बीते 18 सालों में आपने कभी सोचा है राजस्थान जैसे सूखे और खनिज संपदा से भरपूर राज्य की किस्मत आखिर कब बदलेगी? 18 सालों से राजस्थान में एक ऐसा प्रोजेक्ट बन रहा है, जिस पर लगभग 80 हजार करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं...
जिसकी घोषणा हुए करीब 18 साल हो चुके हैं... जिसका इन 18 सालों में दो-दो बार शिलान्यास हुआ है... जिसकी लागत लगभग दोगुनी हो गई... और जिसे लेकर हर सरकार ने दावा किया कि यह पश्चिमी राजस्थान की तस्वीर बदल देगा... तो क्या आप यकीन करेंगे? लेकिन सवाल यह है कि अगर यह इतना बड़ा प्रोजेक्ट है, तो आखिर 18 सालों में पूरा क्यों नहीं हुआ? इतने बरसों की देरी राजनीति की वजह से हुई, इंजीनियरिंग की वजह से या सरकारी लापरवाही की वजह से?
क्या यह सच में लाखों युवाओं के रोजगार का सपना पूरा करेगा या फिर यह भी सिर्फ चुनावी भाषणों का हिस्सा बनकर रह जाएगा? कुछ महीनों पहले इसका उद्घाटन होने वाला था, लेकिन अंत समय में आग लगने से टल गया, और फाइनली 4 जुलाई को पीएम मोदी इसका उद्घाटन करने वाले हैं।
आज हम बात करेंगे राजस्थान के इतिहास के सबसे बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट बालोतरा जिले के पचपदरा स्थित एचपीसीएल राजस्थान रिफाइनरी एवं पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स की, जिसे कई विशेषज्ञ राजस्थान की अर्थव्यवस्था का गेम चेंजर मानते हैं। लेकिन इस प्रोजेक्ट की कहानी सिर्फ विकास की नहीं, बल्कि देरी, बढ़ती लागत, राजनीतिक टकराव और अधूरे वादों की भी कहानी है।
इस प्रोजेक्ट की अवधारणा लगभग 2008 के आसपास सामने आई थी, जब राजस्थान में तेल और गैस के भंडार मिलने के बाद यह महसूस किया गया कि कच्चे तेल को दूसरे राज्यों में भेजने के बजाय यहीं रिफाइन कर पेट्रोल, डीजल और पेट्रोकेमिकल उत्पाद बनाए जाएं। इसके बाद वर्ष 2013 में तत्कालीन सरकार ने पचपदरा में रिफाइनरी का शिलान्यास किया और इसे राजस्थान के औद्योगिक भविष्य का सबसे बड़ा सपना बताया गया।
लेकिन इसके बाद सरकार बदली, परियोजना की शर्तों और वित्तीय मॉडल पर सवाल उठे, प्रोजेक्ट की समीक्षा हुई और कई वर्षों तक काम लगभग ठप रहा। बाद में 2018 में संशोधित समझौते के साथ दोबारा शिलान्यास हुआ और निर्माण कार्य ने गति पकड़ी। यानी एक ही रिफाइनरी का दो बार शिलान्यास हुआ, जो अपने आप में इस परियोजना की राजनीतिक कहानी बयान करता है।
शुरुआत में इस परियोजना की लागत लगभग 43 हजार करोड़ रुपये आंकी गई थी, जबकि शुरुआती राजनीतिक बयानों में इससे भी कम आंकड़े सामने आते रहे। लेकिन वर्षों की देरी, डिजाइन में बदलाव, महंगाई, निर्माण लागत बढ़ने, कोविड महामारी, सप्लाई चेन की बाधाओं और अन्य तकनीकी कारणों से इसकी संशोधित लागत बढ़कर 79,459 करोड़ रुपये तक पहुंच गई, यानी लगभग 84 प्रतिशत की बढ़ोतरी। केंद्र सरकार की आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने इस संशोधित लागत को मंजूरी भी दी और एचपीसीएल द्वारा अतिरिक्त इक्विटी निवेश को भी स्वीकृति दी।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल रिफाइनर देश है, जिसकी कुल रिफाइन कैपेसिटी करीब 258.2 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है। इससे भारी मात्रा में विदेशी आय होती है। केवल रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से देश को 60—70 अरब डॉलर, यानी करीब 5 से 6 लाख करोड़ रुपये की आय होती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन 18 सालों में राजस्थान ने कितनी आय खोई है।
अब सवाल यह है कि आखिर इतनी देरी क्यों हुई? इसका जवाब एक लाइन में नहीं दिया जा सकता। इस परियोजना के दौरान राजनीतिक परिवर्तन हुए, 4 सरकारें बदलीं, परियोजना के स्वरूप में बदलाव हुआ, वित्तीय मॉडल पर बहस हुई, निर्माण संबंधी जटिलताएं आईं, कोविड महामारी ने काम की गति प्रभावित की और बाद के वर्षों में सुरक्षा संबंधी परिस्थितियों तथा तकनीकी चुनौतियों ने भी समयसीमा को प्रभावित किया।
