Popular

वेदांता vs अडानी: जेपी ग्रुप की असली कहानी, जीतकर कर भी कैसे हारे अनिल अग्रवाल?


हम आज एक ऐसी कहानी पर बात करते हैं जो भारत के सबसे बड़े कॉर्पोरेट विवाद में से एक बन चुकी है। एक तरफ हैं वेदांता के संस्थापक अनिल अग्रवाल, जो दावा कर रहे हैं कि हमने ज़्यादा बोली लगाई, जीत भी गये, लिखित में बताया भी गया और फिर भी सौदा हमसे छीन लिया गया। दूसरी तरफ है अडानी ग्रुप, जिसने कम बोली लगाई, लेकिन फिर भी सौदा उसी को मिला। और इनके बीच में है हजारों करोड़ का जेपी ग्रुप, वो साम्राज्य जिसे जयप्रकाश गौर ने दशकों की मेहनत से खड़ा किया और जो आज 57,000 करोड़ के कर्ज़ तले दबा हुआ है।

विवाद पर आगे बढ़ने से पहले जेपी ग्रुप को समझते हैं। जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड, यानी JAL के पास रीयल स्टेट, सीमेंट निर्माण, हॉस्पीटिलिटी, पॉवर और इंजिनियरिंग जैसे पाँच बड़े क्षेत्रों में कारोबार है। ग्रेटर नोयडा में जेपी ग्रीन्स, नोयडा में जेपी ग्रीन्स विशनाउन, जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास जेपी इंनटरनेशनल स्पोर्ट्स सिटी, दिल्ली एनसीआर में 5 बड़े होटल, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में चार सीमेंट प्लांट, यह सब जेपी ग्रुप के के पास था। लेकिन इन सबको बनाना इतना आसान नहीं होता है, इसके लिए जेपी ग्रुप ने कई वित्तिय संस्थाओं से मोटा लोन ले रखा था, जिसके कारण जून 2024 में 57,000 करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज़ पर default किया और इंसोल्वेंसी प्रोसेज शुरू हो गई। 

जब कोई कंपनी अपना कर्ज़ नहीं चुका पाती और दिवालिया होने की कगार पर आ जाती है, तो उसे बेचने की जो कानूनी प्रक्रिया होती है, उसे Insolvency Process कहते हैं। भारत में यह प्रक्रिया IBC, यानी Insolvency and बैंकक्रेप्सी Code 2016 के तहत होती है। इसके 9 स्टेप्स होते हैं। जब कोई कंपनी 1 करोड़ रुपये या उससे अधिक का कर्ज़ नहीं चुका पाती तो कर्ज़दाता बैंक या कंपनी खुद ही NCLT, यानी National Company Law Tribunal में application दाखिल करती है। NCLT यह तय करता है कि कंपनी सच में दिवालिया है या नहीं। NCLT application accept करते ही Moratorium लग जाता है। मतलब, कंपनी के खिलाफ कोई भी कानूनी कार्रवाई रुक जाती है। न कोई asset बेच सकता है, न कोई नया कर्ज़ ले सकता है। यह protection period होता है। NCLT एक Insolvency Resolution Professional, यानी IRP नियुक्त करता है। वो कंपनी का पूरा control अपने हाथ में लेता है। पुराना management हट जाता है। IRP कंपनी की assets, liabilities और financial health की पूरी जाँच करता है। सारे कर्ज़दाता बैंक और वित्तीय संस्थाएं मिलकर Committee of Creditors, यानी CoC बनाते हैं। CoC ही सबसे बड़ा decision maker होता है। हर फैसले पर voting होती है, जिसमें किसी भी प्लान को पास करने के लिए 66 प्रतिशत से ज़्यादा वोट चाहिए होते हैं। 

यही CoC बाहर से bidders, खरीददार बुलाती है, जो भी कंपनी खरीदना चाहे वो अपना Resolution Plan submit करता है। इस plan में यह बताना होता है कि कितना पैसा देंगे, कितना upfront देंगे, बाकी कब देंगे, कर्मचारियों का क्या होगा, कंपनी को कैसे चलाएंगे। उपफ्रंट का मतलब अग्रिम देना होता है। CoC सभी plans को देखती है। सिर्फ highest बोली नहीं, बल्कि अग्रिम payment, फिलिबलीटी, track record और देनदारों को कितनी जल्दी पैसा मिलेगा, यह सब देखा जाता है। यहां भी 66 प्रतिशत वोट से plan approve होता है। CoC जो plan approve करती है वो NCLT के पास जाता है। NCLT देखता है कि plan कानूनी है या नहीं। अगर सब ठीक हो तो NCLT वित्तीय अनुमति देता है। विजेता बोलीदाता कंपनी का control लेता है, पैसा चुकाता है, और नई कंपनी शुरू होती है। अगर 180 दिन से 270 दिन में कोई Resolution Plan नहीं आता है, यानी कोई बोलीदाता बोली नहीं लगाता है तो कंपनी Liquidation में चली जाती है। मतलब, कंपनी की सारी assets बेचकर कर्जदारों का लोन चुकाया जाता है। IBC process में CoC का commercial wisdom सर्वोच्च होता है। Court सिर्फ तब दखल देती है, जब कोई कानूनी गड़बड़ी हो। इसीलिए Vedanta के लिए सुप्रीम कोर्ट में जीतना आसान नहीं होगा। 

