क्या आपने कभी सोचा है कि जिस देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रिकॉर्डतोड़ विदेश यात्राएं करते हैं, जिनके लिए दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका ने कभी अपने दरवाजे बंद कर दिए थे, लेकिन बाद में उसी अमेरिका ने उनके स्वागत में पलक-पावड़े बिछा दिए... उसी सरकार का दूसरा सबसे शक्तिशाली चेहरा यानी गृह मंत्री अमित शाह आखिर कभी विदेश क्यों नहीं जाते? भारत के रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, वित्त मंत्री, यहाँ तक कि नितिन गडकरी जैसे नेता भी लगातार अंतरराष्ट्रीय दौरों पर रहते हैं। लेकिन राजनीति के आधुनिक चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह पिछले दो दशकों से, खासकर साल 2006 के बाद से, कभी किसी विदेशी सरजमीं पर कदम क्यों नहीं रखते? इंटरनेट, सोशल मीडिया और यूट्यूब पर इसके पीछे कई रहस्यमयी थ्योरियां तैर रही हैं। कोई कहता है कि उन पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध है, तो कोई दावा करता है कि उनके पास पासपोर्ट ही नहीं है। आखिर इस महा-सस्पेंस के पीछे की असली और प्रामाणिक हकीकत क्या है? क्या यह उनकी कोई सोची-समझी राजनीतिक रणनीति है, या फिर इसके पीछे छिपी है अतीत की कोई कानूनी मजबूरी? आज के इस 7 मिनट के खोजी विश्लेषण में हम हर एक पक्ष, हर एक सरकारी रिपोर्ट, अदालती दस्तावेज और इंटरपोल के आदेशों की परतों को गहराई से खंगालेंगे, ताकि आपको इस रहस्य का बिल्कुल स्पष्ट और सच्चा जवाब मिल सके।
इस पूरी पहेली को समझने के लिए सबसे पहले हमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली को देखना होगा। पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की कूटनीति में एक बड़ा बदलाव आया। उन्होंने दुनिया के दर्जनों देशों की सघन यात्राएं कीं, वैश्विक मंचों पर भारत का डंका बजाया और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी। लेकिन मोदी की इन अत्यधिक यात्राओं के पीछे अतीत का एक बहुत बड़ा दर्द भी छिपा है। साल 2002 के गुजरात दंगों के बाद, अमेरिका और कई यूरोपीय देशों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। यहाँ तक कि साल 2005 में अमेरिका ने उनका डिप्लोमैटिक वीजा तक रद्द कर दिया था। लेकिन राजनीति का पहिया घूमा और 2014 में जब नरेंद्र मोदी पूर्ण बहुमत के साथ देश के प्रधानमंत्री बने, तो इतिहास बदल गया। जिस अमेरिका ने कभी मोदी को वीजा देने से इनकार किया था, उसी अमेरिका के व्हाइट हाउस ने उनके स्वागत में रेड कार्पेट बिछाया, अमेरिकी संसद यानी 'कांग्रेस' में उन्हें खड़े होकर स्टैंडिंग ओवेशन दिया गया और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने उनके स्वागत में पलक-पावड़े बिछा दिए। मोदी की यह कहानी साबित करती है कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध या पाबंदियां वक्त के साथ बदल जाती हैं।
तो फिर जब प्रधानमंत्री मोदी पूरी दुनिया घूम रहे हैं, तो अमित शाह क्यों देश के भीतर ही सिमटे हुए हैं? जब हम खोजी पत्रकारों की रिपोर्ट्स और इंटरनेट पर चल रहे दावों को खंगालते हैं, तो एक थ्योरी सामने आती है कि अमित शाह ने सालों से अपना पासपोर्ट ही रिन्यू नहीं कराया है। कुछ लोग इसे साल 2010 के सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस से जोड़कर देखते हैं, जब अमित शाह को गुजरात पुलिस की कस्टडी में जाना पड़ा था और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें कुछ समय के लिए गुजरात से तड़ीपार यानी बाहर रहना पड़ा था। अफवाहें उड़ाई जाती हैं कि शायद उस अदालती केस की वजह से इंटरपोल का कोई छिपा हुआ आदेश है या किसी देश ने उन पर गुप्त प्रतिबंध लगा रखा है। लेकिन जब हम कानूनी और सरकारी दस्तावेजों की गहराई में जाते हैं, तो यह सारी अफवाहें