पीएम मोदी अपने तीसरे कार्यकाल में फौजमार कप्तान साबित हो रहे हैं। फौजमार कप्तान वो होता है, जो जीत की चाहत में अपनी ही आर्मी को मारने लगता है या खुद को बचाने के लिए सेना को दुश्मन के सामने मरने को छोड़ देता है। बीजेपी की मोदी सरकार वोट नहीं देने वालों को खुश करने के लिए उन्हीं समाजों को नुकसान पहुंचा रही है, जो दशकों से भाजपा का कोर वोटर रहा है। इस वजह से अब ब्राह्मण, राजपूत, बणिया वर्ग भाजपा सरकार से नाराज होता दिखाई दे रहा है। अगले साल के शुरुआत में यूपी और पंजाब जैसे राज्यों में चुनाव है और उससे पहले अपने बड़े वोटबैंक को नाराज करना भाजपा को भारी पड़ सकता है। इसका असर यूपी में सर्वाधिक होगा, जहां पर योगी सरकार तीसरी बार सत्ता में पहुंचने के लिए दमखम लगा रही है। इसी राज्य में करीब 18 से 20 फीसदी सवर्ण वोटर माने जाते हैं।
आज जब हम मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के नीतिगत फैसलों का विश्लेषण करते हैं, तो भाजपा के भीतर से ही यह चुभता हुआ सवाल उठ रहा है: क्या केंद्र की सत्ता दूसरों को साधने और रिझाने की होड़ में अपने ही सबसे वफादार सिपाही यानी 'कोर वोटर' की बलि चढ़ा रही है? ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, जो सवर्ण वर्ग दशकों से हर विपरीत परिस्थिति में भाजपा की रीढ़ बनकर खड़ा रहा, आज वही वर्ग खुद को ठगा हुआ और उपेक्षित महसूस क्यों कर रहा है? इसका पहला और सबसे ताज़ा उदाहरण है UGC का नया दिशा-निर्देश, जो मोदी सरकार के गले की हड्डी बन गया है। हायर एजुकेशन में कथित तौर पर सुरक्षा देने के नाम पर सामान्य वर्ग के छात्रों को कटघरे में खड़ा करने का ऐसा मसौदा सामने आया, जिसकी मांग न तो किसी छात्र संगठन ने की थी और न ही किसी पिछड़े वर्ग ने। लेकिन परिणाम क्या निकला? पूरे देश का सामान्य वर्ग सड़कों पर उतर आया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाई और सरकार ने 'पुनर्विचार' का आश्वासन दिया, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि सवर्ण युवाओं का भरोसा डगमगा चुका है। उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों के आगामी चुनावों में नेताओं को चौराहों पर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। स्थिति यह है कि सरकार 'त्रिशंकु' बन चुकी है, अगर पीछे हटती है तो विपक्ष उस पर बहुजन-विरोधी होने का ठप्पा लगाएगा, और अगर आगे बढ़ती है तो उसका अपना कोर वोटर मतदान के बहिष्कार का मन बना रहा है। दूसरा बड़ा उदाहरण है दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के आंदोलन का। नीट यूजी पेपर लीक विवाद को लेकर चले इस आंदोलन के दबाव में जुलाई 2026 में तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री को भेज दिया, जिसे विपक्ष और छात्र संगठनों ने बड़ी जीत के तौर पर पेश किया। इसके बाद सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के बीच आंदोलन के दौरान दर्ज हुई तेरह एफआईआर रद्द करने का आदेश दिया, हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि गंभीर आपराधिक इतिहास वाले करीब 2873 लोगों को यह राहत नहीं मिलेगी और उनके खिलाफ नए सिरे से कार्रवाई हो सकती है।
फिर भी कुल मिलाकर आंदोलनकारियों के खिलाफ मामलों की वापसी को लेकर पुलिस विभाग के भीतर भारी नाराजगी है, क्योंकि इसी आंदोलन के दौरान करीब 160 पुलिसकर्मी बुरी तरह जख्मी हुए थे। जम्मू कश्मीर के पूर्व डीजीपी एसपी वैद ने खुलकर सवाल उठाया कि अगर दिल्ली में दर्ज मामलों को इतनी आसानी से खत्म किया जा सकता है, तो यह कानून व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक मिसाल बन जाएगी, और उन्होंने इसकी तुलना झारखंड में छात्रों के आंदोलन के दौरान हुई सख्त कार्रवाई से भी की, जहां सरकार ने कोई मुकदमा वापस नहीं लिया है। इस आग में घी डालने का काम तब हुआ, जब एक नाबालिक लड़की द्वारा मोदी, सरस्वति मां को और प्रेमानंद महाराज को गाली-गलौज का विरोध करने वाले स्वतंत्र भारद्वाज जैसे समर्थक को गिरफ्तार कर कानूनी शिकंजा कसता दिखा। इस कदम ने ब्राह्मण वर्ग के भीतर यह संदेश दिया कि सिस्टम गाली देने वालों के सामने लाचार है, लेकिन अपने ही समर्थकों पर सख्ती बरतने में आगे है।
इतिहास उठाकर देखिए, मोदी सरकार की यह झिझक कोई नई नहीं है। 2018 में जब सुप्रीम कोर्ट ने एससी—एसटी एक्ट में गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच की बात कही, तो अप्रेल में एक दिनी आंदोलन के भारी दबाव में आकर मोदी सरकार ने मूल प्रावधानों को संसद से दोबारा बहाल किया। नतीजा— सवर्ण समाज में गहरी टीस पैदा हुई। जिस सरकार को 'निर्णायक और बिना दबाव के फैसले लेने वाली' बताया जाता था, उसने एक साल के आंदोलन और अराजकता के बाद 2021 में तीनों कृषि कानूनों को बिना शर्त वापस ले लिया। नीट परीक्षा में पेपर लीक के हालिया विवाद के दिनों में शिक्षा मंत्रालय के स्तर पर दिखा भ्रम और शीर्ष स्तर के इस्तीफों ने यह संदेश दिया कि सरकार दबाव की राजनीति के आगे आसानी से झुक सकती है। शाहीन बाग आंदोलन में भी कोरोना नहीं होता तो शायद सरकार बैकफुट पर आ जाती।
विरोधाभास देखिए, जो वर्ग कभी भाजपा का वोटर नहीं रहा, जो विचारधारा के स्तर पर उसका धुर-विरोधी है, सरकार हर नीतिगत मोड़ पर उसी वर्ग को खुश करने के लिए बैकफुट पर जा रही है। और जो वर्ग हर चुनाव में धूप-छांव देखे बिना कमल का बटन दबाता रहा, उसकी शिकायतों को 'गारंटीड वोट' मानकर नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। राजनीति में समझौते होते हैं, लेकिन जब समझौते अपनी ही बुनियाद को खोखला करने लगें, तो उसे समझदारी नहीं कहा जाता। अगर मोदी सरकार ने इस असंतोष की नब्ज को समय रहते नहीं पहचाना, तो आगामी राज्यों के चुनावी नतीजे यह साफ कर देंगे कि जब कोर वोटर घर बैठता है, तो बड़े-बड़े सियासी किले कितनी तेजी से ढह जाते हैं। फैसला दिल्ली की सत्ता को करना है कि वह 'सबको खुश करने' की दौड़ में अपने ही सिपाहियों को कब तक दांव पर लगाती रहेगी। कब तक मोदी सरकार फौजमार कप्तान बनती रहेगी? आपको क्या लगता है ऐसे फैसलों से 2029 में मोदी चौथी बार सत्ता में रिपीट हो पाएंगे, कमेंट करके अपनी राय जरुर दीजिए।

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