीं होगा। आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि ड्राफ्ट के बाद क्लेम्स-ऑब्जेक्शन्स की प्रक्रिया खुली है, और राजनीतिक दलों के बूथ-स्तरीय एजेंटों, साथ ही नागरिक समाज, सभी को सप्रमाण दावे/आपत्तियाँ करनी चाहिए। कुछ आधिकारिक बयानों में यह भी कहा गया कि 1 अगस्त को प्रकाशित ड्राफ्ट पर किसी दल ने औपचारिक आपत्ति दाखिल नहीं की—यह आलोचकों के “शोर बनाम प्रोसिज़रल भागीदारी” के विरोधाभास को उजागर करता है।
इसके अलावा, आयोग/सरकारी माध्यमों ने यह जानकारी सार्वजनिक की कि जिन 65 लाख नामों को ड्राफ्ट से बाहर दिखाया गया है, उनकी सूची भी वेबसाइट पर अपलोड है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और प्रभावित मतदाता समय रहते दावा कर सकें। यह कदम विपक्ष की “गोपनीयता/अपारदर्शिता” वाली आपत्तियों का आंशिक जवाब देता है, पर निष्पक्षता का अंतिम पैमाना यही होगा कि इन दावों का निस्तारण कैसे, कितने समय में और कितनी संवेदनशीलता से होता है।
सुप्रीम कोर्ट की नसीहत: “प्रक्रिया वोटर-फ्रेंडली बने; आधार समेत 11 दस्तावेज़ मान्य”
22 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में साफ कहा कि SIR जैसी कवायद “वोटर-फ्रेंडली” होनी चाहिए। कोर्ट ने आश्चर्य जताया कि राजनीतिक दलों ने ड्राफ्ट पर व्यवस्थित आपत्तियाँ क्यों नहीं दर्ज कराईं, जबकि वे सार्वजनिक मंचों पर तीखी बयानबाज़ी कर रहे हैं। महत्वपूर्ण यह कि कोर्ट ने दावे/आपत्तियों के लिए आधार सहित 11 वैकल्पिक पहचान-पत्र स्वीकार करने को हरी झंडी दी—ताकि दस्तावेज़ का बहाना बनाकर किसी वैध मतदाता को प्रक्रिया से बाहर न रखा जाए। यह निर्देश सीधे-सीधे समानता और सुलभता के सिद्धांतों को सुदृढ़ करता है।
टाइमलाइन और प्रक्रियात्मक पड़ाव
24 जून 2025—ECI ने बिहार में SIR की घोषणा की; हाउस-टू-हाउस वेरिफिकेशन पर ज़ोर।
27 जून–25 जुलाई—गणना/एनेमरेशन चरण; घर-घर फॉर्म भरवाए गए; पुराने रोल और दस्तावेज़ संदर्भ के तौर पर उपलब्ध कराए गए।
1 अगस्त—ड्राफ्ट रोल प्रकाशित; वेबसाइट पर नामों की स्थिति और हटाए गए प्रविष्टियों की सूची उपलब्ध कराई गई।
1 अगस्त–1 सितंबर—दावे और आपत्तियाँ (Form-6/7/8/8A) स्वीकार किए जा रहे; सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार दस्तावेज़ी “विंडो” और चौड़ी।
सितंबर (अनुमानित)—दावों का निस्तारण, अंतिम प्रकाशन से पहले आवश्यक सुधार।
इन पड़ावों का दस्तावेजी आधार ECI/PIB/CEO बिहार के नोटिफिकेशनों और प्रेस रिलीज़ों में उपलब्ध है।
आँकड़ों की भाषा: पैमाने की ताकत, गलतियों की संभावना
“22 लाख मृत”, “7 लाख डुप्लीकेट”, “65 लाख हटाए गए” या “7.24 करोड़ फॉर्म”—ये आँकड़े एक साथ मिलकर यह बताते हैं कि बिहार में मतदाता सूची का महा-ऑडिट अभूतपूर्व है। इतने बड़े पैमाने पर डेटा-मैचिंग और फील्ड-वेरिफिकेशन में त्रुटि-सीमा (एरर मार्जिन) स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है—उदाहरण के लिए, एक ही व्यक्ति के नाम में अलग-अलग वर्तनी/पते के कारण “डुप्लीकेट” का फॉल्स-पॉज़िटिव हो सकता है; प्रवासी मजदूरों के अस्थायी पते/दस्तावेज़ की कमी वैध नाम को “डाउटफुल” बना सकती है; मृत्यु के सरकारी रजिस्टर और परिवार के “सूचना/साक्ष्य” में गैप हो सकता है। यही वजह है कि SIR जैसी प्रक्रिया को हमेशा दो-चरणी बनाया जाता है—पहले “ड्राफ्ट” में व्यापक-स्तर पर पहचान, फिर “क्लेम्स-ऑब्जेक्शन्स” में व्यक्ति-विशेष/परिवार-विशेष के दस्तावेज़ और सुनवाई से त्रुटियाँ सुधारी जाएँ। सुप्रीम कोर्ट का “11 दस्तावेज़” वाला निर्देश इसी जोखिम को कम करने की तरफ़ बढ़ाया गया एक ठोस कदम है।
राजनीतिक अर्थशास्त्र: किसे फ़ायदा, किसे नुकसान?