ताश के पत्तों की तरह ढह जाती हैं। सच यह है कि दिसंबर 2014 में मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने अमित शाह को सोहराबुद्दीन मामले में सभी आरोपों से पूरी तरह से बरी कर दिया था। अदालत ने साफ कहा था कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप राजनीति से प्रेरित थे। कानूनी रूप से बरी होने के बाद किसी भी नेता पर न तो पासपोर्ट की पाबंदी रह जाती है और न ही इंटरपोल का कोई रेड कॉर्नर नोटिस लागू होता है। यानी अमित शाह के विदेश न जाने के पीछे कोई भी कानूनी अड़चन या अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध जैसी बात बिल्कुल झूठ और बेबुनियाद है।
तो फिर आखिर असली वजह क्या है? सरकारी कामकाज और गृह मंत्रालय के प्रोटोकॉल का अध्ययन करने पर इसका सबसे ठोस और प्रशासनिक कारण सामने आता है। अमित शाह भारत के गृह मंत्री हैं। एक रक्षा मंत्री या विदेश मंत्री का काम देश के बाहर की रणनीतियों और कूटनीति को संभालना होता है, लेकिन एक गृह मंत्री की प्राथमिक और संवैधानिक जिम्मेदारी देश की Internal Security को अक्षुण्ण बनाए रखना है। कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद की स्थिति हो, देश में कानून-व्यवस्था का मसला हो, नक्सलवाद का खात्मा करना हो, या फिर खुफिया तंत्र को चौबीसों घंटे मॉनिटर करना हो, इन सब की कमान सीधे गृह मंत्री के हाथ में होती है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वैश्विक दौरों पर देश से बाहर होते हैं, तब प्रशासनिक रूप से यह बेहद जरूरी हो जाता है कि सरकार का दूसरा सबसे मजबूत और भरोसेमंद चेहरा देश के भीतर रहकर हर पल की आंतरिक सुरक्षा स्थिति पर नजर बनाए रखे। अमित शाह और पीएम मोदी के बीच का यह रिश्ता एक सिंबायोटिक यानी पूरक रिश्ता है, जहाँ मोदी बाहरी दुनिया में भारत का प्रभाव बढ़ाते हैं और शाह देश के भीतर अभेद्य सुरक्षा चक्र तैयार करते हैं।
इसके अलावा, अमित शाह की अपनी एक खास राजनीतिक कार्यशैली है, जिसे राजनीतिक विश्लेषक 'ग्राउंड रियलिटी कल्ट' कहते हैं। अमित शाह को भारतीय जनता पार्टी का आधुनिक संगठनकर्ता और चुनावी चाणक्य माना जाता है। उनकी राजनीति लुटियंस दिल्ली के बंद कमरों या विदेशों के चमचमाते अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की मोहताज नहीं है, बल्कि उनकी ताकत देश के कोने-कोने में फैले बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से जुड़ने में है। विश्लेषकों का मानना है कि अमित शाह की कूटनीति विदेशी दौरों में नहीं, बल्कि देश के भीतर चुनावी माइक्रो-मैनेजमेंट में चलती है。 वे खुद कहते हैं कि उनका ध्यान देश के भीतर संगठन को अजेय बनाने पर केंद्रित है। वे विदेशों में जाकर भाषण देने के बजाय देश के दुर्गम और संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों, जैसे गुजरात के 'हरामी नाला' क्रीक क्षेत्र, राजस्थान की थार सीमा या उत्तर-पूर्व की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं का दौरा करना ज्यादा पसंद करते हैं। वे इन सीमाओं को तकनीक से लैस करके 'स्मार्ट बॉर्डर्स' में बदलने के मिशन पर काम कर रहे हैं।
संपूर्ण अध्ययन और हर एक रिपोर्ट को खंगालने के बाद यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि अमित शाह के विदेश न जाने के पीछे कोई रहस्यमयी कमजोरी या अंतरराष्ट्रीय पाबंदी नहीं है, बल्कि यह उनका अपना सोचा-समझा प्रशासनिक फैसला, उनकी सांगठनिक प्राथमिकता और देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता है। उन्होंने वैश्विक कूटनीति का जिम्मा पूरी तरह पीएम मोदी और विदेश मंत्रालय पर छोड़ रखा है, जबकि खुद देश के भीतर रहकर सत्ता और सुरक्षा के सबसे मजबूत स्तंभ बने हुए हैं।
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