28 फरवरी 2026 को जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर Operation Epic Fury के तहत ईरान पर लगभग 900 हवाई हमले किए, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सहित शीर्ष नेतृत्व मारा गया, तब वाशिंगटन ने दावा किया था कि ईरान अब घुटनों पर आ जाएगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो यहां तक कह दिया था कि "बिना शर्त आत्मसमर्पण के अलावा कोई समझौता नहीं होगा।"
लेकिन आज, जब इस भीषण युद्ध को चलते हुए लगभग 89 दिन का समय बीत चुका है, और पाकिस्तान व कतर की मध्यस्थता से एक नाजुक Ceasefire लागू है, तब दुनिया यह देख रही है कि अमेरिका जैसी सैन्य महाशक्ति के सामने भी ईरान पूरी तरह झुका नहीं है। 24-25 मई 2026 की ताजा रिपोर्टों के अनुसार दोनों देश युद्ध को समाप्त करने के लिए एक Memorandum of Understanding के करीब पहुंच रहे हैं, लेकिन ईरान ने अपनी संप्रभुता और शर्तों से कोई बड़ा समझौता नहीं किया है।
इस पूरे टकराव के दौरान वार्ताओं के जटिल दौर चले हैं। अप्रैल 2025 में ट्रंप की चिट्ठी के बाद शुरू हुए सिलसिले से लेकर अब तक कुल चार बड़े दौर की आधिकारिक और अनौपचारिक वार्ताएं हो चुकी हैं। पहला दौर अप्रैल से जून 2025 तक चला। दूसरा दौर फरवरी 2026 में ओमान की मध्यस्थता में हुआ जो विफल रहा। तीसरा दौर मार्च-अप्रैल 2026 के युद्ध के बीच हुआ, और चौथा दौर अप्रैल के मध्य में इस्लामाबाद में आयोजित किया गया। वर्तमान में मई के अंतिम सप्ताह में एक बार फिर युद्धविराम को 60 दिनों के लिए बढ़ाने और Strait of Hormuz को खोलने के लिए पर्दे के पीछे सघन बातचीत जारी है।
लगातार वार्ताओं के बाद भी स्थायी शांति न बनने का मुख्य कारण दोनों देशों की परस्पर विरोधी और बेहद सख्त शर्तें हैं। अमेरिका का 15 सूत्रीय एजेंडा है, जिसमें उसकी मुख्य मांग है कि ईरान अपने Nuclear Enrichment को पूरी तरह Zero Enrichment पर लाए, अपने Highly Enriched Uranium के भंडार को देश से बाहर भेजे, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह सीमित करे, और पश्चिम एशिया में अपने सशस्त्र प्रॉक्सी समूहों, जैसे हिजबुल्लाह और हूती को फंडिंग देना बंद करे। इसके विपरीत, ईरान का अपना 10 सूत्रीय प्लान है।
ईरान का साफ कहना है कि वह शांति के लिए तैयार है, लेकिन अपने शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम और संवर्धन के अधिकार को नहीं छोड़ेगा। ईरान की मुख्य शर्तें हैं, लेबनान सहित सभी मोर्चों पर युद्ध की पूर्ण समाप्ति, अमेरिका द्वारा लगाए गए Naval Blockade को पूरी तरह हटाना, विदेशों में फ्रीज पड़ी उसकी अरबों डॉलर की संपत्तियों को बहाल करना, और संप्रभुता का सम्मान। दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी है कि एक तरफ बातचीत चलती है और दूसरी तरफ छिटपुट हवाई हमले और प्रतिबंध जारी रहते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या ईरान को उतना नियंत्रित कर लिया गया है, जितना अमेरिका चाहता था? इसका उत्तर 'हां' और 'ना' के बीच झूलता है। अमेरिका रणनीतिक रूप से ईरान के नेतृत्व तंत्र को तोड़ने और उसके बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने में तो सफल रहा है, लेकिन वह ईरान की Regime Change या उसकी रीढ़ को पूरी तरह तोड़ने में पूरी तरह नाकाम रहा है।
