क्या राजस्थान कांग्रेस के दोनों सबसे बड़े महारथी यानी अशोक गहलोत और सचिन पायलट वाकई सुधर गए हैं, या फिर उनके अचानक बदले सुरों के पीछे दिल्ली दरबार का वो हंटर है जिसने दोनों को भीगी बिल्ली बनने पर मजबूर कर दिया? अभी चंद दिनों पहले तक जो दोनों नेता एक-दूसरे के राजनीतिक वजूद को मिटाने पर तुले थे, अचानक ऐसा क्या हुआ कि उनके दिलों में एक-दूसरे के लिए 'स्नेह' और 'पुराने संबंधों' की नदियां बहने लगीं?
राजनीति में जब दो धुर विरोधी अचानक एक-दूसरे की तारीफ करने लगें, तो समझ जाना चाहिए कि परदे के पीछे कोई बहुत बड़ा खेल हुआ है। आज के इस विशेष राजनीतिक विश्लेषण में हम राजस्थान कांग्रेस की इस 'सुलह' की इनसाइड क्रोनोलॉजी को डिकोड करेंगे और जानेंगे कि कैसे दिल्ली की एक फटकार ने जयपुर की इस भड़कती हुई सियासी आग पर पल भर में पानी डाल दिया।
इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है 7 जून को, जब पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने जयपुर के कॉन्सटीट्शन क्लब में अचानक मीडिया के सामने आकर सचिन पायलट पर पिछले 30 महीनों का सबसे बड़ा और तीखा हमला बोल दिया।
गहलोत ने न केवल साल 2020 के मानेसर कांड को याद दिलाया, बल्कि एक बार फिर यह गंभीर आरोप जड़ दिया कि बीजेपी ने पायलट और उनके साथी विधायकों को 35-35 करोड़ रुपयों में खरीदा था और 10 करोड़ रुपये एडवांस भी दिए थे। गहलोत यहीं नहीं रुके, उन्होंने पायलट की बगावत से लेकर खुद की 25 सितंबर 2022 वाली बगावत और अपनी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की अधूरी महत्वाकांक्षा तक को बयानों में लपेट दिया।
गहलोत के इस चौतरफा हमले के बाद पायलट खेमा भी खामोश नहीं बैठने वाला था। ठीक 3 दिन बाद, यानी 10 जून को सचिन पायलट ने करौली की पावन धरा से, बिना नाम लिए मंच से गहलोत पर एक ऐसा करारा पलटवार किया, जिसने सियासी गलियारों में सनसनी मचा दी। पायलट ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए सीधे शब्दों में कहा कि समय आने पर बड़े-बड़े जादूगरों की जादूगरी भी खत्म हो जाती है।
उन्होंने एक बेहद दिलचस्प किस्सा सुनाते हुए कहा कि 'जब वे कॉलेज में पढ़ते थे और उनके पिता राजेश पायलट केंद्र में मंत्री थे, तब देश में चंद्रास्वामी नाम के एक बड़े तांत्रिक का बोलबाला था। लेकिन उनके पिता राजेश पायलट ने एक झटके में उस तांत्रिक को पकड़कर उसकी सारा तांत्रिक रसूख खत्म कर दिया था।' पायलट का यह 'तांत्रिक और जादूगर' वाला तंज सीधे तौर पर अशोक गहलोत पर था।
इसी मंच से केवल पायलट ने ही प्रहार नहीं किया, बल्कि उनके सबसे करीबी और पूर्व मंत्री रमेश मीणा ने तो सारी मर्यादाएं लांघते हुए घोषणा कर दी कि अगर दूध का दूध और पानी का पानी करना है, तो अशोक गहलोत का नार्को टेस्ट करवाया जाना चाहिए। उन्होंने राहुल गांधी को सीधे सलाह दे डाली कि गहलोत साहब को तुरंत कंट्रोल में किया जाए, नहीं तो कांग्रेस कभी नहीं जीत पाएगी।
रमेश मीणा ने हुंकार भरते हुए कहा कि पायलट साहब तो कभी बिके नहीं, लेकिन जब बसपा के 6-6 विधायकों को अशोक गहलोत ने दो-दो बार तोड़कर कांग्रेस में मिलाया था, तब कितना पैसा दिया गया था, इसके पुख्ता सबूत उनके पास मौजूद हैं। इस तीखे घटनाक्रम ने राजस्थान कांग्रेस में गुटबाजी की रफ्तार को बुलेट ट्रेन की स्पीड दे दी।
