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वीआईपी कल्चर में डूबी राजस्थान की सत्ता

लोकतंत्र की आत्मा तब मजबूत होती है, जब सत्ता में बैठा हुआ व्यक्ति अपने को जनता का सेवक मानता है, लेकिन जब वही सत्ता जनसेवा की जगह शाही ठाट-बाट और विशेषाधिकारों का पर्याय बन जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। राजस्थान इस समय ऐसे ही दौर से गुजर रहा है, जहां सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग आम जनता से दूरी बनाकर वीआईपी कल्चर की चमक-दमक में डूबते जा रहे हैं। यह विडंबना ही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते ही देशभर में लालबत्ती संस्कृति खत्म करने का ऐलान किया था। 

यह कदम एक प्रतीकात्मक संदेश था कि आजाद भारत में अब जनता और नेता के बीच कोई बाड़ा नहीं होगा, सब बराबर होंगे, लेकिन आज हालात यह हैं कि न केवल नेता, बल्कि उनके पीछे चलने वाली पूरी सरकारी मशीनरी वीआईपी कल्चर को मजबूती दे रही है। मोदी ने जब लालबत्ती हटाने का आदेश दिया था तो देशभर में इसे जनता ने सराहा था। गाड़ियों पर लगी लाल बत्ती नेताओं और अधिकारियों की अलग पहचान बन चुकी थी। 

यह लाल बत्ती जनता को यह अहसास कराती थी कि इन गाड़ियों में बैठा व्यक्ति "खास" है और बाकी जनता "आम" है। जब यह लाल बत्ती हटाई गई, तो जनता ने राहत की सांस ली थी। यह विश्वास बना था कि लोकतंत्र अब और ज्यादा समतामूलक बनेगा, जहां नेता और जनता के बीच की खाई पाटी जाएगी, लेकिन हकीकत यह है कि लालबत्ती तो हट गई, मगर वीआईपी कल्चर का अहंकार और मानसिकता जस की तस कायम रही।

राजस्थान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां सत्ता में आए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा पहली बार विधायक चुने गए थे। एक साधारण पृष्ठभूमि से उठकर सत्ता के शीर्ष पद तक पहुंचने वाले भजनलाल से यह उम्मीद थी कि वे जनता के बीच घुल-मिलकर रहेंगे और वीआईपी कल्चर से खुद को अलग रखेंगे। शुरुआत में ऐसा आभास भी हुआ कि वे जमीन से जुड़े रहने की कोशिश करेंगे। उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन में सादगी दिखाने की कोशिश की और कई मौकों पर यह संदेश देने की कोशिश की कि वे "जनता के सेवक" हैं, लेकिन समय बीतने के साथ तस्वीर बदल गई। 

आज हालात यह हैं कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का काफिला 40 से ज्यादा गाड़ियों का होता है। जिस सादगी का दावा उन्होंने किया था, वह अब खोखला प्रतीत होता है। उनके काफिले के गुजरने के समय सड़कें खाली करवा दी जाती हैं, ट्रैफिक रोक दिया जाता है, और आम आदमी घंटों जाम में फंसा रहता है। लोकतंत्र में जहां जनता सर्वोपरि होती है, वहां जनता को ही अपने ही नेताओं के काफिले के लिए अपमानजनक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। यह केवल एक व्यक्ति का सवाल नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की विफलता है जो वीआईपी संस्कृति को पनपने देती है।

किसी भी लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता में बैठे लोग अपने को कितना पारदर्शी और जवाबदेह रखते हैं, लेकिन जब सत्ता के साथ "विशेषाधिकार" जुड़ जाते हैं, तो यह जवाबदेही कमजोर हो जाती है। राजस्थान में सत्ता का यह रवैया अब साफ दिखाई देने लगा है। मंत्री, विधायक और बड़े अधिकारी आम जनता की तरह सड़क पर चलने के बजाय अपने लिए विशेष व्यवस्था चाहते हैं। ट्रैफिक रोकना, काफिलों के लिए सड़कें खाली कराना, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशनों पर विशेष प्रबंध, ये सब लोकतंत्र की आत्मा को चोट पहुंचाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने लालबत्ती हटाकर जो संदेश दिया था, वह केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि उसमें एक गहरी सोच छिपी थी। 

उनका मानना था कि लालबत्ती हटाने से नेताओं और जनता के बीच की दूरियां कम होंगी, लेकिन राज्यों में इस सोच को गंभीरता से नहीं अपनाया गया। नेता लालबत्ती भले ही हटाने पर मजबूर हुए, लेकिन उन्होंने नए तरीके खोज लिए जिससे वे अपने "खास" होने का प्रदर्शन कर सकें। राजस्थान में आज मुख्यमंत्री और मंत्रियों के काफिले उसी मानसिकता को दर्शाते हैं।

यहां सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में जनता ने नेताओं को इसलिए चुना था कि वे सत्ता में जाकर राजशाही ठाट-बाट का आनंद लें? लोकतंत्र का मूल उद्देश्य ही यह है कि सत्ता जनता की सेवा में लगी रहे, लेकिन जब जनता को ही नेता के काफिले से परेशानी होने लगे, तो यह लोकतंत्र का मजाक बन जाता है। राजस्थान में आज यही स्थिति है। जनता से जुड़ने वाले मुद्दे—बेरोजगारी, किसान संकट, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा की बदहाली, इन सब पर ध्यान देने के बजाय सत्ता का ध्यान सुरक्षा, काफिले और विशेषाधिकारों पर ज्यादा है। 

