राजस्थान की राजनीति इन दिनों जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सत्ता, महत्वाकांक्षा और चुप्पी तीनों का एक अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। एक तरफ मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के बेहद लचर प्रदर्शन को लेकर नाराजगी है, तो दूसरी तरफ भाजपा के अंदरूनी समीकरण ऐसे हैं कि कोई भी नेता खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। यह मौन सिर्फ साधारण मौन नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक गणित, भविष्य की संभावनाएं और उच्च नेतृत्व की रणनीति छिपी हुई है। ऐसे में कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का मामला खास तौर पर चर्चा में है।
किरोड़ी लाल मीणा, जो अपने तेवर और मुखर बयानों के लिए जाने जाते हैं, पिछली कांग्रेस सरकार में भी लगातार संघर्ष करते रहे। पांच साल तक उन्होंने अशोक गहलोत सरकार की नीतियों और कामकाज पर खूब आंदोलन किए, जनता के मुद्दों को सड़क से लेकर सदन तक पहुंचाया। भाजपा की सत्ता आने के बाद भी उन्होंने शुरूआती सवा साल तक अपनी ही सरकार को कटघरे में खड़ा करने से परहेज नहीं किया। लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेते हुए मंत्री पद से इस्तीफा देना और सरकार की नाकामियों पर खुलकर बोलना, ये सब इस बात के सबूत हैं कि वे सिर्फ पद पर टिके रहने की राजनीति नहीं करते, बल्कि सीएम पद की महात्वाकांक्षा उनकी काबिलियत को शूट करती है।
लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। पिछले कुछ महीनों से किरोड़ी लाल मीणा की आवाज जैसे दब गई है। सवाल यह है कि क्या यह आवाज उन्होंने खुद दबा दी है, किसी ने दबाई है, या फिर यह चुप्पी किसी बड़े राजनीतिक तूफान का संकेत है? राजनीति में अकसर तूफान से पहले सन्नाटा होता है, और यह सन्नाटा कभी-कभी रणनीति का हिस्सा भी होता है। किरोड़ी लाल मीणा की मौजूदा स्थिति को सचिन पायलट के संघर्ष से जोड़कर भी देखा जा रहा है। याद कीजिए, जब अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे, तब सचिन पायलट ने साढ़े तीन साल तक पार्टी के भीतर रहते हुए लगातार दबाव बनाया। कांग्रेस आलाकमान ने 2018 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था, लेकिन वह वादा कभी पूरा नहीं हुआ। निराश होकर पायलट को अपनी ही सरकार के खिलाफ उतरना पड़ा। 15 महीने की खींचतान के बाद गहलोत ने उन्हें उपमुख्यमंत्री पद से हटा दिया, फिर प्रदेश अध्यक्ष का पद भी छीन लिया गया। पायलट ने रुक-रुककर तीन साल तक संघर्ष जारी रखा, लेकिन अंतिम वर्ष में उन्होंने जोरदार आवाज उठाई और कांग्रेस सरकार को असहज कर दिया। हालांकि, आखिरी महीनों में वे भी चुप हो गए और नया रास्ता तलाशने लगे। इस पूरे घटनाक्रम से साफ था कि अनुभव और राजनीतिक समय-निर्धारण की कमी ने पायलट को नुकसान पहुंचाया और गहलोत पांच साल तक अविजित रहे।
आज की परिस्थिति में किरोड़ी लाल मीणा भी किसी हद तक उसी राह पर चलते दिखते हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि उन्होंने संघर्ष का रास्ता ज्यादा जल्दी छोड़ दिया। शुरुआत में उन्होंने नाराजगी दिखाई, इस्तीफा दिया, बयान दिए, लेकिन सवा साल बाद उनकी चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। उनके समर्थक भी अब मानने लगे हैं कि केंद्रीय आलाकमान से उन्हें कोई आश्वासन मिला है, जिसके चलते उन्होंने फिलहाल संघर्ष स्थगित कर दिया है। यह भी कोई रहस्य नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने जिस उम्मीद के साथ भजन लाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया था, वे उस पर खरे नहीं उतरे हैं। पार्टी के भीतर यह चर्चा है कि अब मोदी और शाह भी उस नेता से नाराज हैं, जिसने भजन लाल शर्मा का नाम सुझाया था। लेकिन राजनीति में फैसले बदलना सिर्फ नाराजगी से नहीं होता, उसके लिए सही समय का इंतजार भी जरूरी होता है। यही वजह है कि भजन लाल शर्मा की विदाई की चर्चाएं तेज हैं, लेकिन अभी तक इसे अमल में नहीं लाया गया है।