राजनीतिक भूगोल की भाषा में कहें तो बिहार में दलित-पिछड़ा-गरीब-प्रवासी-अल्पसंख्यक समूहों के वोट शेयर का भार विपक्षी गठबंधन आम तौर पर अपने पक्ष में मानता है, जबकि सवर्ण/ग्रामीण मध्यवर्ग/नई कल्याण-आधारित समर्थक परतें NDA की ताकत मानी जाती हैं। अगर व्यापक स्तर पर हाशिये के समुदायों की “वैध” प्रविष्टियाँ ड्राफ्ट से हटती दिखती हैं—भले ही वह केवल “ड्राफ्ट” हो—तो विपक्ष की चिंता/अभियान राजनीतिक रूप से तर्कसंगत लगते हैं। दूसरी ओर, मृत/डुप्लीकेट नाम हटने से “बूथ कैप्चर/बोगस वोटिंग” की आशंका कम होती है—यह NDA/ECI की नैरेटिव ताकत है कि “क्लीन रोल = क्लीन पोल” और इससे चुनावी वैधता मज़बूत होती है। राहुल गांधी की यात्रा और RJD–वाम दलों की सक्रियता बताती है कि विपक्ष इस मुद्दे पर “राइट्स-आधारित” जनभावना खड़ी करना चाहता है, जबकि ECI का कॉन्ट्रा-नैरेटिव “प्रोसेस-करेक्टनेस” पर टिका है।
क्या बिहार अकेला केस है?
SIR कोई बिहार-विशेष अवधारणा नहीं; लेकिन बिहार का केस राजनीतिक कैलेंडर (विधानसभा चुनाव नज़दीक), जनसंख्या का पैमाना और ऐतिहासिक रूप से तीखी प्रतिस्पर्धा के कारण हाई-विजिबिलिटी पा गया। उड़ीसा जैसे राज्यों में भी SIR की तैयारी/माँग की खबरें हैं; वहाँ भी “ट्रांसपेरेंसी–इनक्लूज़िवनेस” को लेकर सियासी नोकझोंक दिख रही है। इसका मतलब यह कि SIR के ऑपरेशनल पाठ भारत के अन्य राज्यों के लिए भी रेफरेंस बनेंगे—“बिहार मॉडल” के अच्छे-बुरे, दोनों अर्थों में।
निष्पक्षता का पैमाना: पाँच कसौटियाँ(1) नोटिस और सुनवाई की वास्तविकता: केवल कागज़ी नोटिस नहीं, बल्कि समय पर सर्विस, स्थानीय भाषा में स्पष्ट कारण, और सुनवाई की व्यावहारिक पहुँच—गाँव-देहात, शहरी बस्तियों, प्रवासी कार्यस्थलों तक। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ इसी “रियल वर्ल्ड एक्सेस” की माँग उठाती हैं।
