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पेपर चोरी पर चुप क्यों है कांग्रेस?

राजस्थान की राजनीति में इस समय जो हालात बने हुए हैं, वे अपने आप में बेहद दिलचस्प और सोचने पर मजबूर करने वाले हैं। कांग्रेस इस वक्त वोट चोरी और ईवीएम पर सवाल उठाने में तो बहुत सक्रिय दिखती है, लेकिन जब बात पेपर चोरी की आती है, तो वही कांग्रेस अचानक चुप्पी साध लेती है। यह सवाल सिर्फ जनता ही नहीं, बल्कि कई राजनीतिक विश्लेषकों के मन में भी गूंज रहा है कि आखिर वजह क्या है? क्या सचमुच कांग्रेस को यकीन है कि उसके शासनकाल में बड़े पैमाने पर पेपर लीक और भर्ती घोटाले हुए थे, या फिर उसकी अपनी भूमिका इस पूरे खेल में इतनी गहरी थी कि आज बोलना उसके लिए अपने ही गिरेबान में झांकने जैसा हो जाता?

पेपर लीक का मामला राजस्थान में कोई नया नहीं है। पिछले कुछ सालों में यह इतना बड़ा मुद्दा बन चुका है कि जिसने हजारों युवाओं के करियर को तबाह कर दिया। अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में एसआई भर्ती परीक्षा समेत कई प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए। मामला इतना गंभीर था कि गहलोत सरकार के एक पीएसओ तक को इस अपराध में पकड़ा गया। सिर्फ यही नहीं, पुलिस ने अब तक 54 एसआई को गिरफ्तार किया है और कुल मिलाकर 120 आरोपी पहले ही जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं। यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित करने के लिए काफी है कि यह कोई छोटी-मोटी गलती या चूक नहीं, बल्कि संगठित तरीके से अंजाम दिया गया अपराध था।

अब सवाल यह है कि जब कांग्रेस विपक्ष में बैठी है, तो इस मुद्दे पर वह आक्रामक क्यों नहीं होती? आमतौर पर विपक्ष का काम होता है कि वह सत्ता में बैठी पार्टी को जनता के सामने कटघरे में खड़ा करे, लेकिन यहां हालात उलटे हैं। कांग्रेस जिस तरह से इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है, उससे यही संदेश जाता है कि या तो वह खुद इस मामले में फंसी हुई है, या फिर उसने भाजपा से कोई अदृश्य समझौता कर रखा है। यह समझौता सत्ता के खेल में नया नहीं है। भारतीय राजनीति में भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वे मंच पर भले ही एक-दूसरे को कोसती हैं, लेकिन पर्दे के पीछे कई मुद्दों पर एक-दूसरे की मदद करती हैं।

गहलोत सरकार के समय भाजपा ने पेपर लीक को लेकर खूब हंगामा किया था। विधानसभा से लेकर सड़क तक, हर जगह भाजपा के नेता इसे युवाओं के साथ धोखा बताते हुए कांग्रेस को भ्रष्टाचार का प्रतीक बताने से नहीं चूकते थे, लेकिन जैसे ही सत्ता का पलड़ा भाजपा के हाथ आया, उसका रवैया पूरी तरह बदल गया। अब कोर्ट में जाकर भाजपा सरकार यह दलील दे रही है कि भर्ती रद्द नहीं की जाए। यानी, जिस भर्ती को लेकर कल तक वह युवाओं को न्याय दिलाने का दावा कर रही थी, आज उसी भर्ती को बचाने में लगी हुई है। यह दोहरा रवैया भाजपा की राजनीतिक मंशा पर भी सवाल खड़ा करता है।

ऐसे समय में प्रदेश की राजनीति में एकमात्र ऐसा चेहरा है, जो इस मुद्दे को लगातार और आक्रामक तरीके से उठा रहा है हनुमान बेनीवाल। बेनीवाल न सिर्फ एसआई भर्ती घोटाले को लेकर सड़क पर उतरे, बल्कि उन्होंने अकेले ही धरना-प्रदर्शन कर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की। बेनीवाल की राजनीति भले ही सीमित क्षेत्र और सीमित जनाधार तक हो, लेकिन वे इस मामले में जनता की भावना के साथ खड़े नजर आते हैं। उनका यह स्टैंड उन्हें कांग्रेस और भाजपा दोनों से अलग खड़ा करता है।

कांग्रेस की चुप्पी का एक और कारण यह भी हो सकता है कि पार्टी को भरोसा है कि भाजपा सरकार की नाकामियां ही उसे अगले चुनाव में सत्ता दिला देंगी। अगर विपक्ष के रूप में उसे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़े, तो वह क्यों सड़कों पर उतरे? यह मानसिकता राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति की असली कमजोरी बन गई है। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अक्सर राज्यों में अपनी यूनिट को वही करने देता है, जो गांधी परिवार के आदेशों के मुताबिक हो। ऐसे में प्रदेश कांग्रेस नेताओं की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान खत्म हो जाती है और वे सिर्फ केंद्रीय नेतृत्व की हां में हां मिलाने तक सीमित रह जाते हैं।

