कांग्रेस के जादूगर अशोक गहलोत अब खुद अपनी ही बुनी सियासी बिसात में उलझते जा रहे हैं। पूर्व सीएम गहलोत अब राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट का बॉस बनने की तैयारी में हैं, वे राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना चाहते हैं और इसी उधेडबुन में पायलट को नीचा दिखाकर खुद के बड़ा होने का अहसास करवा रहे हैं। गहलोत का कोई ऐसा गुप्त एजेंडा नहीं है, जादूगर का यही वो सियासी दांव है, जो दिल्ली से लेकर जयपुर तक की सियासत को हिला रहा है? उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि अध्यक्ष बनना चाहते थे, लेकिन परिस्थितियां बिगड़ गईं और वो अध्यक्ष नहीं बन पाए, लेकिन इसी बयान में छिपा है कि अब वो अध्यक्ष बनना चाहते हैं।
अशोक गहलोत ने एक बार फिर 25 सितंबर 2022 की उस ऐतिहासिक घटना का जिक्र कर कहा कि उस वक्त कांग्रेस विधायक नहीं चाहते थे कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाए। इसीलिए जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिल्ली से 2 ऑब्जर्वर भेजे, तो विधायक दल की बैठक नहीं हो पाई और 82 विधायकों ने उनके पक्ष में बगावत करते हुए अपने इस्तीफे सौंप दिए।
इतिहास के बयानों और सियासत की परतों को अगर गहराई से खंगाला जाए, तो गहलोत के इस बयान के बाद एक ऐसा तीखा सवाल खड़ा होता है जो खुद उनके पूरे राजनीतिक करियर की वैधता पर सवालिया निशान लगा देता है। सवाल यह है कि अगर अशोक गहलोत विधायकों की मर्जी से सीएम चुने जाने की इतनी दुहाई देते हैं, तो खुद उन्हें राजस्थान के विधायकों ने कब और किस बैठक में मुख्यमंत्री चुना था? गहलोत खुद गर्व से कई बार मीडिया के सामने कह चुके हैं कि उन्हें सोनिया गांधी ने तीन-तीन बार राजस्थान का मुख्यमंत्री चुना।
इसका सीधा और साफ मतलब तो यही हुआ कि गहलोत को कभी भी विधायकों ने नेता नहीं चुना, बल्कि हर बार दिल्ली के आलाकमान ने उन पर अपनी पसंद थोपी। और उसी आलाकमान ने जब सचिन पायलट को सीएम चुनने का प्रस्ताव जयपुर भेजा तो गहलोत ने विधायकों के कंधों पर बंदूक रखकर चला दी। यानी जब आलाकमान उनको चुने तो ठीक, लेकिन दूसरे को चुने तो वही आलाकमान गलत? विधायक दूसरे को चुने तो गलत और गहलोत को चुने तो ठीक। यही वो दोहरी पगडंडी है, जहां अशोक गहलोत सवालों में घिर जाते हैं।
अगर हम राजस्थान कांग्रेस के इतिहास के पन्नों को पलटें, तो यह बात पूरी तरह सच साबित होती है। साल 1998 में जब अशोक गहलोत पहली बार मुख्यमंत्री बने, तब विधायक दल की बैठक में विधायकों का भारी बहुमत परसराम मदेरणा के पक्ष में था। लेकिन दिल्ली की मर्जी के आगे विधायकों को झुकना पड़ा, एक लाइन का प्रस्ताव पास करके आलाकमान को अधिकृत किया गया और मदेरणा को दरकिनार कर गहलोत की ताजपोशी हुई।
ठीक यही कहानी 2008 में दोहराई गई, जब फिर से वही 'वन लाइन प्रपोजल' दिल्ली भेजा गया और गहलोत दूसरी बार मुख्यमंत्री बन गए। और साल 2018 का घटनाक्रम तो देश ने लाइव देखा था, जब जमीन पर खून-पसीना बहाकर पार्टी को जिताने वाले सचिन पायलट के पक्ष में अधिकांश विधायक खड़े थे, लेकिन जयपुर से फिर वही एक लाइन का प्रस्ताव दिल्ली गया। सात दिनों तक दिल्ली के बंद कमरों में लंबी खींचतान और नूराकुश्ती चली, और आखिरकार सोनिया गांधी के वीटो पावर का इस्तेमाल करते हुए राहुल गांधी ने अशोक गहलोत के नाम पर मुहर लगाकर जयपुर भेज दिया।
उस वक्त जयपुर के कांग्रेस मुख्यालय के बाहर जो कुछ हुआ, वो कांग्रेस की आंतरिक लोकतंत्र की पोल खोलने के लिए काफी था। गहलोत के बेहद करीबी माने जाने वाले प्रताप सिंह खाचरियावास ने गुस्से में मीडिया के कैमरों के सामने कहा था कि जब पहले से ही तय है कि गहलोत को ही सीएम बनाना है, तो फिर इस विधायक दल की बैठक का ढोंग करने का क्या मतलब है?
