छात्राओं के यौन शोषण के आरोपी प्रिंसिपल पर मेहरबानी किसकी?

AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर

स्कूली बच्चियों के साथ यौन शोषण की घटनाएं लगातार सामने आना अत्यंत चिंताजनक है। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब बच्चियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले शिक्षक ही उन पर गंदी नजर रखने और यौन शोषण के आरोपों के घेरे में हों। हाल ही में अलवर में एक शिक्षक पर बच्चियों को जोहड़ में तैराकी सिखाने के बहाने ले जाकर अश्लील हरकतें करने का आरोप लगा। वीडियो वायरल होने के बाद शिक्षक को निलंबित किया गया और उसकी गिरफ्तारी के आदेश दिए गए।

लेकिन निम्बाहेड़ा, चित्तौड़गढ़ के एक मामले में गंभीर आरोप, पोक्सो एक्ट में FIR और बच्चियों के बयान दर्ज होने के बाद भी आरोपी प्रिंसिपल के खिलाफ गिरफ्तारी अथवा विभागीय कार्रवाई नहीं होने के आरोप उठ रहे हैं। आरोप है कि पोक्सो कानून की छह धाराओं और एससी-एसटी कानून की एक धारा में मुकदमा दर्ज होने के बावजूद आरोपी प्रिंसिपल अब तक नौकरी कर रहा है।

20 जुलाई से शुरू हुआ मामला

जानकारी में आया है कि मामला राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कोटड़ी कला, निम्बाहेड़ा, चित्तौड़गढ़ का है। 20 जुलाई 2026 को विद्यालय की कक्षा 11वीं और 12वीं की करीब 15 छात्राओं ने स्कूल के प्रिंसिपल राधेश्याम ठरना पर यौन शोषण के आरोप लगाए।

इसके बाद 22 जुलाई को ग्रामीणों ने विद्यालय में तालाबंदी कर आरोपी शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। सूचना मिलने पर सीबीओ अरविंद मूंदड़ा और तहसीलदार घनश्याम झरवाल मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने उचित कार्रवाई का आश्वासन देकर विद्यालय का ताला खुलवाया।

इसके बाद निम्बाहेड़ा के एसडीएम विकास पंचोली ने स्थानीय प्रिंसिपलों और तहसीलदार की एक समिति गठित कर जांच शुरू कराई। आरोप है कि जांच बैठने के पांच दिन बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

बच्चियों ने अधिकारियों को भेजीं शिकायतें

कार्रवाई नहीं होने पर पीड़ित छात्राओं ने कलेक्टर मंजू चौधरी और पुलिस अधीक्षक धमेंद्र यादव को लिखित शिकायत दी। छात्राओं की ओर से शिक्षामंत्री मदन दिलावर को ई-मेल भी भेजा गया।

इसके साथ ही मानवाधिकार आयोग, महिला एवं बाल संरक्षण आयोग तथा सीएम संपर्क पोर्टल 181 पर भी शिकायत दर्ज कराई गई। आरोप है कि इन शिकायतों के बावजूद लंबे समय तक कोई प्रभावी जवाब या कार्रवाई सामने नहीं आई।

ये सबकुछ चल ही रहा था कि इसी दौरान प्रिंसिपल राधेश्याम ठरना के समर्थन में धाकड़ समाज के कुछ लोग उतर आए। आरोप है कि चूंकि पीड़ित छात्राओं में अधिकांश धाकड़ समाज से हैं, इसलिए उन पर शिकायतें वापस लेने का दबाव बनाया गया।

कलेक्टर की टीम ने लिए बयान

मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर मंजू चौधरी ने नवनियुक्त आईएएस अधिकारी मुद्रा रहेजा, एसडीएम अंशु लामोरिया और सीडीईओ प्रमोद दसोरा को विद्यालय भेजा। टीम ने पीड़ित छात्राओं के बयान लिए, लेकिन आरोप है कि इसके करीब 20 दिन बाद भी आरोपी प्रिंसिपल के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इसके बाद 7 अगस्त को महिला एवं बाल संरक्षण आयोग के आदेश पर FIR दर्ज की गई। निम्बाहेड़ा कोतवाली से डिप्टी शिवप्रकाश टेलर की टीम स्कूल पहुंची, जहां सैटेलाइट फोन के माध्यम से पीड़ित छात्राओं के धारा 161 के बयान दर्ज किए गए।