(2) दस्तावेज़ी बाधा कम करना: आधार सहित 11 दस्तावेज़ स्वीकार करना एक प्रगतिशील कदम है। पर ज़मीनी अमल—BLO/ERO स्तर पर—ही तय करेगा कि नागरिक को “दस्तावेज़ नहीं तो वापस आओ” वाली दीवार से न टकराना पड़े।
(3) पारदर्शिता और पब्लिक डेटा: हटाए गए/संदिग्ध नामों की सूची ऑनलाइन डालना, ड्राफ्ट और अंतिम सूचियों के बीच “चेंज-लॉग” सार्वजनिक करना, वार्ड/बूथ-वार प्रयोजनयुक्त आंकड़े देना—ये भरोसा बढ़ाते हैं। ECI/आकाशवाणी आदि मंचों पर 65 लाख हटाए गए नामों की सूची सार्वजनिक करने के दावे इसी दिशा में इशारा करते हैं।
(4) राजनीतिक दलों की ज़िम्मेदार भागीदारी: सुप्रीम कोर्ट ने सही पूछा—अगर वास्तविक अन्याय हो रहा है, तो फॉर्म-6/7/8 के जरिए संगठित आपत्तियाँ क्यों नहीं? चुनाव दलों का काम सड़क-राजनीति के साथ-साथ प्रक्रिया-राजनीति में भी दक्ष होना है।
(5) समय-सीमा और अंतिम प्रकाशन से पहले स्वतंत्र ऑडिट: क्लेम्स-ऑब्जेक्शन्स निस्तारण और अंतिम रोल के बीच किसी स्वतंत्र/संस्थागत जाँच—जैसे सैंपल-ऑडिट, रैंडम कॉल-बैक, क्रॉस-डाटाबेस वैलिडेशन—से त्रुटि-सीमा कम होगी। ECI के प्रेस नोट्स, प्रशिक्षण कार्यक्रम और SOPs का सख्त पालन अनिवार्य है।
ज़मीन पर चुनौतियाँ: प्रवास, दस्तावेज़, डिजिटल-डिवाइड
बिहार में बड़ी संख्या में लोग रोज़गार के लिए बाहर रहते हैं—कई घर “ड्युअल-लोकेशन” वाले हैं। ऐसे परिवारों में पता-प्रमाण, आधार-लिंकिंग और वास्तविक निवास का निर्धारण कठिन होता है; “डुप्लीकेट” और “शिफ्टेड” का फर्क क़ानून में स्पष्ट है, पर जीवन-पद्धति की अनियमितता इसे धुँधला कर देती है। डिजिटल-डिवाइड (ऑनलाइन सुविधाएँ जानते हैं पर प्रयोग नहीं कर पाते), दस्तावेज़ों में नाम/उम्र/वर्तनी का अंतर, और स्थानीय स्तर पर सूचना-अभाव—ये सब वैध नागरिक को भी प्रक्रिया से दूर कर सकते हैं। इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट का जोर “वोटर-फ्रेंडली” अमल पर है—दरअसल यह केवल अधिकार-सिद्धांत नहीं, ऑपरेशनल डिज़ाइन का सवाल है।
तथ्य बनाम धारणा: आँकड़े क्या कहते हैं?
