बीजेपी हटाएगी सीजेपी?


इतिहास एक बार फिर से खुद को दोहराता नजर आ रहा है? दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर देश की सत्ता बदलने का गवाह बनने को बैताब है। जब 15 साल पहले एक बुजुर्ग समाजसेवी भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन पर बैठे थे, और विपक्ष उनके साथ खड़ा था, देशभर में माहौल बना, अगले ही साल शीला दीक्षित की 15 साल पुरानी सरकार से से बाहर हुई और तीन साल बाद यूपीए की सरकार सत्ताहीन हो गई। आज फिर वही जंतर-मंतर है, फिर एक समाजसेवी अनशन पर है, फिर से विपक्षी दल एकजुट दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इस बार सत्ता में कांग्रेस नहीं बल्कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार है। तब अनशन वाले अन्ना हजारे थे, आज सोनम वांगचुक हैं। तब आंदोलन से अरविंद केजरीवाल निकले थे, आज सीजेपी के अभिषेक दीपके चर्चा में हैं। तब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे, आज नरेंद्र मोदी हैं। तब सवाल यह उठता है कि क्या इतिहास फिर खुद को दोहराएगा या यह सिर्फ एक राजनीतिक भ्रम है?

आज से ठीक 15 साल 5 अप्रैल 2011 के दिन देश की राजधानी में इतिहास लिखा गया था। दिल्ली का जंतर-मंतर हजारों लोगों से भरा हुआ था। महाराष्ट्र में रालेगण सिद्धी के 73 वर्षीय समाजसेवी अन्ना हजारे मजबूत लोकपाल कानून की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे थे। उस समय देश में भ्रष्टाचार सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका था। यूपीए सरकार पर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, कोयला ब्लॉक आवंटन विवाद और कई अन्य मामलों में सीरियस एलिगेशन थे। पूरे देश में कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बन रहा था। बीजेपी और लगभग पूरा विपक्ष अन्ना हजारे के आंदोलन के साथ खड़ा था। मीडिया लगातार आंदोलन की कवरेज कर रहा था और देखते ही देखते यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया। इसके तीन साल बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। उसी आंदोलन से अरविंद केजरीवाल निकले, जिन्होंने आम आदमी पार्टी बनाई और 15 साल पुरानी दिल्ली की शीला दीक्षित सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।

15 साल बाद अब एक ​बार फिर से दिल्ली का वही जंतर-मंतर है। फिर अनशन चल रहा है। फिर विपक्ष समर्थन कर रहा है, लेकिन इस बार अन्ना हजारे की जगह लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक हैं। आंदोलन की अगुवाई आम आदमी पार्टी की जगह कॉकरोच जनता पार्टी, यानी सीजेपी कर रही है। कहा जा रहा है कि पर्दे के पीछे आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी विरोधी लगभग सभी दल इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। करीब 22 दिनों से अनशन चल रहा है। सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। उनके अस्पताल जाने के बाद सीजेपी के कई कार्यकर्ता अनशन पर बैठ गए। संसद मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोक दिया। हजारों लोग इस मार्च में शामिल हुए और यहीं से सोशल मीडिया पर तुलना शुरू हो गई कि क्या यह दूसरा अन्ना आंदोलन बनने जा रहा है। अगर दोनों आंदोलनों को ध्यान से देखें तो कई समानताएं दिखाई देती हैं। दोनों आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुए। दोनों की अगुवाई किसी बड़े राजनीतिक नेता ने नहीं, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ताओं ने की। दोनों में अनशन सबसे बड़ा हथियार बना। दोनों को विपक्षी दलों का खुला समर्थन मिला। दोनों में सरकार और पुलिस की कार्रवाई राजनीतिक बहस का विषय बनी। दोनों आंदोलनों में युवा बड़ी संख्या में दिखाई दिए, और सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस तरह 2011 में कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाया गया था, उसी तरह आज बीजेपी सरकार के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय मुद्दा भ्रष्टाचार और लोकपाल था, जबकि आज विपक्ष का सबसे बड़ा मुद्दा नीट पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पर सवाल उठाना है।

