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आंतरिक लोकतंत्र तो सत्ता से बेदखल क्यों हो रही है?


बात भारतीय राजनीति के उस सबसे पुराने और सबसे गहरे सच की, जिसने न सिर्फ कांग्रेस को अंदर से कमज़ोर किया है, बल्कि भाजपा के उदय का सबसे बड़ा कारण भी बना है। सवाल सीधा है, कांग्रेस में इतना कलह क्यों? आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस के नेता एक-दूसरे पर सरेआम वार करते हैं, जबकि भाजपा में वसुंधरा राजे जैसे दिग्गज को दरकिनार करने के बाद भी शांति बनी रहती है? 

यह कहानी आज की नहीं है। यह कहानी दशकों पुरानी है। नाथूराम मिर्धा से लेकर शीशराम ओला, और अशोक गहलोत से लेकर सचिन पायलट तक, कांग्रेस हमेशा से ही विवादों से जूझती नज़र आई है।  जुलाई 2020 में सचिन पायलट ने अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ बगावत की, तो दिसंबर 2022 में अशोक गहलोत ने कांग्रेस आलाकमान को ही आंख दिखाई।  लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन दोनों नेताओं पर कोई सख्त एक्शन नहीं हुआ, बल्कि दोनों पहले से ज़्यादा मज़बूत हो गए। 

राजस्थान की बात करें, तो यहाँ का कांग्रेस का इतिहास विवादों से भरा पड़ा है। हरीश चौधरी लगातार अशोक गहलोत पर हमलावर रहते हैं, तो अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को कई सालों तक गद्दार करार दिया।  शांति धारीवाल और प्रताप सिंह खाचरियावास जैसे नेता गोविंद सिंह डोटासरा को छह साल बाद भी अध्यक्ष नहीं मानते।  अशोक चांदना के समर्थकों के बहाने सचिन पायलट पर हमले होते रहे।  कभी भाजपा में रहे प्रहलाद गुंजल आज कांग्रेस में होकर भी शांति धारीवाल को फूटी आंख नहीं सुहाते, जबकि रामलाल जाट और धीरज गुर्जर में तकरार सरेआम हो चुकी है।  और इसके बावजूद कांग्रेस के एक भी नेता पर एक्शन नहीं हुआ। 

अब दूसरी तरफ देखिए भाजपा का नज़ारा। वसुंधरा राजे 2018 से सत्ता और संगठन से बाहर हैं, लेकिन आज तक उन्होंने उफ्फ तक नहीं की।  किरोड़ीलाल मीणा ने मुख्यमंत्री के खिलाफ दो शब्द बोलने का प्रयास किया, लेकिन आलाकमान की स्टिक के बाद वे भी चुप होकर बैठ गए। कभी भाजपा के दिग्गज माने जाने वाले राजेंद्र राठौड़ आज हाशिए पर हैं, लेकिन एक शब्द भी पार्टी के खिलाफ नहीं बोल पा रहे।

कांग्रेस वाले इसे पार्टी के अंदर का लोकतंत्र कहते हैं। उनका दावा है कि हमारे यहाँ सबको अपने मन की बात कहने का हक है।  लेकिन असलियत कुछ और ही है। असलियत यह है कि कांग्रेस में नेतृत्व की स्पष्टता नहीं है, अनुशासन की कमी है, और सबसे बड़ी बात, निर्णय लेने की क्षमता नहीं है। जब ऊपर से कोई स्पष्ट संदेश नहीं जाता, तो नीचे के नेता अपने-अपने स्वार्थ में उलझ जाते हैं। 

वहीं भाजपा एक कैडर बेस्ड पार्टी है। यहाँ आलाकमान के निर्देशों को कभी दरकिनार नहीं किया जाता।  जो भी आदेश ऊपर से होता है, सभी नेता और कार्यकर्ता उसको फॉलो करते हैं।  यही वजह है कि भाजपा में कांग्रेस से ज़्यादा एकजुटता दिखाई देती है।  और शायद यही वजह है कि भाजपा अधिकांश राज्यों और देश में शासन कर रही है, जबकि कांग्रेस कई राज्यों में पूरी तरह से साफ हो चुकी है। 

राजनीति में दो चीज़ें सबसे ज़्यादा मायने रखती हैं, एक है संगठन, और दूसरा है अनुशासन।  कांग्रेस के पास इतिहास है, विरासत है, बड़े-बड़े नेता हैं, लेकिन संगठन ढीला है और अनुशासन की कमी है।  भाजपा के पास आरएसएस जैसा एक मज़बूत संगठन है, जो हर कार्यकर्ता को एक सूत्र में बांधे रखता है।  जब पार्टी हाईकमान कोई फैसला लेता है, तो पूरा कैडर एक स्वर में उसका समर्थन करता है।

राजस्थान में इसका सबसे बड़ा उदाहरण है वसुंधरा राजे। साल 2018 में हार के बाद से वे न तो मुख्यमंत्री रहीं, न ही उन्हें संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी मिली।  लेकिन उन्होंने कभी पार्टी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला।  न कोई बगावत की, न कोई धमकी दी, न ही मीडिया के सामने आलाकमान पर निशाना साधा।  वहीं कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट का विवाद आज भी ताज़ा है।  दोनों एक-दूसरे पर हमला करते हैं, कार्यकर्ताओं को बांटते हैं, और पार्टी को कमज़ोर करते हैं, लेकिन आलाकमान चुप है। 

यही वजह है कि कांग्रेस धीरे-धीरे पिघल रही है।  जहाँ-जहाँ कांग्रेस सत्ता में आई, वहाँ-वहाँ अंदरूनी कलह ने सरकार को गिरा दिया या चुनाव हारवा दिया।  मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हर जगह यही कहानी दोहराई गई।  जबकि भाजपा ने अपने संगठन की मज़बूती और अनुशासन की बदौलत न सिर्फ सत्ता बरकरार रखी, बल्कि नई-नई जगहों पर अपना विस्तार भी किया। 

दोस्तों, राजनीति में लोकतंत्र ज़रूरी है, लेकिन अराजकता नहीं।  पार्टी के अंदर बहस हो सकती है, मतभेद हो सकते हैं, लेकिन जब फैसला हो जाए, तो सबको एक साथ चलना होता है।  कांग्रेस में यह संस्कृति खत्म हो चुकी है। हर नेता अपना अलग गुट चला रहा है, हर किसी का अपना एजेंडा है, और आलाकमान के पास न तो स्पष्टता है, न ही एक्शन लेने की हिम्मत। 

भाजपा में यह संस्कृति आज भी बरकरार है।  यहाँ फैसला ऊपर से होता है, और नीचे तक सब उसे मानते हैं।  चाहे वह वसुंधरा राजे हों, चाहे किरोड़ीलाल मीणा, चाहे राजेंद्र राठौड़, सब जानते हैं कि पार्टी की मर्यादा से ऊपर कुछ नहीं है।  और यही वजह है कि भाजपा आज देश की सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है। 

तो दोस्तों, निष्कर्ष यह है कि कांग्रेस का कलह कोई नई बात नहीं है, यह उसकी पहचान बन चुकी है।  और जब तक कांग्रेस अपने संगठन को मज़बूत नहीं करेगी, अनुशासन नहीं लाएगी, और आलाकमान स्पष्ट निर्णय नहीं लेगी, तब तक कांग्रेस का पतन जारी रहेगा।  वहीं भाजपा अपनी कैडर बेस्ड संस्कृति और अनुशासन की बदौलत आगे बढ़ती जाएगी। 

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