पूरी प्रदेश कांग्रेस के कार्यकर्ता और आम जनता हैरान थी कि अब राजस्थान कांग्रेस में एक और बड़ा विस्फोट होने वाला है। लेकिन तभी, यानी अगले ही दिन 11 जून को एक ऐसा यू-टर्न आया, जिसने सबको हत्प्रभ कर दिया।
सचिन पायलट ने अचानक नरमी बरतते हुए मीडिया के सामने कहा कि 'गहलोत साहब तो बड़े बुजुर्ग हैं, वे मुझसे भी उतना ही स्नेह और प्यार करते हैं, जितना वे अपने बेटे वैभव गहलोत से करते हैं।' पायलट के इस बयान के तुरंत बाद जादूगर अशोक गहलोत का रवैया भी मोम की तरह पिघल गया। गहलोत ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके और पायलट परिवार के रिश्ते बहुत पुराने और पारिवारिक हैं।
उन्होंने याद दिलाया कि उन्होंने ही सचिन पायलट को पहली बार केंद्र में मंत्री बनवाया था, जिसके लिए पायलट को उन्हें धन्यवाद कहना चाहिए था। हालांकि, गहलोत ने चुटकी लेते हुए यह भी जोड़ दिया कि उन्होंने जो कुछ भी पहले कहा था, वे उनके दिल की बातें थीं जो वो लंबे समय से कहना चाहते थे, और उनके सारे बयान पूरी तरह तथ्यात्मक हैं, उनमें कोई झूठ नहीं है।
अब यहां सबसे तीखा और बड़ा सवाल यह उठता है कि जो नेता एक दिन पहले एक-दूसरे का नार्को टेस्ट कराने, जादूगरी खत्म करने और गद्दारी की पोल खोलने की बातें कर रहे थे, वे अचानक अगले ही दिन इतने आज्ञाकारी और प्रेम से भरे कैसे हो गए?
क्या वाकई दोनों के दिल बदल गए थे? हकीकत इसके ठीक उलट है। परदे के पीछे की असली इनसाइड स्टोरी यह है कि जैसे ही इन दोनों गुटों के तीखे हमलों, चंद्रास्वामी वाले तंज और मर्यादा लांघते बयानों की लाइव रिपोर्ट दिल्ली में गांधी परिवार के पास पहुँची, कांग्रेस आलाकमान का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस आलाकमान ने तुरंत एक्शन लेते हुए दोनों ही कद्दावर नेताओं को फोन पर कड़ी फटकार लगाई। आलाकमान ने सीधे शब्दों में चेतावनी दी कि राज्य में पार्टी पहले ही मुश्किल दौर से गुजर रही है, और अगर इस समय दोनों ने अपनी यह गुटबाजी और आपसी सिरफुटव्वल तुरंत बंद नहीं की, तो पार्टी उनके खिलाफ कड़े अनुशासनात्मक कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटेगी।
दिल्ली से आए इस सख्त संदेश और हंटर के बाद ही इन दोनों शेर-सूरमाओं के तेवर अचानक ठंडे पड़ गए और दोनों ने तुरंत नरमी का रास्ता अख्तियार कर लिया।
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात शीशे की तरह साफ हो जाती है कि राजस्थान कांग्रेस के ये दोनों गुट तब तक ही शांत रह सकते हैं, जब तक दिल्ली में बैठा आलाकमान हाथ में डंडा लेकर खड़ा रहे। जैसे ही आलाकमान की पकड़ थोड़ी ढीली होती है, दोनों गुट एक-दूसरे की राजनीतिक हत्या करने के लिए अपनी तलवारें खींच लेते हैं।
अगर आलाकमान ने आगे भी इसी तरह का कड़ा रुख नहीं अपनाया, तो यह बिल्कुल तय मानिए कि अगले विधानसभा चुनाव तक ये दोनों नेता विपक्ष से लड़ने के बजाय अपने ही दल के नेताओं पर आत्मघाती हमले करते नजर आएंगे।
अब देखना यह है कि दिल्ली की यह डांट कितने दिनों तक काम आती है, या फिर यह शांति सिर्फ किसी बड़े तूफान के आने से पहले की खामोशी है। इस पूरे सियासी ड्रामे और दोनों नेताओं के बदले हुए सुरों पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।
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