लेकिन क्या सिर्फ इतनी समानताओं से यह मान लिया जाए कि इतिहास खुद को दोहराने वाला है? शायद इतना जल्दी समानता मान लेना ठीक नहीं होगा। क्योंकि 2011 और 2026 का राजनीतिक माहौल पूरी तरह अलग है। उस समय यूपीए सरकार लगातार बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई थी। देशभर में भ्रष्टाचार राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका था। सोशल मीडिया शुरुआती दौर में था और टीवी चैनलों की भूमिका कहीं ज्यादा प्रभावशाली थी। आज राजनीतिक संचार का पूरा तरीका बदल चुका है। बीजेपी देश की सबसे मजबूत संगठनात्मक पार्टी मानी जाती है। उसके पास बूथ स्तर तक मजबूत नेटवर्क है। डिजिटल मीडिया पर उसकी पकड़ पहले से कहीं ज्यादा मजबूत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज भी बीजेपी का सबसे बड़ा चुनावी चेहरा हैं, जबकि तब मनमोहन सिंह को केवल एक मुखोटा माना जाता था। इसलिए सिर्फ आंदोलन के आधार पर राजनीतिक परिणामों का अनुमान लगाना आसान नहीं है। अब सवाल आता है कि क्या सीजेपी दूसरी आम आदमी पार्टी बन सकती है? इतिहास बताता है कि हर आंदोलन राजनीतिक दल नहीं बनता और हर राजनीतिक दल सत्ता तक नहीं पहुंचता। अरविंद केजरीवाल ने अन्ना आंदोलन के बाद सिर्फ पार्टी नहीं बनाई थी, बल्कि दिल्ली में संगठन खड़ा किया, वार्ड स्तर तक कार्यकर्ता तैयार किए, स्थानीय मुद्दों पर लगातार काम किया और फिर चुनाव जीतकर सरकार बनाई। आज सीजेपी को भी अगर वही रास्ता तय करना है तो उसे सिर्फ आंदोलन से आगे बढ़कर मजबूत संगठन, फंडिंग, उम्मीदवार, बूथ नेटवर्क और लगातार चुनावी मेहनत करनी होगी। इसलिए अभी यह कहना कि अभिषेक दीपके अगले अरविंद केजरीवाल बन जाएंगे, राजनीतिक रूप से काफी जल्दबाजी होगी।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सोनम वांगचुक मोदी सरकार के खिलाफ वही माहौल बना पाएंगे जो अन्ना हजारे ने 2011 में मनमोहन सरकार के खिलाफ बनाया था? इसमें कोई शक नहीं कि सोनम वांगचुक की व्यक्तिगत छवि काफी सकारात्मक मानी जाती है। शिक्षा, नवाचार और पर्यावरण के क्षेत्र में उनका काम उन्हें एक विश्वसनीय सामाजिक कार्यकर्ता की पहचान देता है। लेकिन किसी आंदोलन का असर सिर्फ उसके नेता की लोकप्रियता से तय नहीं होता। सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि क्या जनता उस मुद्दे को अपना मुद्दा मानती है? क्या आंदोलन दिल्ली से निकलकर पूरे देश में फैलता है? क्या वह चुनावी मुद्दा बन जाता है? और क्या विपक्ष उस मुद्दे को लगातार जिंदा रख पाता है? अगर इन सवालों का जवाब हां में मिलता है, तभी कोई आंदोलन सत्ता परिवर्तन की दिशा में असर डाल सकता है। इतिहास यह भी बताता है कि सिर्फ एक आंदोलन किसी सरकार को सत्ता से बाहर नहीं करता। 2014 में कांग्रेस की हार के पीछे सिर्फ अन्ना आंदोलन नहीं था। महंगाई, भ्रष्टाचार के आरोप, नीति पक्षाघात, आर्थिक सुस्ती और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता जैसे कई कारण एक साथ काम कर रहे थे। उसी तरह अगर आज का आंदोलन बीजेपी के खिलाफ असर डालना चाहता है तो उसे सिर्फ पेपर लीक के मुद्दे तक सीमित नहीं रहना होगा। उसे पूरे देश की जनभावना से जुड़ना होगा। तभी उसका राजनीतिक प्रभाव दिखाई देगा।

इसलिए फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बन गया है। तस्वीरें जरूर 2011 जैसी दिखाई देती हैं, लेकिन तस्वीरें एक जैसी होने का मतलब यह नहीं कि नतीजे भी वैसे ही होंगे। इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब इस देश का युवा, छात्र और किसान सड़कों पर उतरता है, तो बड़ी से बड़ी और घमंडी से घमंडी हुकूमतों की दीवारें थरथरा उठती हैं। NEET पेपर लीक का यह मुद्दा महज़ एक परीक्षा का मुद्दा नहीं है, यह इस देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य और भरोसे का मुद्दा है। सोनम वांगचुक का यह अनशन और CJP का यह प्रदर्शन भले ही आज पुलिस के पहरे में हो, लेकिन इसने दिल्ली सरकार की नींद ज़रूर हराम कर दी है। अब देखना यह होगा कि क्या NEET पेपर लीक का यह गुस्सा वोट की चोट में बदलकर 2014 की तरह कोई नया इतिहास लिखेगा, या फिर यह भी महज़ एक और राजनीतिक ढोंग बनकर हवा में गायब हो जाएगा? इस पूरे सियासी ड्रामे पर आपकी राय जरुर लिखिए।

Post a Comment

Previous Post Next Post