डोटासरा ने गहलोत को निपटा दिया


राजस्थान कांग्रेस में अब अशोक गहलोत का दौर खत्म होने लगा है। सचिन पायलट के बाद अब गोविंद सिंह डोटासरा ने भी अपनी दावेदारी जताते हुए खुलकर गहलोत की राजनीति को चुनौती दे दी है। भाजपा छोड़कर कांग्रेस में लौटने वाले महेंद्रजीत सिंह मालवीय को लेकर कांग्रेस के भीतर ही डोटासरा और गहलोत के बीच सियासी घमासान मच गया है। एक एपिसोड से साफ हो गया कि अब राजस्थान कांग्रेस में गहलोत और पायलट के बाद तीसरा पावर सेंटर भी बन चुका है। इस बीच सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या जादूगर गहलोत के सामने डोटासरा का अंजाम भी सचिन पायलट जैसा होगा या इस बार कहानी पूरी तरह बदल जाएगी?

बीते 6 साल में गोविंद सिंह डोटासरा ने कभी भी अशोक गहलोत की मुखालपत नहीं की, लेकिन अब कांग्रेस में पॉलिटिकल सिनेरियो पूरी तरह से बदल गया है। राजस्थान कांग्रेस में पिछले कुछ दिनों में जो घटनाक्रम हुआ है, उसने साफ संकेत दे दिया है कि अब कांग्रेस की राजनीति केवल अशोक गहलोत और सचिन पायलट के इर्द-गिर्द नहीं घूम रही है। हुआ यह कि भाजपा छोड़कर महेंद्रजीत सिंह मालवीय अपने 309 समर्थकों के साथ कांग्रेस में लौटे, लेकिन कांग्रेस कार्यालय जाने से पहले वे सीधे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के आवास पहुंचे। यही बात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को नागवार गुजरी। कांग्रेस कार्यालय में आयोजित जॉइनिंग कार्यक्रम के दौरान डोटासरा ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि व्यक्ति की ब्रांडिंग करने वाले पहले यह सोच लें कि उन्हें कहां जाना चाहिए था। उन्होंने साफ कहा कि व्यक्ति पूजा से कांग्रेस हारती है और संगठन को मजबूत करना ही सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। राजनीति समझने वाले जानते हैं कि यह बयान सीधे अशोक गहलोत की कार्यशैली पर निशाना था। दिलचस्प बात यह है कि जुलाई 2020 में जब सचिन पायलट की बगावत के बाद कांग्रेस आलाकमान ने गोविंद सिंह डोटासरा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, तब माना जाता था कि गहलोत की सहमति के बिना यह फैसला संभव नहीं था। उस समय से लेकर दिसंबर 2023 तक डोटासरा ने कभी भी सार्वजनिक रूप से गहलोत का विरोध नहीं किया। दोनों एक ही टीम के सदस्य माने जाते थे, लेकिन दिसंबर 2023 में कांग्रेस की सरकार जाने के बाद पॉलिटिकल सिनेरियो चैंज हो गया। विपक्ष में रहते हुए डोटासरा लगातार बीजेपी गर्वंमेंट के खिलाफ आक्रामक रहे। सड़क से लेकर विधानसभा तक उन्होंने कांग्रेस को लीड किया और धीरे-धीरे संगठन में उनकी पकड़ मजबूत होती चली गई। इसी दौरान कांग्रेस आलाकमान का भरोसा भी उन पर बढ़ता गया। ध्यान रखने वाली बात यह है कि गहलोत तब तक अपने दुश्मन को पता नहीं चलने देते, जब तक सीएम बनने की बारी नहीं आ जाए और उसके बाद अपने सभी पॉलिटिकल वैपंस का उपयोग करते हैं। इससे पहले भी गहलोत तीन बार अपने इन हथियारों का सफलतम इस्तेमाल कर चुके हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि गहलोत से मुकाबला करने के लिए डोटासरा और पायलट एक होंगे? यदि ऐसा होता है तो मुकाबला किया जा सकता है, अन्यथा अकेले दुश्मनी मौल लेकर जीतना आसान नहीं होगा।

