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चंदला जाट का खुदवाया जयपुर के राजा का जीर्णोद्वार करवाया राम सागर बांध जहर की चपेट में


"जयपुर, जिसे दुनिया गुलाबी नगरी, महलों और किलों के नाम से जानती है। लेकिन इसी जयपुर की चकाचौंध से महज कुछ किलोमीटर दूर, एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर अपनी आखिरी सांसें गिन रही है, जिसे कभी 'पक्षियों का स्वर्ग' कहा जाता था। हम बात कर रहे हैं चंदलाई बांध की, जिसे सरकारी दस्तावेजों में 'राम सागर बांध' का गौरव हासिल है। लेकिन आज, यह बांध सिर्फ पानी का संचय नहीं कर रहा... बल्कि यह समेटे हुए है हजारों फैक्ट्रियों का तेजाबी जहर, प्रशासनिक बेरुखी और सैकड़ों किसानों के आंसुओं की दास्तान। एक ऐसा बांध जिसका पानी बंजर जमीनें, चर्म रोग और आपकी थाली में गंभीर बीमारियां परोस रहा है। आज 'सियासी भारत' की इस विशेष खोजी डॉक्यूमेंट्री में हम बात करेंगे चंदलाई बांध के उस सच की, जिससे सरकार लगातार आंखें मूंद रही है।" 

"मुद्दे की गहराई में जाने से पहले, आइए समय के पहिए को एक हजार साल पीछे घुमाते हैं। स्थानीय मान्यताओं और जाट समाज के गौरवशाली इतिहास के पन्नों को पलटें, तो इस बांध की नींव एक पावन तालाब के रूप में पड़ी थी। विक्रम संवत 1027, यानी आज से करीब 1056 साल पहले, सन 970 ईस्वी में 'चंदला जाट' ने अपनी दिवंगत पुत्री 'भाला' की पावन स्मृति में यहाँ एक विशाल तालाब का निर्माण करवाया था। सदियों बाद, जयपुर के तत्कालीन राजाओं ने इस तालाब के महत्व को समझा। 

इसका जीर्णोद्धार करवाया गया, इसके दायरे को बड़ा किया गया और इस ऐतिहासिक तालाब को एक भव्य बांध में तब्दील कर इसका नाम रखा गया राम सागर बांध। चूंकि यह चंदलाई गांव के पास स्थित था, इसलिए इसे स्थानीय भाषा में चंदलाई बांध कहा जाने लगा। कभी इस बांध का पानी इतना पवित्र था कि इसके किनारे कदम रखते ही रूह को सुकून मिलता था। लेकिन आज की हकीकत दिल दहला देने वाली है।" 

"राम सागर बांध केवल इंसानों की प्यास नहीं बुझाता था, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय जलीय जीवन का एक बहुत बड़ा केंद्र था। हर साल सर्दियों के मौसम में, जब साइबेरिया, मंगोलिया और मध्य एशिया में कड़ाके की ठंड पड़ती थी, तब हजारों किलोमीटर का सफर तय करके अनगिनत प्रजातियों के विदेशी पक्षी यहाँ विहार करने आते थे। पिंटेल, शोवलर, फ्लेमिंगो और पेलिकन जैसे दुर्लभ पक्षी अक्टूबर से मार्च के महीनों में इस बांध को अपना आशियाना बनाते थे। देश-विदेश से पर्यटक इस अद्भुत नजारे को देखने खिंचे चले आते थे। 

यह जयपुर के नजदीक राजस्थान का एक बेहतरीन टूरिस्ट हब बन सकता था, लेकिन सरकार की बेरुखी और पर्यावरण विभाग की नींद ने इस बेशकीमती धरोहर को बेसहारा छोड़ दिया। आज स्थिति यह है कि हजारों फैक्ट्रियों का केमिकल युक्त जहरीला और तेजाबी पानी एक खुली नहर के जरिए सीधा इस बांध में उड़ेला जा रहा है। नतीजा यह है कि पानी पूरी तरह से जहरीला हो चुका है, बांध से उठने वाली बदबू के कारण पर्यटकों ने मुंह मोड़ लिया है और यहाँ आने वाले विदेशी मेहमान पक्षियों की संख्या अब नाममात्र रह गई है। क्या यह जैव-विविधता की सरेआम हत्या नहीं है?" 