स्कूल के सूत्रों ने बताया कि इसके बाद 20 अगस्त को छात्राओं के धारा 164 के बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज कराए गए। आरोप है कि पोक्सो की छह धाराओं और एससी-एसटी कानून की एक धारा में मामला दर्ज होने के बावजूद आरोपी प्रिंसिपल की न तो गिरफ्तारी हुई और न ही उसे एपीओ अथवा निलंबित किया गया।

सवाल: आरोपी प्रिंसिपल को बचा कौन रहा है?

इस मामले में तहसीलदार, एसडीएम, कलेक्टर की टीम, आईएएस अधिकारी, पुलिस अधिकारी और न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष छात्राओं के बयान हो चुके हैं। FIR दर्ज है और पोक्सो व एससी-एसटी कानून के तहत प्रकरण दर्ज किया जा चुका है। इसके बावजूद आरोपी प्रिंसिपल राधेश्याम ठरना के खिलाफ गिरफ्तारी या विभागीय कार्रवाई नहीं होने पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

आरोप लगाने वालों का कहना है कि ऐसे संवेदनशील मामलों में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए आरोपी कर्मचारी को सामान्यतः तत्काल प्रभाव से एपीओ अथवा निलंबित किया जाता है। यहां आरोप है कि प्रिंसिपल न केवल पद पर बना हुआ है, बल्कि सामान्य रूप से नौकरी भी कर रहा है।

पीड़ित छात्राओं के परिवारों का कहना है कि गरीब परिवारों की बच्चियों ने आगे आकर अपनी पीड़ा बताई, बयान दर्ज कराए और न्याय की मांग की, फिर भी कार्रवाई का अभाव प्रशासनिक संवेदनशीलता तथा पुलिस की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़े करता है।

आरोप झूठे हैं: राधेश्याम ठरना

इधर, आरोपी शिक्षक राधेश्याम ठरना का कहना है कि स्कूल के ही कुछ शिक्षकों द्वारा बदनाम करने के लिए उनपर झूठे आरोप लगाए गए हैं, उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया है, इसीलिए तो उनपर कार्यवाही नहीं हो रही है। 

पुराने आरोपों का भी जिक्र

स्कूल की कुछ बच्चियों और शिक्षकों ने आरोप लगाया है कि प्रिंसिपल राधेश्याम ठरना के खिलाफ पहले भी इस तरह के विवाद और आरोप सामने आते रहे हैं। बताया गया कि वर्ष 1992 में, जब वह इसी स्कूल में कार्यरत था, तब कथित रूप से इसी प्रकार की हरकतों को लेकर ग्रामीणों ने उसके साथ मारपीट की थी। उस समय की छात्राओं द्वारा व्हाट्सऐप समूहों में लिखी गई जानकारी और चैट उपलब्ध होने का दावा किया गया है।

इसी प्रकार, वर्ष 2005 में जावदा स्कूल में भी छात्राओं से छेड़छाड़ के आरोपों के बाद ग्रामीणों द्वारा मारपीट किए जाने की बात सामने आई है। वहीं, वर्ष 2023-24 में बडोली, माधोसिंह के स्कूल में भी कथित रूप से इसी प्रकार की शिकायतों को लेकर हंगामा हुआ था। इस संबंध में ऑडियो रिकॉर्डिंग और चैट उपलब्ध होने का दावा किया गया है।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच होना आवश्यक है। लेकिन मौजूदा मामले में FIR, पोक्सो एवं एससी-एसटी कानून की धाराएं, तथा छात्राओं के 161 एवं 164 के बयान दर्ज होने के बाद भी गिरफ्तारी और विभागीय कार्रवाई नहीं होना गंभीर चिंता का विषय है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आरोपी प्रिंसिपल राधेश्याम ठरना के खिलाफ कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है और उसे संरक्षण किसका मिल रहा है?

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