दूसरी ओर 25 सितंबर 2022 की वह घटना आज भी कांग्रेस लीडरशिप के दिमाग में जिंदा है, जब अशोक गहलोत के कारण मुख्यमंत्री पद को लेकर सीएलपी मीटिंग नहीं हो सकी थी। उस एपिसोड के बाद यह धारणा बनी कि गांधी परिवार अशोक गहलोत से पहले जैसी सहजता नहीं रखता। हालांकि, गहलोत अब भी राजस्थान कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं और उनका अपना मजबूत सपोर्ट ग्रुप है। यह सपोर्ट ग्रुप जितना बड़ा कांग्रेस के भीतर है, उतना ही कांग्रेस के बाहर से काम करता है और चुनाव के समय गहलोत इस का निर्दलीयों के रुप में उपयोग करते हैं, और यही ग्रुप हमेशा उनकी ढाल बनकर काम करता है। यही वजह है कि महेंद्रजीत सिंह मालवीय जैसे नेता कांग्रेस में वापसी से पहले गहलोत से मिलने पहुंचे, लेकिन डोटासरा ने इसे संगठन की अनदेखी माना, क्योंकि आज प्रदेश कांग्रेस के मुखिया वही हैं। असल लड़ाई पद की नहीं, बल्कि संगठन पर पकड़ की है। राजनीति में टिकट बांटने से लेकर कार्यकर्ताओं की नियुक्ति तक संगठन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। डोटासरा अच्छी तरह जानते हैं कि यदि 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले वे पूरे राजस्थान में अपने सपोर्टर्स और संगठन पर पकड़ मजबूत कर लेते हैं तो सत्ता आने की स्थिति में उनका राजनीतिक कद अपने आप बढ़ जाएगा। यही कारण है कि अब वे खुलकर व्यक्ति पूजा के खिलाफ बोल रहे हैं। उनका संदेश साफ है कि कांग्रेस किसी एक नेता के भरोसे नहीं बल्कि संगठन के दम पर मजबूत होनी चाहिए।

यहीं पर एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है। राजस्थान कांग्रेस का इतिहास बताता है कि जिसने भी अशोक गहलोत को खुली चुनौती दी, उसका पॉलिटिकल कॅरियर आसान नहीं रहा। सचिन पायलट इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जबकि मदेरणा परिवार पहले ही अंजाम भुगत चुका है। जुलाई 2020 में पायलट की बगावत के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला। इसलिए अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है कि क्या डोटासरा का भविष्य भी पायलट जैसा होगा या इस बार परिस्थितियां अलग हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पायलट सरकार में रहते हुए गहलोत से भिड़े थे, जबकि डोटासरा विपक्ष में रहते हुए संगठन के जरिए अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि राजस्थान कांग्रेस में अब केवल दो नहीं, बल्कि अशोक गहलोत, सचिन पायलट और गोविंद सिंह डोटासरा के रुप में 3 पावर सेंटर दिखाई दे रहे हैं। 

आने वाले दो वर्षों में यही तय होगा कि कांग्रेस का भविष्य किस दिशा में जाएगा और 2028 के चुनाव में पार्टी का सबसे मजबूत चेहरा कौन होगा, लेकिन इतना स्पष्ट है कि महेंद्रजीत सिंह मालवीय की घर वापसी ने कांग्रेस के भीतर छिपी हुई खींचतान को सार्वजनिक कर दिया है और डोटासरा के बयान ने यह संकेत भी दे दिया है कि अब वे गहलोत की छाया में पॉलिटिक्स करने के बजाय अपनी अलग पहचान बनाने के रास्ते पर निकल पड़े हैं। देखने वाली बात यह होगी कि गहलोत को खुलेआम चुनौती देने वाले डोटासरा इस एपिसोड को कैसे हैंडल करेंगे? क्योंकि गहलोत को चुनौती का मतलब यह है कि आधी कांग्रेस से मुकाबला करना और यह इतना आसान नहीं होता, क्योंकि पायलट जैसे तेज तर्रार नेता भी इस चुनौती से पार नहीं पा सके हैं। कहा जाता है कि गहलोत केवल कांग्रेस भीतर से हमला नहीं करते, बल्कि उनके असली हथियार विपक्षी भाजपा में हैं, जिनको वे कभी भी इस्तेमाल कर सकते हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि अशोक गहलोत इस चुनौती का जवाब कैसे देते हैं और कांग्रेस के भीतर यह टकराव आने वाले समय में और तेज होता है या फिर आलाकमान बीच का रास्ता निकालने में सफल रहता है। कमेंट करके अपनी राय दीजिए कि क्या डोटासरा भी सत्ता पाने तक गहलोत से टक्कर ले पाएंगे या बीच में ही सरेंडर हो जाएंगे?



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