यह भी ध्यान देने योग्य है कि वीआईपी संस्कृति सिर्फ नेताओं तक ही सीमित नहीं है। बड़े अधिकारियों ने भी इसे अपना लिया है। कलेक्टर और एसपी जैसी कुर्सियों पर बैठे अधिकारी अपनी गाड़ियों पर नीली बत्ती का इस्तेमाल करते हैं और आम जनता के लिए भय और दूरी का माहौल बनाते हैं। अस्पतालों, सरकारी दफ्तरों और विश्वविद्यालयों में भी यही संस्कृति देखने को मिलती है। आमजन को घंटों इंतजार करना पड़ता है, जबकि नेता और अफसर सीधे भीतर पहुंच जाते हैं। यह दोहरी व्यवस्था लोकतंत्र की असल भावना के खिलाफ है।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का मामला इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि वे खुद को एक साधारण परिवार से आने वाला बताते हैं और बार-बार जनता के बीच अपनी सादगी का उल्लेख करते हैं, लेकिन उनकी कार्यशैली उस सादगी के बिल्कुल विपरीत है। जब एक साधारण कार्यकर्ता मुख्यमंत्री बनता है तो उससे यह उम्मीद की जाती है कि वह सत्ता के शाही ठाठ-बाट से दूरी बनाएगा, किंतु भजनलाल का रवैया इस उम्मीद पर पानी फेरता है। वे जनता के बीच पहुंचने की बजाय, जनता से दूरी बना रहे हैं। 

उनके काफिले और सुरक्षा प्रबंध इस दूरी को और बढ़ा रहे हैं। राजस्थान में वीआईपी संस्कृति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि जनता के मन में सत्ता के प्रति असंतोष बढ़ रहा है। लोग महसूस करने लगे हैं कि नेता जनता की सेवा नहीं बल्कि अपने लिए सत्ता का उपयोग कर रहे हैं। लोकतंत्र में जनता और नेता के बीच विश्वास का रिश्ता सबसे अहम होता है, लेकिन जब नेता जनता को परेशान करके अपने लिए सुविधा जुटाते हैं, तो यह रिश्ता कमजोर हो जाता है। यह स्थिति किसी भी राज्य के लिए खतरनाक होती है क्योंकि इससे जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठ सकता है।

वीआईपी संस्कृति के बढ़ने का एक और नकारात्मक पहलू है भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी। जब नेता और अधिकारी अपने को जनता से ऊपर समझने लगते हैं, तो उनके भीतर यह मानसिकता पनपती है कि वे जनता को जवाबदेह नहीं हैं। इससे नीतियों और योजनाओं का असर भी कम होता है। जनता की समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय सत्ता का ध्यान अपने आराम और विशेषाधिकारों पर केंद्रित हो जाता है। 

राजस्थान के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि यदि मुख्यमंत्री और मंत्री वास्तव में जनता के सेवक बनना चाहते हैं, तो उन्हें वीआईपी संस्कृति से बाहर आना होगा। केवल मीडिया को विज्ञापन देकर छवि नहीं बनाई जा सकती है। उन्हें अपने काफिले कम करने होंगे, जनता के बीच घुलना-मिलना होगा और यह दिखाना होगा कि वे भी उसी भीड़ का हिस्सा हैं जिसके बीच से निकलकर सत्ता तक पहुंचे हैं। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब नेता जनता के साथ खड़े दिखाई देंगे, न कि जनता को किनारे कर अपने विशेषाधिकारों में खोए हुए।

यह भी सच है कि वीआईपी संस्कृति केवल नेताओं की व्यक्तिगत पसंद का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की विफलता है। पुलिस, प्रशासन और प्रोटोकॉल विभाग इस संस्कृति को बढ़ावा देते हैं। नेताओं को सलाह दी जाती है कि बड़े काफिले के साथ चलना ही उनकी गरिमा और सुरक्षा का प्रतीक है, लेकिन हकीकत यह है कि जितना बड़ा काफिला होगा, जनता में उतनी ही दूरी बढ़ेगी। आज जरूरत है कि जनता इस संस्कृति के खिलाफ आवाज उठाए। 

लोकतंत्र में जनता की शक्ति सबसे बड़ी होती है। यदि जनता यह ठान ले कि वह वीआईपी संस्कृति को स्वीकार नहीं करेगी, तो नेताओं को भी मजबूर होकर अपनी आदतें बदलनी होंगी। मोदी ने लालबत्ती हटाकर जो शुरुआत की थी, उसे आगे बढ़ाना अब राज्यों की जिम्मेदारी है। राजस्थान जैसे बड़े राज्य में यदि मुख्यमंत्री अपने काफिले को कम कर देंगे और जनता के बीच सादगी से घुलमिलकर रहेंगे, तो यह पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकता है।

राजस्थान में यह भी देखा गया है कि जब नेता चुनावी दौर में जनता से वोट मांगने आते हैं तो वे सादगी और सेवाभाव का वादा करते हैं। लेकिन सत्ता में आते ही वे वही नेता बदल जाते हैं। चुनावी मंचों पर जो नेता पैदल चलकर जनता से मिलते हैं, वही सत्ता मिलने के बाद बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिलों में नजर आते हैं। यह दोहरा चरित्र लोकतंत्र की सबसे बड़ी समस्या है। 

अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि राजस्थान आज वीआईपी संस्कृति में डूब चुका है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों और अधिकारियों तक, सभी ने इस संस्कृति को आत्मसात कर लिया है। मोदी का लालबत्ती हटाने का आदेश केवल प्रतीकात्मक रह गया है। अगर लोकतंत्र को मजबूत बनाना है, तो नेताओं और अधिकारियों को इस संस्कृति से बाहर आना होगा और जनता के बीच एक सेवक की तरह खड़ा होना होगा। सत्ता का मतलब शाही ठाट-बाट नहीं, बल्कि जनता की सेवा है। और जब तक इस सोच को आत्मसात नहीं किया जाएगा, तब तक लोकतंत्र केवल नाम का ही रहेगा।


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