राजनीति में युवाओं की भागीदारी को लेकर राजस्थान में कांग्रेस के भीतर ही दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आती दिख रही हैं। एक तरफ तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत युवाओं को राजनीति में आने और प्रदेश के विकास में भागीदार बनने का संदेश दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ सचिन पायलट के हालिया बयान ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर वे युवाओं को राजनीति में आने के बजाय पढ़-लिखकर अफसर बनने की सलाह क्यों दे रहे हैं?
बाड़मेर दौरे के दौरान सचिन पायलट ने युवाओं से कहा कि उन्हें पढ़ाई करके अफसर बनने की कोशिश करनी चाहिए। पायलट के इस बयान के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है, अगर राजनीति में युवा आएंगे ही नहीं, तो राजनीति में नई पीढ़ी आएगी कैसे?
सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि खुद सचिन पायलट ने महज 26 साल की उम्र में राजनीति में प्रवेश किया था और अपने पिता राजेश पायलट की राजनीतिक विरासत के सहारे 2004 में दौसा से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंच गए थे। इसके बाद 2009 में, महज 31 साल की उम्र में, वे केंद्र सरकार में मंत्री भी बन गए।
तो क्या जिस राजनीति ने सचिन पायलट को 26 साल की उम्र में सांसद बनने का अवसर दिया, उसी राजनीति के दरवाजे आज के युवाओं के लिए बंद होने चाहिए?
इसके ठीक उलट अशोक गहलोत का राजनीतिक सफर देखा जाए तो तस्वीर अलग नजर आती है। गहलोत को राजनीति की विरासत नहीं मिली थी। उन्होंने अपने संघर्ष और संगठनात्मक मेहनत के दम पर राजनीति में जगह बनाई और महज 29 साल की उम्र में पहली बार जोधपुर से लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। आगे चलकर वही गहलोत राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री बने और राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी अलग पहचान बनाई।
यानी एक तरफ वह नेता है, जिसे राजनीतिक परिवार की विरासत ने बेहद कम उम्र में संसद तक पहुंचाया और दूसरी तरफ वह नेता है, जिसने बिना किसी पारिवारिक राजनीतिक विरासत के अपने संघर्ष से मुकाम बनाया।
ऐसे में सवाल उठता है:— क्या पायलट भूल गए हैं कि राजनीति में आने का अवसर उन्हें भी एक युवा के रूप में ही मिला था?
यह पहली बार नहीं है जब पायलट के बयान को युवाओं की राजनीति से जोड़कर सवाल उठाए जा रहे हैं। दौसा की एक सभा में वे उन युवाओं पर भी टिप्पणी कर चुके हैं जो अपनी 2-3 बीघा जमीन बेचकर महंगी गाड़ियां खरीदते हैं और राजनीति में आना चाहते हैं। पायलट ने ऐसे युवाओं को इससे बचने की सलाह दी थी।
लेकिन क्या हर युवा की राजनीति में एंट्री का मतलब महंगी गाड़ी, पैसा और जमीन बेचना है? क्या राजनीति में आने वाले गरीब, मध्यमवर्गीय और सामान्य परिवारों के युवाओं के लिए भी यही संदेश है कि वे राजनीति से दूर रहें?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल:— अगर युवा राजनीति में आएंगे नहीं, तो राजनीति पर पुराने चेहरों का कब्जा कैसे टूटेगा?
राहुल गांधी पिछले एक दशक से ज्यादा समय से राजनीति में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की बात करते रहे हैं। सचिन पायलट खुद इसका उदाहरण रहे हैं। राहुल गांधी ने उन्हें महज 34 साल की उम्र में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया था। यानी कांग्रेस ने एक युवा चेहरे को प्रदेश की राजनीति की कमान सौंपी थी।
आज वही सचिन पायलट अगर युवाओं को राजनीति के बजाय अफसर बनने की सलाह देते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या पायलट की सोच बदल गई है? या फिर राजनीति में आने के बाद वे युवाओं की भूमिका को पहले जैसा नहीं देखते?
वहीं, अपनी राजनीतिक पारी के अंतिम दौर की तरफ बढ़ रहे अशोक गहलोत युवाओं को राजनीति में आने का निमंत्रण दे रहे हैं। गहलोत का संदेश साफ है, नई पीढ़ी राजनीति में आए, संघर्ष करे और प्रदेश के भविष्य के निर्माण में अपनी भूमिका निभाए।
शायद यही राजनीति का वास्तविक लोकतांत्रिक रास्ता भी है।
क्योंकि लोकतंत्र में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि युवा राजनीति में क्यों आना चाहते हैं। सवाल यह होना चाहिए कि युवाओं के लिए राजनीति के दरवाजे और ज्यादा कैसे खोले जाएं?
और सचिन पायलट से सबसे बड़ा सवाल यही है, जिस उम्र में आपको राजनीतिक विरासत ने संसद तक पहुंचा दिया था, उसी उम्र के किसी सामान्य परिवार के युवा से आप राजनीति से दूर रहने की सलाह आखिर क्यों दे रहे हैं?
क्या राजनीति में आने का अधिकार सिर्फ राजनीतिक परिवारों के युवाओं का है, या खेत-खलिहान, गांव, कस्बे और सामान्य परिवारों से आने वाले युवाओं का भी उतना ही अधिकार है?

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