टोंक/निवाई।
राजस्थान के टोंक जिले के निवाई कस्बे में प्रशासनिक तंत्र का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूचना के अधिकार (RTI) के जरिए पुलिस अधीक्षक कार्यालय से मिली जानकारी में स्पष्ट कहा गया है कि निवाई नगरपालिका क्षेत्र में कोई पुलिस चौकी मौजूद नहीं है। लेकिन इसी कस्बे में कृषि उपज मंडी समिति के परिसर में “पुलिस चौकी” का बोर्ड लगा एक कमरा खुला हुआ दिखाई दे रहा है।
यही वजह है कि स्थानीय लोग इस पूरे प्रकरण को अब “जादू से खुली पुलिस चौकी” कहकर सवाल उठा रहे हैं आखिर जब रिकॉर्ड में चौकी है ही नहीं, तो फिर मंडी परिसर में पुलिस चौकी का बोर्ड किसके आदेश से लगाया गया?
शिकायत के बावजूद 40 दिन तक सन्नाटा
इस मामले को लेकर किसान महापंचायत के युवा प्रदेशाध्यक्ष रामेश्वर प्रसाद चौधरी ने जनवरी महीने में ही जिला कलेक्टर और पुलिस विभाग के डीजीपी को लिखित शिकायत दी थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि बिना किसी आधिकारिक आदेश के पुलिस चौकी का बोर्ड लगाकर एक कमरा संचालित किया जा रहा है, जो प्रशासनिक नियमों के विपरीत है।
शिकायत मिलने के बाद जिला कलेक्टर कार्यालय ने तीन दिन के भीतर जांच पूरी करने के आदेश जारी किए थे। लेकिन यह आदेश भी कागजों तक ही सीमित रह गए। करीब 40 दिन बीत जाने के बाद भी न जांच पूरी हुई और न ही किसी जिम्मेदार कार्मिक के खिलाफ कार्रवाई की गई।
क्या कलेक्टर के आदेश ही दबा दिए गए?
सूत्रों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में एक और चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। बताया जा रहा है कि जांच के आदेश जारी होने के बाद कलेक्टर कार्यालय के एक बाबू ने ही उन आदेशों को दबा दिया, जिसके कारण निवाई प्रशासन समय पर जांच नहीं करा पाया। यदि यह आरोप सही है, तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया से खिलवाड़ माना जाएगा।
जांच कमेटी बनी, लेकिन रिपोर्ट गायब
मामले की गंभीरता को देखते हुए उपखंड अधिकारी निवाई ने जांच के लिए एक कमेटी भी गठित की थी। इस कमेटी को 26 फरवरी तक अपनी रिपोर्ट उपखंड अधिकारी को सौंपनी थी, लेकिन तय समय बीत जाने के बाद भी जांच अधिकारी ने रिपोर्ट तैयार नहीं की। करीब 15 दिन बाद भी रिपोर्ट लंबित रहना प्रशासनिक उदासीनता को साफ उजागर करता है।
पुलिस मुख्यालय तक मामला, फिर भी FIR नहीं
यह मामला अब पुलिस मुख्यालय जयपुर तक पहुंच चुका है, लेकिन इसके बावजूद टोंक पुलिस ने अब तक इस कथित फर्जी पुलिस चौकी को लेकर कोई एफआईआर दर्ज नहीं की है।
यही वह सवाल है जो अब आम लोगों के बीच तेजी से उठ रहा है
क्या टोंक पुलिस इस मामले में किसी को बचाने की कोशिश कर रही है? अगर RTI में चौकी का अस्तित्व ही नहीं है, तो फिर मंडी परिसर में पुलिस चौकी का बोर्ड किसके आदेश से लगाया गया? और यदि यह सब फर्जी है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जनता पूछ रही है आखिर सच क्या है?
निवाई में यह पूरा मामला अब केवल एक कमरे या एक बोर्ड का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता की परीक्षा बन गया है। लोगों के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सच में पुलिस चौकी है, या फिर केवल नाम का बोर्ड लगाकर एक “कागजी चौकी” बनाई गई है? यदि रिकॉर्ड में चौकी नहीं है और जमीन पर बोर्ड लगा है, तो फिर यह मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं बल्कि प्रशासनिक धोखे और जिम्मेदारी से बचने की कोशिश का भी हो सकता है।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जिला प्रशासन और पुलिस विभाग इस रहस्यमय “जादू से खुली पुलिस चौकी” के पीछे की सच्चाई कब सामने लाते हैं और जिम्मेदार लोगों पर कब कार्रवाई होती है।

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