जेपी ग्रुप के मामले में अब असली कहानी शुरू होती है। जेपी की insolvency process में Vedanta, Adani Enterprises, Dalmia Cement और Jindal Power जैसी बड़ी कंपनियाँ bidder के रूप में उतरीं। एक-एक करके सब बाहर हो गए और अंत में वेदांता और अडानी ही बचे। अनिल अग्रवाल ने 29 मार्च 2026 को X पर पोस्ट करके पूरी कहानी बताई। उन्होंने लिखा कि "हम highest bidder, यानी बोली लगाने वाले घोषित हुए थे। यह बिलकुल transparent process था। एनसीएलटी द्वारा हमें लिखित में बताया गया कि हम जीत गए, लेकिन जिंदगी इतनी सरल नहीं होती, उसी एनसीएलटी द्वारा कुछ दिनों बाद फैसला बदल दिया गया।"

यहां यह देखना बहुत जरूरी है कि आँकड़े क्या कहते हैं? वेदांता की कुल बोली 16,726 करोड़ रुपये थी। अडानी की बोली 14,535 करोड़ रुपये थी, यानी वेदांता ने करीब 2,200 करोड़ रुपये ज़्यादा बोली लगाई। सोचो फिर भी सौदा अडानी को क्यों मिला? यहाँ वो बात आती है जो इस पूरे मामले की असल जड़ है। अडानी ने upfront यानी तुरंत 6,000 करोड़ रुपये देने का वादा किया। वेदांता ने upfront सिर्फ 2,000 करोड़ का वादा किया, बाकी रकम 5 साल में देनी थी। यानी कर्ज़दाताओं के सामने सवाल था कि 16,726 करोड़ जो 5 साल में मिलेंगे, या 14,535 करोड़ जो 2 साल में मिलेंगे? Creditors ने faster recovery को priority दी और Adani के plan को 93.8 प्रतिशत वोटों के साथ मंजूरी मिल गई। लेकिन अनिल अग्रवाल का दावा इससे अलग कहानी कहता है। वेदांता का कहना है कि उसने बाद में revised offer दिया, जिसमें upfront cash बढ़ाकर 6,563 करोड़ कर दिया और 800 करोड़ का equity infusion भी जोड़ा, लेकिन lenders ने यह revised bid reject कर दी और कहा कि ये बातें deadline के बाद आई इसलिए मान्य नहीं। वेदांता का आरोप है कि उसे bid reject करने का कारण नहीं बताया गया, न ही अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया।

यहाँ वेदांता के खिलाफ एक और बड़ी बात है। 2018 में वेदांता GMR छत्तीसगढ़ Energy की highest bidder बनी, लेकिन बाद में deal से हट गई। उसी साल इंड-बर्थ Energy deal से भी बाहर हो गई, जिससे कानूनी विवाद हुए। मीनाक्षी Energy deal में भी वेदांता को 2023 तक हाथ खींचना पड़ा। यानी वेदांता का track record है highest bid लगाओ, deal मिलने के बाद पीछे हट जाओ, यह pattern creditors को भरोसा नहीं देता है। तो भला जेपी ग्रुप के कर्ज़दाता बैंक वेदांता पर भरोसा क्यों करते? बोली लगने के बाद 17 मार्च 2026 को NCLT की Allahabad bench ने Adani का 14,535 करोड़ का plan approve किया। जिसके बाद वेदांता ने एनसीएलटी में अपील की, लेकिन 24 मार्च को NCLT ने वेदांता की stay की अर्जी ठुकरा दी और कहा कि plan का implementation जारी रहेगा। इसकी अगली सुनवाई 9 अप्रैल को है और 30 मार्च 2026 को वेदांता सुप्रीम कोर्ट चली गई। यानी जेपी ग्रुप को खरीदने की यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई।

तो आख़िर में सवाल यह है कि क्या वेदांता के साथ नाइंसाफी हुई? या यह सिस्टम की सही कार्यप्रणाली है? इसके दोनों तरफ तर्क हैं। अनिल अग्रवाल कह रहे हैं कि लिखित में जीत बताई गई, फिर फैसला बदला, यह धर्म के विरुद्ध है। और creditors कह रहे हैं कि highest bid नहीं, सबसे भरोसेमंद bid जीतती है। अनिल अग्रवाल की पोस्ट पर एक विश्लेषक ने कमेंट करते हुए लिखा कि "धर्म business में यह भी है कि अपनी commitments पूरी करो। वेदांता का पिछला track record यही कहता है।" कोर्ट क्या और कब अपना निर्णय सुनाएगी, यह कोई निश्चित नहीं है, लेकिन इस लड़ाई से जेपी ग्रुप के हज़ारों homebuyers, जो सालों से अपने घरों का इंतज़ार कर रहे हैं, उनके लिए यह कानूनी लड़ाई एक और देरी है। उनका 'अपने घर' का सपना अभी भी court की फाइल में दबा है। इस बेहद हाई प्रोफाइल डील पर कोर्ट को फैसला लेना है, लेकिन Insolvency and Bankruptcy Code 2016 की भी बड़ी परीक्षा है। सवाल खड़े हो रहे हैं कि इसमें जल्द बड़ा परिवर्तन करना जरूरी है, अन्यथा इस विवाद से आम लोगों के साथ ही कारोबारी घरानों को भी सरकार की नीयत पर से भरोसा उठ रहा है।

Post a Comment

Previous Post Next Post