इसका नतीजा यह है कि प्रदेश में कांग्रेस का विपक्ष के रूप में कोई ठोस चेहरा नहीं उभर पा रहा। जनता के असली मुद्दों बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, पेपर लीक, किसानों की समस्या पर कांग्रेस की ओर से कोई ठोस आंदोलन देखने को नहीं मिलता। उलटे, जिन मुद्दों पर जनता आक्रोशित है, वहां कांग्रेस या तो भाजपा के साथ खड़ी नजर आती है या फिर खामोश रहती है। राजस्थान की राजनीति में यह पहली बार नहीं हो रहा। इससे पहले भी कई बार दोनों बड़ी पार्टियों ने एक-दूसरे की कमजोरियों पर खुलकर हमला करने से बचा है। खासकर जब बात उन घोटालों या भ्रष्टाचार के मामलों की हो, जिनमें दोनों के नेताओं की भूमिका रही हो। यह "तुम मेरे घोटाले को मत छेड़ो, मैं तुम्हारे घोटाले को नहीं छेड़ूंगा" वाली राजनीति है, जिसने राज्य की जनता के भरोसे को बार-बार तोड़ा है।

छोटे दल और निर्दलीय नेता इस गैप को भरने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि उनके पास संसाधनों की कमी होती है और सत्ता पक्ष से सीधा टकराव लेने पर उन्हें जेल में डालने या मुकदमे ठोकने का खतरा बना रहता है। हनुमान बेनीवाल जैसे नेताओं पर भी यही खतरा मंडराता है, लेकिन वे कम से कम जनता को यह संदेश तो दे रहे हैं कि कोई तो है जो उनके लिए लड़ रहा है।

कांग्रेस के मौजूदा रुख को देखकर लगता है कि वह एक तरह से भाजपा की नाकामियों से सत्ता में वापसी का इंतजार कर रही है, लेकिन यह रणनीति खतरनाक है, क्योंकि जनता अब सिर्फ सत्ता बदलने के लिए वोट नहीं करती, बल्कि ऐसे विकल्प की तलाश करती है जो उसके मुद्दों पर काम करे। अगर कांग्रेस इसी तरह से चुपचाप बैठी रही, तो आने वाले समय में वह विपक्ष की भी भूमिका खो सकती है और उसकी जगह छोटे दल या नए राजनीतिक चेहरों को मिल सकती है। इस बार भारत आदिवासी पार्टी उभरी है, लेकिन उसने विचारधारा के नाम पर खुद को एक क्षेत्र तक रोक लिया है। उसे पूरे राजस्थान से लेनादेना ही नहीं है।

राजस्थान की जनता अब पेपर लीक जैसे मामलों को हल्के में लेने के मूड में नहीं है। यह मामला सिर्फ एक भर्ती परीक्षा का नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के सपनों और भविष्य का है। कांग्रेस अगर वास्तव में जनता की पार्टी होने का दावा करती है, तो उसे इस पर खुलकर बोलना चाहिए, सड़क पर उतरना चाहिए और भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा करना चाहिए। वरना यह मान लेना चाहिए कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही इस मामले में एक ही नाव पर सवार हैं और उनका लक्ष्य सिर्फ सत्ता में बने रहना है, चाहे इसके लिए युवाओं का भविष्य ही क्यों न दांव पर लग जाए।

राजनीति में चुप्पी भी कई बार बहुत कुछ कह जाती है, और कांग्रेस की यह चुप्पी आने वाले समय में उसके लिए राजनीतिक आत्मघाती कदम साबित हो सकती है। जनता सब देख रही है कौन उसके लिए लड़ रहा है और कौन सिर्फ सत्ता बदलने के इंतजार में बैठा है। राजस्थान में आज की हकीकत यही है कि बड़े दल जनता के असली मुद्दों से दूरी बना रहे हैं, और छोटे दल ही जमीन पर लड़ाई लड़ रहे हैं, चाहे वह कितनी भी मुश्किल क्यों न हो।

अगर यही हाल रहा, तो आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं, जहां जनता पारंपरिक पार्टियों से मुंह मोड़कर उन चेहरों की तरफ देखेगी, जो सिर्फ सत्ता पाने के लिए नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों के लिए खड़े होने का साहस रखते हैं। पेपर लीक जैसे घोटाले जनता के गुस्से की चिंगारी हैं, और अगर कांग्रेस व भाजपा ने इसे नजरअंदाज किया, तो यह चिंगारी कभी भी बड़े राजनीतिक विस्फोट में बदल सकती है, जो आने वाले चुनावों का नतीजा ही बदल दे।

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