आयोग के अनुसार बड़े पैमाने पर मृत/डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ मिलीं—यह सच है और किसी भी चुनावी व्यवस्था के लिए चिंता का विषय। पर यह निष्कर्ष तभी लोकतांत्रिक रूप से प्रासंगिक है जब अंतिम प्रकाशन से पहले—और चुनाव से पहले—वैध लेकिन ड्राफ्ट से बाहर रह गए नामों की “रिटर्न रेट” उच्च हो। 65 लाख “डिलीशन-लिस्ट” का ऑनलाइन प्रकाशन, 1 सितंबर तक दावे, 11 दस्तावेज़ों की मान्यता—ये सब तभी असरदार हैं जब ERO स्तर पर त्वरित, निष्पक्ष और सद्भावनापूर्वक निस्तारण हो। यदि दावे-आपत्तियों के बाद अंतिम सूची में बड़ी संख्या में वैध नाम वापस जुड़ते हैं, तो “SIR = मत-अधिकार हनन” की धारणा कमजोर पड़ेगी; उलटे यदि वापसी दर कम रही, तो विपक्षी नैरेटिव मजबूत होगा। इस “रिटर्न रेट” का बूथ-वार/जिला-वार प्रकाशन सबसे निर्णायक पारदर्शिता-कदम होगा।
क्या सुधारा जा सकता है—कन्स्ट्रक्टिव रोडमैप
- प्रो-एक्टिव बूथ कैंप: हर पंचायत/वार्ड में हफ्ते भर के काउंटर जहाँ फॉर्म-6/7/8 दायर, स्कैन और तुरंत रसीद/टोकन जारी हों; आधार/राशन/पासबुक/किराया-रसीद सहित 11 दस्तावेज़ ऑन-द-स्पॉट मान्य।
- आउटकम डैशबोर्ड: जिले/AC स्तर पर “कितने हटे—कितने लौटे—कितने नये जुड़े” का लाइव डैशबोर्ड, जिससे मीडिया/पार्टियाँ/नागरिक निगरानी करें।
- पार्टियों की औपचारिक आपत्तियाँ: बूथ-वार पैनल—जहाँ दल अपने “डिलीटेड-लिस्ट” का क्रॉस-मैपिंग करा सकें। सुप्रीम कोर्ट की फटकार का सार यही है कि “शिकायतें काग़ज़ पर भी दें।”
- प्रवासी-अनुकूल SOP: मौसमी प्रवासियों के लिए “स्थान-प्रमाण” में लचीलापन—किराना-बही, मकान-मालिक का हलफनामा, स्थानीय जनप्रतिनिधि का काउंटर–सर्टिफिकेट—ताकि वे प्रक्रिया से न छूटें।
- इंडिपेंडेंट सैंपल ऑडिट: नागरिक समाज/विश्वविद्यालयों के साथ मिलकर रैंडम-वेरिफिकेशन—मतदान से पहले अंतिम त्रुटियों का भी निवारण हो। (यह सुझाव है; नीतिगत स्वीकृति ECI/कानूनी ढांचे पर निर्भर।)
निष्कर्ष: ‘क्लीन रोल’ और ‘फेयर पोल’—दोनों साथ चाहिए
बिहार में SIR, सिद्धांततः, चुनावी शुचिता की एक बड़ी कवायद है। मृत/डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है; पर इतनी ही ज़रूरी है कि वैध मतदाता—विशेषकर कमजोर दस्तावेज़ी स्थिति वाले—किसी तकनीकी/प्रशासनिक जाल में फँसकर वोट के अधिकार से वंचित न हों। सुप्रीम कोर्ट के 22 अगस्त 2025 के निर्देश—आधार समेत 11 दस्तावेज़ स्वीकार करना और प्रक्रिया को वोटर-फ्रेंडली बनाना—यही संतुलन साधने का प्रयास है। आगे की कुंजी अब क्लेम्स-ऑब्जेक्शन्स के त्वरित, निष्पक्ष निस्तारण और पारदर्शी डाटा-प्रकाशन में है। विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह सड़क के साथ काग़ज़ पर भी मज़बूत दावे/आपत्तियाँ दाखिल करे; सत्ता पक्ष/ECI की ज़िम्मेदारी है कि हर वैध दावा “नियमों की छाँव” में आराम से वापस सूची में पहुँचे। तभी यह विवाद “बवाल” से आगे बढ़कर बिहार के लोकतंत्र के लिए एक उपयोगी सीख बनेगा।
स्रोत (चयन): ECI/PIB/CEO बिहार के प्रेस नोट्स और दिशानिर्देश; सुप्रीम कोर्ट की कवरेज; और प्रमुख राष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्टें—ECI के आधिकारिक प्रेस नोट्स (24 जून, 30 जून, 6 जुलाई आदि), PIB अपडेट्स, CEO बिहार दस्तावेज़; सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर हिंदुस्तान टाइम्स/टाइम्स ऑफ इंडिया; AajTak/TOI/All India Radio पर SIR के चरणबद्ध आँकड़े; और विपक्ष/INDIA ब्लॉक के कार्यक्रमों पर ग्राउंड रिपोर्ट्स।
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