चर्चा चल रही है कि पर्ची सीएम के हटते ही किरोड़ी लाल मीणा या उनके जैसे ही किसी संघर्षशील नेता को सीएम बनाया जाएगा, ताकि उसके नाम पर 2028 के चुनावी मैदान की बिसात तैयार की जा सके। हालांकि, यह भी चर्चा हो रही है कि भजन लाल को हटाकर वसुंधरा राजे के गुट से किसी को सीएम बनाया जा सकता है। किरोड़ी लाल मीणा कभी वसुंधरा गुट में ही थे, लेकिन बाद में उन्होंने पार्टी छोड़ दी थी, जबकि पार्टी में वापसी की तब भी वसुंधरा राजे के करीबी थे। वसुंधरा के नाम पर कोई भी नेता विरोध नहीं करेगा, लेकिन देखना होगा भाजपा आलाकमान राजस्थान की राजनीति को क्या दिशा देने की प्लानिंग पर काम कर रहा है।
अभी देखा जाए तो नई पर्ची, यानी नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर भाजपा में खामोशी छाई है। यह खामोशी डर, उम्मीद और रणनीति का मिश्रण है। नई राजनीति में, जैसा कि मोदी और शाह ने पिछले कुछ वर्षों में दिखाया है, किसी भी विधायक, सांसद या नेता का सीएम बनना संभव है। इसी अनिश्चितता ने तमाम दावेदारों को चुप करा दिया है। यहां तक कि अनुभवी और मुखर नेता भी चुपचाप इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि एक गलत बयान उनका नंबर हमेशा के लिए काट सकता है। किरोड़ी लाल मीणा भी इस इंतजार की कतार में खड़े हैं। उनके समर्थक मानते हैं कि अगर उन्हें मौका मिला तो वे राजस्थान की राजनीति में नई ऊर्जा ला सकते हैं, लेकिन पार्टी के अंदर यह भी धारणा है कि केंद्र का नेतृत्व अनुभव के बजाय कभी-कभी चेहरा बदलने की राजनीति पर ज्यादा भरोसा करता है। यही वजह है कि डर बना हुआ है कि कहीं एक बार फिर अनुभवहीन नेता को डमी मुख्यमंत्री न बना दिया जाए।
अगर ऐसा हुआ तो इसके नतीजे भाजपा के लिए अच्छे नहीं होंगे। भाजपा के कई वरिष्ठ नेता पहले से ही सरकार की कार्यशैली से नाखुश हैं। अगर अगला मुख्यमंत्री भी अनुभवहीन और कमजोर निकला, तो संभव है कि ये नेता खुलकर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दें। उस स्थिति में भाजपा का भी वही हाल हो सकता है, जो कांग्रेस का सचिन पायलट की अनदेखी के कारण हुआ था—अंदरूनी कलह और चुनावी हार। राजनीति में संघर्ष, मौन और अवसर तीनों एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। किरोड़ी लाल मीणा का मौन यह संकेत भी हो सकता है कि वे सही समय का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन यह जोखिम भी है कि लंबी चुप्पी से उनका राजनीतिक प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। जनता का भरोसा लगातार मुखर रहने वालों पर ज्यादा होता है, क्योंकि मौन को अक्सर समझौते के रूप में देखा जाता है।
अब सवाल यह है कि यह मौन कब टूटेगा? क्या भजन लाल शर्मा का इस्तीफा लेकर किरोड़ी लाल मीणा को कमान सौंपी जाएगी, या फिर भाजपा एक बार फिर चेहरे के प्रयोग में उलझकर अपनी ही सरकार को कमजोर करेगी? जो भी हो, यह तय है कि अगर अगले मुख्यमंत्री के चयन में पार्टी ने गलती की, तो आने वाले चुनाव में भाजपा को भी वैसा ही झटका लग सकता है जैसा कांग्रेस को लगा था। राजस्थान की राजनीति में यह मौन और प्रतीक्षा का दौर ज्यादा लंबा नहीं चल सकता। जनता मुद्दों पर जवाब चाहती है, और नेता अवसर की तलाश में हैं। ऐसे में एक ही सवाल हवा में तैर रहा है—क्या किरोड़ी लाल मीणा की चुप्पी किसी बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है, या यह भी उन चुप्पियों में से एक है, जो अंततः नेता को हाशिये पर ले जाती हैं। समय ही इसका जवाब देगा, लेकिन इतना तय है कि यह दौर भाजपा और राजस्थान की राजनीति दोनों के लिए निर्णायक साबित होने वाला है।
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