यहाँ तक कि दिग्गज नेता विश्वेंद्र सिंह ने भी इस पूरी प्रक्रिया पर अपनी गहरी नाराजगी जताई थी। ऐसे में आज गहलोत साहब से यह सवाल पूछा जाना लाजिमी है कि जब 25 सितंबर 2022 को सोनिया गांधी ने फिर से वही एक लाइन का प्रस्ताव पास करके दिल्ली भेजने का निर्देश दिया था, जो कि कांग्रेस की पुरानी परंपरा रही है, तो उस दिन उन्होंने अपने साथी विधायकों के साथ मिलकर आलाकमान के खिलाफ इतनी बड़ी बगावत क्यों की?
गहलोत सार्वजनिक मंचों से यह दावा करते हैं कि उन्होंने वह बगावत सचिन पायलट के खिलाफ की थी, लेकिन यह तर्क गले नहीं उतरता। क्योंकि तब सचिन पायलट न तो पीसीसी चीफ थे, न डिप्टी सीएम थे और न ही उनके पास कोई बड़ा पद था; वे महज एक साधारण विधायक थे जो एक सदस्य के तौर पर विधायक दल की बैठक में शामिल होना चाहते थे।
तो फिर एक सिटिंग सीएम को एक साधारण विधायक के खिलाफ इस कदर बगावत करने और समानांतर बैठक बुलाने की जरूरत क्यों पड़ी? हकीकत यह है कि जयपुर आए मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आधिकारिक प्रतिनिधि थे। इसलिए गहलोत और उनके गुट ने जो बगावत की थी, वह पायलट के खिलाफ नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सोनिया गांधी और दिल्ली आलाकमान के खिलाफ एक खुला विद्रोह था।
बात सिर्फ यहीं तक नहीं रुकती। गहलोत ने एक बार फिर पुराना राग अलापते हुए मीडिया के सामने दोहराया है कि साल 2020 में उनकी सरकार गिराने के लिए बीजेपी ने सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों को 35-35 करोड़ रुपयों में खरीदा था, और इसके पेटे 10-10 करोड़ रुपये एडवांस भी दिए गए थे, जो कि आज तक वापस नहीं लिए गए।
अब यहाँ बड़ा कानूनी और नैतिक सवाल यह उठता है कि गहलोत उस वक्त राज्य के मुख्यमंत्री थे, होम डिपार्टमेंट उनके पास था, पुलिस और एसीबी उनके अधीन काम कर रही थी। अगर उनके पास विधायकों की खरीद-फरोख्त के पुख्ता सबूत हैं, तो उन्होंने वे सबूत आज तक एसीबी को क्यों नहीं सौंपे? वे बार-बार मीडिया के सामने आकर केवल बयानबाजी क्यों कर रहे हैं?
