हनुमान बेनीवाल अगला लोकसभा चुनाव नागौर से लड़ ही नहीं पाएंगे, यह दावा अभी सिर्फ एक अटकल है, लेकिन इतनी गंभीर अटकल है कि पूरे मारवाड़ की सियासत हिली हुई है, जिस नागौर सीट ने बेनीवाल को देशभर में किसान नेता की पहचान दी, चर्चा है कि वही सीट 2029 तक उनसे छिन सकती है, और अगर ऐसा हुआ तो सवाल सिर्फ बेनीवाल का नहीं, पूरे राजस्थान की राजनीति का है, क्योंकि 2026 के बाद होने वाले परिसीमन में अगर लोकसभा सीटों का नक्शा बदला, तो नागौर के अलावा बीकानेर, दौसा, बाड़मेर, जोधपुर, कोटा, अलवर जैसे बड़े संसदीय क्षेत्रों का पूरा गणित बदल सकता है, तो चलिए समझते हैं यह पूरा मामला है क्या, और क्यों नागौर इस पूरी बहस का केंद्र बन गया है।
सबसे पहले समझिए यह सीटें बढ़ने की बात आई कहां से, साल 2001 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी, तब संविधान के 84वें संशोधन के जरिए लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 2026 तक के लिए फ्रीज कर दी गई थी, और इसका आधार बनाया गया था 1971 की जनगणना को, उस समय राजस्थान की आबादी करीब 2 करोड़ 57 लाख थी, जिसके लिए 25 सीटें तय हुई थीं, आज राजस्थान की आबादी 8 करोड़ पार कर चुकी है, यानी आबादी तीन गुना से ज्यादा बढ़ी, लेकिन सीटें वहीं रहीं, अब 2026 में यह फ्रीज खत्म हो रहा है, इसी साल संसद में तीन बिल भी आ चुके हैं, संविधान का 131वां संशोधन, परिसीमन बिल 2026, और केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन बिल, इनके जरिए तय हुआ कि अगला परिसीमन 2011 की जनगणना पर आधारित होगा, और देश की लोकसभा सीटें 543 से बढ़कर करीब 850 तक जा सकती हैं।
अब राजस्थान को कितनी सीटें मिलेंगी, इस पर दो अलग-अलग अनुमान सामने हैं, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद यानी EAC-PM की एक स्टडी रिपोर्ट, जो पहले ही सामने आ चुकी है, वो 38 सीटों की सिफारिश करती है, यानी 13 नई सीटें, और इसके लिए 7 मौजूदा सीटों के पुनर्गठन की बात करती है, इनमें से तीन नाम सार्वजनिक हो चुके हैं, जोधपुर, बांसवाड़ा-डूंगरपुर, और सीकर, इसके अलावा सियासी गलियारों में एक और अनुमान चल रहा है, जो 37 सीटों की बात करता है और जयपुर, जयपुर ग्रामीण, जोधपुर, सीकर, उदयपुर, बांसवाड़ा और चूरू के पुनर्गठन का जिक्र करता है, लेकिन ध्यान रहे, यह दूसरा अनुमान अभी तक किसी सार्वजनिक और सत्यापित दस्तावेज से पुष्ट नहीं है, यह फिलहाल कयास के स्तर पर है, तो जो भी अंतिम आंकड़ा हो, 37 या 38, इतना तय है कि सीटें बढ़ेंगी और मौजूदा भूगोल बदलेगा, आज जो लोकसभा क्षेत्र 8 विधानसभाओं से मिलकर बनता है, वो घटकर 5 या 6 का रह जाएगा, यानी राजनीति मैक्रो से माइक्रो की तरफ खिसकेगी, बड़े राष्ट्रीय मुद्दों की जगह स्थानीय जातिगत समीकरण चुनाव तय करेंगे।
