जब सरकार किसानों के खाते में पीएम किसान सम्मान निधि का साल के ₹6,000 भेजती है, तो इसका विज्ञापन हर अखबार, टीवी चैनल और होर्डिंग पर दिखाई देता है। लेकिन जब बैंकों का लाखों-करोड़ों रुपया 'बट्टे खाते' यानी 'राइट-ऑफ' में डाला जाता है, तो इसकी चर्चा सिर्फ संसद के किसी लिखित जवाब में दबकर रह जाती है। हाल ही में लोकसभा में खुलासा हुआ कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने मोदी सरकार के कार्यकाल में बड़े उद्योगों के लगभग 7.75 लाख करोड़ रुपये के कर्ज 'राइट-ऑफ' किए। लेकिन क्या यह सचमुच 'कर्ज माफी' है? 'राइट-ऑफ' और 'वेव-ऑफ' में कोई बड़ा अंतर है? UPA सरकार और NDA सरकार के कार्यकाल में कॉर्पोरेट घरानों के लिए कितना कर्ज राइट-ऑफ हुआ और किसानों के लिए कितना कर्ज माफ किया गया? सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश की 45-50% से अधिक आबादी खेती पर निर्भर है और कॉरपोरेट सेक्टर बहुत कम प्रतिशत लोगों को सीधी नौकरियां देता है, तो फिर भी बैंकिंग सेक्टर का झुकाव कॉर्पोरट्स की तरफ अधिक क्यों होता है?
सबसे पहले यह समझना बहुत ज़रूरी है कि 'वेव-ऑफ' और 'राइट-ऑफ' में क्या अंतर है। जब सरकार किसी का कर्ज पूरी तरह 'माफ' करती है, तो बैंक उस व्यक्ति या संस्था से भविष्य में कभी वसूली नहीं कर सकता। उस कर्ज की भरपाई सीधे सरकार अपने खजाने (टैक्सपेयर्स के पैसे) से बैंक को करती है। जब कोई कर्ज लंबे समय तक वापस नहीं आता और उसे 'NPA' मान लिया जाता है, तो बैंक अपने खाते को साफ रखने के लिए उसे तकनीकी रूप से 'राइट-ऑफ' कर देता है। कॉर्पोरेट सेक्टर में जब कोई बैंक या वित्तीय संस्थान किसी कंपनी के बड़े कर्ज को वेव-ऑफ, यानी माफ करता है, तो यह निर्णय बोर्ड की मंजूरी, दिवालियापन प्रक्रिया या वन-टाइम सेटलमेंट समझौते के तहत लिया जाता है, जिससे कंपनी की बैलेंस शीट से वह देनदारी हट जाती है और बैंक का डूबा हुआ पैसा एनपीए मानकर हमेशा के लिए नुकसान के रूप में दर्ज हो जाता है। इससे बैंकों की लाभप्रदता घटती है, उनका Capital Base कमजोर होता है और नए ऋण देने की क्षमता सीमित हो जाती है। अर्थव्यवस्था पर इसका सीधा प्रभाव यह पड़ता है और बैंकों का यह नुकसान आखिरकार फाइनेनसियल सिस्टम की साख को प्रभावित करता है, जिससे सरकारी राजकोष पर दबाव बढ़ाता है और ईमानदार टैक्सपेयर व छोटे ऋण लेने वालों के लिए ब्याज दरें बढ़ने या कर्ज मिलने में कठिनाई का जोखिम पैदा करता है।
इसका मतलब यह नहीं कि कर्ज माफ हो गया है। बैंक वसूली की प्रक्रिया NCLT और रिकवरी ट्रिब्यूनल में जारी रखती है। लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2014 से अब तक जो 7.75 लाख करोड़ रुपये राइट-ऑफ किए गए, उसमें से बैंकों ने अब तक लगभग 3.10 लाख करोड़ रुपये की वसूली कर ली है, जबकि शेष राशि की वसूली जारी है। इसका मतलब यूपीए के 10 साल में एनडीए के 12 साल की तुलना में करीब 4.50 लाख करोड़ रुपये का कॉर्पोरेट कर्ज कम माफ किया गया, जबकि किसानों को दी जाने वाली राहत एनडीए सरकार ने करीब 2.30 लाख करोड़ अधिक की है। दरअसल, राइट-ऑफ एक Accounting प्रोसेज है, जिसके तहत बैंक या कॉर्पोरेट कंपनियां अपनी बैलेंस शीट में सालों से फंसे ऐसे कर्ज को, जिसकी वसूली की संभावना लगभग खत्म हो चुकी होती है, Asset Reduction के रूप में दर्ज करके अपनी किताबों से हटा देती हैं। यह प्रक्रिया बैंकिंग मानकों को बनाए रखने और Tax लाभ प्राप्त करने के लिए की जाती है, ताकि बैलेंस शीट में वित्तीय स्थिति की वास्तविक और साफ तस्वीर दिखे। हालांकि, वेव-ऑफ के विपरीत, राइट-ऑफ का मतलब कर्ज माफी नहीं होता है, बैंक कानूनी तौर पर, रिकवरी ट्रिब्यूनल या सरफेसी एक्ट के माध्यम से डिफाल्टर से संपत्ति जब्त कर डूबी हुई रकम की वसूली का प्रयास जारी रखते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इतनी बड़ी राशि को राइट-ऑफ करने से बैंकों की पूंजी कम नहीं होती? इससे बैंकों की पूंजी कम होती है तो उसकी भरपाई सरकार करती है। जब सरकार बैंकों को भरपाई करती है तो उसके लिए जनता से मिलने वाले टैक्स का इस्तेमाल किया जाता है। यानी सीधे तौर पर देखा जाए तो किसी कंपनी का कर्जमाफ करने का भार आम जनता पर ही डाला जाता है। इसके अलावा बैंक भी अपने ब्याज की दरों में वृद्धि करके वसूली करते हैं।