इन सबके बीच सत्ता और विपक्ष दोनों एक-दूसरे पर देरी का आरोप लगाते रहे। कांग्रेस का आरोप रहा कि भाजपा सरकारों ने राजनीतिक कारणों से परियोजना को रोके रखा, जबकि भाजपा का कहना रहा कि उसने परियोजना को बेहतर वित्तीय मॉडल के साथ पुनर्जीवित किया। यानी रिफाइनरी सिर्फ औद्योगिक परियोजना नहीं रही, बल्कि राजस्थान की सबसे बड़ी राजनीतिक बहसों में भी शामिल हो गई।
तकनीकी दृष्टि से देखें तो यह देश की सबसे बड़ी ग्रीनफील्ड रिफाइनरी एवं पेट्रोकेमिकल परियोजनाओं में से एक है। इसकी रिफाइनिंग क्षमता लगभग 9 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष होगी और इसके साथ पेट्रोकेमिकल इकाइयों में पॉलीप्रोपाइलीन, हाई डेंसिटी पॉलीएथिलीन, लाइनर लो डेंसिटी पॉलीएथिलीन, बेंजीन, टोल्यून जैसे कई उच्च मूल्य वाले उत्पाद तैयार किए जाएंगे। इसका अर्थ यह है कि राजस्थान केवल पेट्रोल और डीजल ही नहीं, बल्कि प्लास्टिक, पैकेजिंग, ऑटोमोबाइल, पाइप, टेक्सटाइल और रसायन उद्योगों के लिए कच्चा माल भी तैयार करेगा, जिससे राज्य में नई औद्योगिक श्रृंखला विकसित होने की संभावना है।
रोजगार की बात करें तो निर्माण चरण में 20 से 25 हजार से अधिक लोगों के काम करने की जानकारी सामने आई है। परियोजना पूरी तरह चालू होने के बाद प्रत्यक्ष रोजगार सीमित होगा, लेकिन इसके आसपास बनने वाले पेट्रोकेमिकल पार्क, परिवहन, वेयरहाउसिंग, होटल, छोटे उद्योग, मशीनरी, मेंटेनेंस, लॉजिस्टिक्स और सेवा क्षेत्र में बड़ी संख्या में अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होने की उम्मीद जताई जाती है।
इस परियोजना से सबसे बड़ा फायदा पश्चिमी राजस्थान—विशेषकर बाड़मेर, बालोतरा, जैसलमेर और आसपास के क्षेत्रों—को मिलने की उम्मीद है। यहां सड़कें, रेलवे, पाइपलाइन, बिजली, पानी, औद्योगिक क्षेत्र और सहायक उद्योग विकसित होंगे। स्थानीय कारोबार बढ़ सकता है, जमीनों की कीमतें बढ़ी हैं और निवेशकों की रुचि भी बढ़ी है। लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय चुनौतियां भी होंगी।
इतनी बड़ी रिफाइनरी के लिए पानी की उपलब्धता, उत्सर्जन नियंत्रण, औद्योगिक अपशिष्ट प्रबंधन और स्थानीय पारिस्थितिकी की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण होगी। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना सरकार और कंपनी दोनों की जिम्मेदारी होगी। कुछ माह पहले यह परियोजना उद्घाटन के बेहद करीब पहुंच गई थी, लेकिन उद्घाटन से ठीक पहले रिफाइनरी परिसर में आग लगने की घटना ने फिर सवाल खड़े कर दिए। उससे कोई जनहानि नहीं हुई, लेकिन इस घटना के कारण उद्घाटन टल गया और तकनीकी जांच शुरू करनी पड़ी। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि इतने बड़े औद्योगिक संयंत्रों में सुरक्षा मानकों का पालन कितना महत्वपूर्ण है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पचपदरा रिफाइनरी सच में राजस्थान की तकदीर बदल देगी? इसका जवाब हां भी है और नहीं भी। हां इसलिए, क्योंकि यदि इसके आसपास प्रस्तावित पेट्रोकेमिकल उद्योग, एमएसएमई, लॉजिस्टिक्स हब और निवेश समय पर विकसित हुए, तो पश्चिमी राजस्थान देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में शामिल हो सकता है। लेकिन नहीं इसलिए, क्योंकि केवल रिफाइनरी बन जाने से विकास अपने आप नहीं आता।
इसके लिए उद्योग नीति, स्थानीय युवाओं का कौशल विकास, निवेश आकर्षित करने की रणनीति, सड़क और रेल नेटवर्क, जल प्रबंधन और पारदर्शी प्रशासन भी उतना ही जरूरी है। इसलिए पचपदरा रिफाइनरी को केवल एक फैक्ट्री नहीं, बल्कि राजस्थान के आर्थिक भविष्य की सबसे बड़ी परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए।
अगर यह परियोजना पूरी क्षमता से सफल होती है, तो आने वाले दशकों में राजस्थान की अर्थव्यवस्था की दिशा बदल सकती है, लेकिन अगर इसके आसपास का औद्योगिक तंत्र विकसित नहीं हुआ, तो 80 हजार करोड़ रुपये का यह विशाल निवेश अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर पाएगा। यही कारण है कि आज पूरा राजस्थान इस परियोजना को सिर्फ एक रिफाइनरी नहीं, बल्कि अपने भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद के रूप में देख रहा है।

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