अगर उनके पास वाकई कोई सबूत हैं, तो उन्हें जनता के सामने रखना चाहिए, ताकि बीजेपी की असलियत भी बेनकाब हो और पायलट की पोल भी खुल सके। लेकिन सच्चाई यह लगती है कि राजनीतिक लाभ के लिए सुनी-सुनाई और हवा-हवाई बातों के अलावा गहलोत के पास कोई ठोस कानूनी प्रमाण नहीं है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि जब मानेसर कांड खत्म हुआ, तो सोनिया गांधी के निर्देश पर जैसलमेर से जयपुर आते समय उन्होंने सभी विधायकों से कहा था कि 'भूलो और आगे बढ़ो'। लेकिन उनका दर्द यह है कि पायलट ने आज तक उनके सामने आकर अपनी उस गलती पर माफी या खेद नहीं जताया।
आलाकमान के हस्तक्षेप के बाद जब पूरा मामला आधिकारिक तौर पर खत्म हो चुका था, दोनों नेता कई बार मंच साझा कर चुके हैं, तो आज पायलट के अफसोस जताने या न जताने से क्या फर्क पड़ने वाला है? सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि सचिन पायलट इस समय कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हैं, छत्तीसगढ़ जैसे बड़े राज्य के प्रभारी हैं, और राजस्थान में पार्टी के सबसे लोकप्रिय चेहरों में से एक हैं।
इसके बावजूद, गहलोत लगातार अपने ही दल के राष्ट्रीय पदाधिकारी पर इतने तीखे और अमर्यादित हमले कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस आलाकमान उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। आखिर गहलोत के इस सियासी रसूख के आगे दिल्ली का आलाकमान इतना बेबस और लाचार क्यों है?
अपनी पार्टी की इस नाकामी और आपसी खींचतान का ठीकरा हमेशा की तरह गहलोत ने मीडिया और सोशल मीडिया पर भी फोड़ा है। उनका कहना है कि मीडिया इस विवाद को जानबूझकर तूल देता है। लेकिन गहलोत साहब, लड़ तो आप और आपकी पार्टी के नेता आपस में रहे हैं, बंद कमरों की गुटबाजी सड़कों पर आप लोग ला रहे हैं, लेकिन जब भी संगठन पर आपका बस नहीं चलता, तो आप सारा दोष मीडिया के सिर मढ़कर खुद को पाक-साफ घोषित कर देते हैं।
आखिर यह बहानेबाजी कब तक चलेगी? वीडियो के अंत में सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह है कि अशोक गहलोत अचानक इस समय एक बार फिर सचिन पायलट पर इतने हमलावर क्यों हो गए हैं? क्या दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि कांग्रेस आलाकमान सचिन पायलट को संगठन या राष्ट्रीय स्तर पर कोई बहुत बड़ी और निर्णायक जिम्मेदारी सौंपने जा रहा है, और गहलोत इसी को रोकने के लिए पहले से ही एक आक्रामक चक्रव्यूह तैयार कर रहे हैं?
या फिर सिक्के का दूसरा पहलू यह है, जैसा कि कुछ राजनीतिक विश्लेषक और अंदरूनी सूत्र मानते हैं, कि जब भी केंद्र की मोदी सरकार या राजस्थान की मौजूदा भजनलाल सरकार किसी बड़े संकट या विफलता में घिरती है, तो गहलोत ठीक उसी समय मीडिया में पायलट के खिलाफ ऐसे विवादित बयान जारी कर देते हैं ताकि मुख्य मुद्दों से जनता का ध्यान भटक जाए।
अगर यह थ्योरी सच है, तो यह इस पुराने कयास को और मजबूत करती है कि राजनीति के मंच पर भले ही दोनों अलग-अलग ध्रुवों पर दिखते हों, लेकिन अशोक गहलोत और नरेंद्र मोदी की पुरानी आपसी केमिस्ट्री और राजनीतिक दोस्ती आज भी परदे के पीछे बखूबी काम आ रही है।
.png)
Post a Comment