भारत की भू-राजनीतिक स्थिति इन दिनों बेहद तेजी से बदल रही है। ऊर्जा, व्यापार और कूटनीति के स्तर पर जो घटनाक्रम हो रहे हैं, वे आने वाले समय में वैश्विक समीकरणों को नई दिशा दे सकते हैं। रूस ने भारत को दिए जाने वाले कच्चे तेल पर पाँच फीसदी दर घटाकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि दोनों देशों के बीच दोस्ती केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि रणनीतिक गहराई भी रखती है। गौरतलब है कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर पश्चिमी देशों ने कड़े प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए रूस से लगातार सस्ता कच्चा तेल खरीदा।
2023-24 के दौरान रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बन गया। आँकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2023 से मार्च 2024 तक भारत ने रूस से औसतन 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जबकि 2021 में यह आंकड़ा महज 50,000 बैरल प्रतिदिन था। भारत की कुल तेल जरूरत का लगभग 40% हिस्सा अब रूस से पूरा हो रहा है। रूस की ओर से पाँच फीसदी मूल्य में कटौती सीधे-सीधे भारत को अरबों डॉलर की बचत दिला सकती है और यह संदेश भी देती है कि मॉस्को नई दिल्ली को प्राथमिकता दे रहा है।
इसके उलट, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर टैरिफ दरें बढ़ाकर 50 फीसदी कर दी हैं। ट्रंप पहले भी "अमेरिका फर्स्ट" नीति के तहत भारत की व्यापार नीतियों को अनुचित बताते रहे हैं। उनके राष्ट्रपति कार्यकाल (2017-2021) में भारत को "जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेस" (GSP) से बाहर कर दिया गया था, जिससे भारत को हर साल लगभग 6 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। यदि वे फिर से सत्तासीन होते हैं और टैरिफ 50 फीसदी तक बढ़ा देते हैं, तो भारत के अमेरिका को होने वाले करीब 80 अरब डॉलर के निर्यात पर गहरा असर पड़ सकता है। खासकर वस्त्र, फार्मा और आईटी सेवाओं के क्षेत्र को सीधा झटका लगेगा।
इन परिस्थितियों में भारत ने चीन के साथ रिश्ते सुधारने पर फोकस करना शुरू किया है। लद्दाख सीमा विवाद और गलवान घाटी की घटना के बाद दोनों देशों के बीच रिश्ते तनावपूर्ण हो गए थे। लेकिन हाल के महीनों में दोनों देशों ने ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग बढ़ाया है। भारत और चीन के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2023 में 136 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जो एक नया रिकॉर्ड है। हालांकि इसमें भारत का व्यापार घाटा करीब 100 अरब डॉलर का है, लेकिन दोनों देश आर्थिक रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं। भारत को उम्मीद है कि रूस के साथ मजबूत साझेदारी और चीन के साथ संतुलित संबंध उसे अमेरिकी दबाव से कुछ राहत देंगे।
ब्रिक्स की बढ़ती ताकत भी इसी दिशा की ओर इशारा करती है। 2023 में ब्रिक्स का विस्तार कर सऊदी अरब, ईरान, यूएई, मिस्र और इथियोपिया को शामिल किया गया, जिससे यह समूह जीडीपी और ऊर्जा संसाधनों के मामले में बेहद शक्तिशाली बन गया। भारत, रूस और चीन इस समूह की धुरी हैं। विश्व बैंक के अनुसार, ब्रिक्स देशों की संयुक्त जीडीपी अब 27 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है, जो जी-7 देशों के बराबर पहुँच चुकी है। रूस-भारत-चीन की करीबी इस समूह को "नाटो के विकल्प" के रूप में खड़ा कर सकती है, बशर्ते भारत और चीन अपने सीमा विवादों को पीछे छोड़कर आर्थिक व रणनीतिक सहयोग पर ध्यान केंद्रित करें।
भारत के लिए चुनौती यही है कि वह एक ओर अमेरिका और यूरोप के साथ अपने पुराने रिश्तों को संतुलित रखे, वहीं रूस और चीन के साथ भी मजबूत गठबंधन बनाए। आँकड़े बताते हैं कि भारत का अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार 2023-24 में 128 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जबकि रूस के साथ यह 65 अरब डॉलर के करीब रहा। चीन के साथ यह 136 अरब डॉलर है। यानी भारत तीनों मोर्चों पर जुड़ा हुआ है।
भविष्य की तस्वीर यह है कि रूस की तेल रियायतें और ब्रिक्स का विस्तार भारत के लिए बड़े अवसर पैदा कर रहे हैं। यदि भारत और चीन के बीच रणनीतिक समझौते होते हैं, तो ट्रंप की 50 फीसदी टैरिफ नीति भी भारत को बहुत नुकसान नहीं पहुँचा पाएगी। बल्कि अमेरिका अलग-थलग पड़ सकता है। यही कारण है कि रूस ने भारत को "अटूट दोस्त" कहकर वैश्विक राजनीति को एक संदेश दिया है कि एशिया अब शक्ति संतुलन का नया केंद्र बनने जा रहा है।
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