एनडीए सरकार ने 2014 से 2026 तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा कुल कॉरपोरेट व बड़े बट्टे खाते लगभग 7.75 लाख करोड़ रुपये हैं, जिसमें 100 करोड़ या उससे अधिक के 1,249 बड़े उधारकर्ता शामिल हैं। इसमें से करीब वसूली 3.10 लाख करोड़ रुपये हुई है। जबकि मोदी सरकार ने 'पीएम-किसान सम्मान निधि' के तहत अब तक किसानों को लगभग 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक सीधे उनके खातों में ट्रांसफर किए हैं। हालांकि, केंद्र स्तर पर कोई देशव्यापी 'किसान कर्ज माफी' योजना घोषित नहीं की गई, लेकिन विभिन्न राज्यों ने राज्य स्तर पर कृषि कर्ज माफ किए। मनमोहन सिंह सरकार के समय 2008 में 'कृषि ऋण माफी और ऋण राहत योजना' लाई गई थी, जिसके तहत केंद्र सरकार ने लगभग 60,000 से 72,000 करोड़ रुपये का किसान कर्ज पूरी तरह माफ किया था। जबकि UPA के 10 वर्षों के कार्यकाल में बैंकों द्वारा लगभग 2.2 लाख करोड़ से 2.5 लाख करोड़ रुपये के का कर्ज राइट-ऑफ किया गया था। अब आते हैं सबसे अहम मुद्दे पर, जो है किसानी और कॉरपोरेट का देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार में क्या योगदान है?
किसानों की कर्जमाफी के तहत राज्य या केंद्र सरकार एक विशेष नीति और बजट आवंटन की घोषणा करती है, जिसके अंतर्गत निर्धारित किसानों की पात्रता की पहचान कर बैंक से ली गई उनकी ऋण राशि का भुगतान सीधा सरकार अपनी तरफ से बैंकों को करती है और किसानों का लोन खाता चुकता कर दिया जाता है। इस प्रोसेस से किसानों को इंस्टंट राहत तो मिलती है, लेकिन राजकोषीय घाटे पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है, जिससे विकास कार्यों और बुनियादी ढाँचे के बजट में कटौती का जोखिम बन जाता है। इसकी पूर्ति के लिए भी सरकार टैक्स का सहारा लेती है। दूसरी ओर बैंकों को उनका डूबा हुआ पैसा तो मिल जाता है, लेकिन इससे ग्रामीण क्षेत्रों में 'ऋण अनुशासन' यानी Credit Discipline खराब होता है, जिससे लोग भविष्य में कर्जमाफी की उम्मीद में समय पर लोन चुकाना बंद कर देते हैं और इसलिए बैंक नया कृषि ऋण देने में आनाकानी करने लगते हैं।
भारत की टोटल वर्कुफॉर्स का करीब 45—46% हिस्सा सीधे तौर पर खेती और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है। देश में लगभग 14 से 15 करोड़ किसान परिवार हैं। देश की जीडीपी में कृषि का योगदान लगभग 15—18% है। संगठित कॉरपोरेट क्षेत्र देश के कुल रोजगार का केवल 8—10% ही डायरेक्ट रोजगार देता है। लेकिन देश की जीडीपी में और सरकार को मिलने वाले Corporate Tax और GST में कॉरपोरेट सेक्टर का बहुत बड़ा योगदान होता है। कॉरपोरेट्स बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग में निवेश करते हैं, जिससे Indirect जॉब्स बनते हैं। फिर ऐसा क्यों होता है कि ₹6,000 का प्रचार तो घर-घर पहुँचता है, लेकिन लाखों करोड़ के राइट-ऑफ पर राजनीतिक दलों में सन्नाटा बना रहता है? भारत में किसानों की संख्या करोड़ों में है। हर किसान एक वोटर है। ₹6,000 की राशि सीधे मतदाता के बैंक खाते में जाती है, जिससे तुरंत एक राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव बनता है।सरकार और बैंकों का तर्क होता है कि RBI के Section 45E के तहत डिफॉल्टर कंपनियों या उधारकर्ताओं के नाम सार्वजनिक नहीं किए जा सकते। यही कारण है कि कॉरपोरेट राइट-ऑफ की प्रक्रिया बहुत ही शांत और तकनीकी तरीके से होती है। कॉरपोरेट को लोन इसलिए दिया जाता है, ताकि देश में इंडस्ट्रियल ग्रोथ हो, लेकिन जब कोई बड़ी कंपनी डूबती है, तो इसका खामियाजा अंततः बैंकिंग सिस्टम और अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ता है। तो निष्कर्ष यह है कि कॉरपोरेट कर्ज को बट्टे खाते में डालना बैंकिंग की एक तकनीकी मजबूरी हो सकती है, और इसमें से कुछ पैसा वापस भी आ जाता है, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इसका अंतिम बोझ बैंक और देश की अर्थव्यवस्था ही उठाती है। दूसरी तरफ, जो किसान देश की आधी आबादी को रोजगार देता है और अनाज उगाता है, उसे अगर साल में ₹6,000 दिए जाते हैं, तो उसे 'रेवड़ी' या 'बड़ा एहसान' बताकर पेश करना आर्थिक न्याय के ढांचे पर सवाल खड़े करता है। आपकी इस बारे में क्या राय है? क्या बैंकों के बड़े कर्जदारों के नाम सार्वजनिक किए जाने चाहिए? कमेंट सेक्शन में अपनी राय ज़रूर बताएं।

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