"इस त्रासदी का सबसे दर्दनाक पहलू हैं यहाँ के अन्नदाता—स्थानीय किसान। इस बांध से निकलने वाली नहरें कभी खेतों में हरियाली लाती थीं, हजारों बीघा जमीन की सिंचाई इसी के पानी से होती थी। लेकिन आज इस बांध के पानी ने किसानों की जिंदगी को नर्क बना दिया है। प्रशासनिक कुप्रबंधन के कारण बांध के पानी का स्तर इस कदर बिगड़ा है कि स्थानीय किसानों की जमीनों पर हमेशा गंदा पानी भरा रहता है। इसके कारण किसानों ने खेती करना पूरी तरह बंद कर दिया है। लगातार जलभराव से आसपास के मकानों की दीवारों में भयानक दरारें आ चुकी हैं, जो कभी भी ढह सकती हैं। 

सबसे खौफनाक बात यह है कि इस दूषित और तेजाबी पानी के संपर्क में रहने के कारण स्थानीय आबादी में चर्म रोग महामारी की तरह फैल रहे हैं। सैकड़ों बार सरकार के हर स्तर पर—कलेक्टर से लेकर मंत्रियों तक—आवेदन और निवेदन किए गए, लेकिन नतीजा सिफ़र रहा। स्थानीय किसानों की लगभग 750 बीघा जमीन आज भी डूब क्षेत्र में फंसी हुई है। सरकार न तो इस जमीन को डूब से बाहर निकाल रही है और न ही इन बेसहारा किसानों को कोई मुआवजा दे रही है। जिन हाथों ने कभी जयपुर का पेट भरा, आज उनके सामने अपनी रोजी-रोटी का सबसे गंभीर संकट खड़ा हो गया है।" 

"अगर आप सोच रहे हैं कि चंदलाई बांध की यह बर्बादी सिर्फ उस गांव के लोगों की समस्या है, तो आप बहुत बड़े भ्रम में हैं। अब जो सच हम आपको बताने जा रहे हैं, वह सीधे आपके परिवार के स्वास्थ्य से जुड़ा है। इसी बांध के जहरीले, केमिकल युक्त पानी से आज भी चोरी-छिपे और मजबूरी में अनाज, दालें, तिलहन और मुख्य रूप से सरसों की पैदावार की जा रही है। 

जमीनें धीरे-धीरे बंजर हो रही हैं, लेकिन जो भी फसल इस तेजाब से पैदा हो रही है, वह सीधे जयपुर की मंडियों में सप्लाई की जा रही है। यानी जो आटा, दाल और तेल आपकी रसोई में पहुंच रहा है, उसमें चंदलाई बांध का वो रासायनिक जहर घुला हुआ है, जो कैंसर, लीवर और पेट की गंभीर बीमारियों का कारण बन रहा है। सरकार की बेरुखी सिर्फ एक बांध को नहीं मार रही, बल्कि पूरे जयपुर को धीमा जहर परोस रही है।"  

"एक हजार साल पुराना ऐतिहासिक राम सागर बांध... चंदला जाट की वो धरोहर... आज प्रदूषण, लालच और सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ चुकी है। आज 'सियासी भारत' इस मंच से सरकार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रशासन से कुछ सीधे सवाल पूछता है: आखिर कब तक हजारों फैक्ट्रियों को इस बांध में जहर बहाने की खुली छूट मिलती रहेगी? उन गरीब किसानों की 750 बीघा जमीन का मुआवजा और उनकी रोजी-रोटी का हिसाब कौन देगा? 

क्या सरकार को इस बेशकीमती धरोहर को बचाने के लिए किसी बड़े हादसे का इंतजार है? वक्त आ गया है कि इस बेसहारा छोड़ दी गई धरोहर के लिए आवाज उठाई जाए, वरना वो दिन दूर नहीं जब चंदलाई बांध सिर्फ इतिहास की किताबों में एक प्रदूषित नाले के रूप में दर्ज रह जाएगा। इस गंभीर मुद्दे पर आपकी क्या राय है? क्या फैक्ट्रियों के मुनाफे के आगे हमारे पर्यावरण और किसानों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। 

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