यह सच है कि ईरान आर्थिक रूप से बेहद कमजोर हुआ है, देश के भीतर विरोध प्रदर्शनों और पश्चिमी प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया है, और उसके क्षेत्रीय सहयोगी भी कमजोर हुए हैं। ईरान शायद सैन्य रूप से निकट भविष्य में उतना आक्रामक न हो पाए जितना वह पहले था, लेकिन उसे पूरी तरह अप्रासंगिक मान लेना बहुत बड़ी भूल होगी।
अमेरिका जैसी महाशक्ति के भारी सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों और शीर्ष नेतृत्व की हत्या के बावजूद ईरान आज भी सीना ताने खड़ा है। इसके पीछे ईरान की विशिष्ट राजनीतिक, भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां हैं। भौगोलिक रूप से ईरान एक प्राकृतिक किला है। Zagros और अल्बोर्ज़ पर्वत श्रृंखलाएं इसे किसी भी विदेशी जमीनी आक्रमण से सुरक्षा प्रदान करती हैं।
सबसे बड़ा आर्थिक और रणनीतिक हथियार है Strait of Hormuz। ईरान ने युद्ध के दौरान इसे बंद करके दुनिया की तेल सप्लाई को ठप कर दिया, जिससे वैश्विक बाजार में हाहाकार मच गया। अमेरिका जानता है कि हॉर्मुज को पूरी तरह खोले बिना वह ईरान को 'स्टोन एज' में भेजने का दावा तो कर सकता है, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी से नहीं बचा सकता। ईरान की राजनीतिक व्यवस्था केवल एक व्यक्ति पर टिकी नहीं है।
खामेनेई की मौत के बाद भी वहां का IRGC और संस्थागत ढांचा बरकरार रहा। शिया विचारधारा और Doctrine of Resistance ने वहां के शासक वर्ग को पश्चिमी दबाव के खिलाफ एकजुट रखा है। दशकों के प्रतिबंधों ने ईरान को Resistance Economy का आदी बना दिया है। इसके अलावा, वैश्विक राजनीति में चीन और रूस जैसी शक्तियों का परोक्ष समर्थन ईरान को मिलता रहा है।
चीन को कच्चे तेल की गुप्त सप्लाई और रूस-यूक्रेन संकट के बीच तेहरान-मॉस्को के रणनीतिक गठजोड़ ने ईरान को पूरी तरह अलग-थलग होने से बचा लिया। जब किसी देश पर बाहरी महाशक्ति हमला करती है, तो आंतरिक मतभेदों के बावजूद वहां की जनता में 'राष्ट्रवाद' की भावना उग्र हो जाती है। ईरान के लोग सरकार से भले ही नाराज हों, लेकिन अमेरिकी और इजरायली हमलों ने देश के भीतर एक अभूतपूर्व पश्चिम-विरोधी एकजुटता को जन्म दिया है, जिसे राष्ट्रवाद की भाषा में 'मजबूरी की संप्रभुता' कहा जा सकता है।
2026 का यह युद्ध यह साबित करता है कि आधुनिक दुनिया में केवल मिसाइलों और बमों के दम पर किसी स्वाभिमानी राष्ट्र को पूरी तरह मिटाया या झुकाया नहीं जा सकता। अमेरिका ने भले ही सैन्य वर्चस्व दिखाया हो, लेकिन ईरान ने अपनी भौगोलिक स्थिति और Strategic Patience के बल पर वाशिंगटन को मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया है। यह युद्ध महाशक्ति के अहंकार और एक क्षेत्रीय ताकत के अस्तित्व की लड़ाई का वो अध्याय है, जिसका अंत बिना किसी पूर्ण विजेता के, केवल एक थका देने वाले समझौते के रूप में ही संभव दिख रहा है।
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