अब आते हैं सबसे संवेदनशील हिस्से पर, आरक्षण का गणित, परिसीमन आयोग का नियम है कि कोई भी सीट हमेशा आरक्षित या हमेशा सामान्य नहीं रह सकती, रोटेशन के आधार पर यह बदलता रहता है, अभी राजस्थान में कुल 7 सीटें आरक्षित हैं, 4 SC के लिए, बीकानेर, श्रीगंगानगर, भरतपुर और करौली-धौलपुर, और 3 ST के लिए, उदयपुर, बांसवाड़ा-डूंगरपुर और दौसा, आधिकारिक स्तर पर अभी सिर्फ इतना कन्फर्म है कि किसी SC सीट को बांटने की सिफारिश नहीं है, हां दो ST सीटों के पुनर्गठन की बात जरूर है, बाकी जो यह सुना जा रहा है कि सीटें बढ़कर 12 आरक्षित हो जाएंगी, और नागौर सहित सात नई सीटें SC बनेंगी, यह अभी सिर्फ सियासी गलियारों की चर्चा है, कोई पुष्ट दस्तावेज इसकी तस्दीक नहीं करता, इसलिए इसे तथ्य नहीं, संभावना मानकर ही आगे बढ़ते हैं।
अब समझिए नागौर इतना संवेदनशील क्यों है, नागौर जिला राजस्थान की राजनीति का दिल माना जाता है, देश में पंचायती राज की शुरुआत यहीं से हुई थी, यह जाट राजनीति का पारंपरिक गढ़ है, लेकिन जाट मतदाताओं के बाद यहां मेघवाल, बावरी और वाल्मीकि समाज यानी अनुसूचित जाति की भी बड़ी आबादी है, साथ ही मुस्लिम वोटर भी निर्णायक हैं, चूंकि नागौर लंबे समय से सामान्य सीट रही है, इसलिए रोटेशन नीति के तहत यह अटकल तेज है कि इसे SC आरक्षित बनाया जा सकता है, अगर ऐसा हुआ तो नागौर का पूरा राजनीतिक ढांचा बदल जाएगा, वहां कोई सामान्य वर्ग का नेता चुनाव नहीं लड़ पाएगा, और दशकों पुराना जाट वर्चस्व एक झटके में टूट जाएगा, और यहीं से शुरू होता है असली सवाल, हनुमान बेनीवाल का क्या होगा।
गहराई से देखें तो बेनीवाल के पास तीन रास्ते खुल सकते हैं, पहला, नागौर जिला भौगोलिक और जनसंख्या के लिहाज से इतना बड़ा है कि दो सीटों में बंटना करीब-करीब तय माना जा रहा है, अगर प्रॉपर नागौर सीट आरक्षित होती भी है, तो डीडवाना, कुचामन, लाडनूं और मकराना को मिलाकर, या खींवसर और मेड़ता बेल्ट को जोड़कर एक नई सामान्य सीट बन सकती है, खींवसर तो खुद बेनीवाल का पैतृक गांव है, यह सीट विशुद्ध जाट और किसान बहुल होगी, यानी मौजूदा नागौर से भी ज्यादा सुरक्षित। दूसरा रास्ता, बेनीवाल का प्रभाव सिर्फ नागौर तक सीमित नहीं, पूरे मारवाड़ और पश्चिमी राजस्थान में उनकी पकड़ है, अगर बाड़मेर-जैसलमेर की सीट भी टूटती है, तो बाड़मेर ग्रामीण या जोधपुर ग्रामीण, जिसमें ओसियां, भोपालगढ़ और बिलाड़ा जैसी जाट बहुल विधानसभाएं आती हैं, उनके लिए नया लॉन्चपैड बन सकती हैं, यहां तक कहा जाता है कि इस इलाके में जो भी सांसद बनता है, वो बेनीवाल के सहयोग से ही जीतता है। तीसरा रास्ता, अगर लोकसभा सीटें बढ़ती हैं तो विधानसभा भी 200 से बढ़कर करीब 270 से 300 तक पहुंच सकती है, विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी पहले ही इसका संकेत दे चुके हैं, ऐसे में बेनीवाल केंद्र की राजनीति छोड़कर राजस्थान की स्टेट पॉलिटिक्स में शिफ्ट हो सकते हैं, यानी नागौर का आरक्षित होना बेनीवाल के करियर का अंत नहीं, एक नए अध्याय की शुरुआत भी बन सकता है।
अब बाकी राजस्थान पर नजर डालिए, बीकानेर सीट 2009 से SC आरक्षित है, नए परिसीमन में ग्रामीण इलाके अलग होने पर यह सामान्य हो सकती है, जिससे जाट, पुष्करणा ब्राह्मण, माहेश्वरी, वैश्य और राजपूत समाज को दशकों बाद अपना सांसद खुद चुनने का मौका मिलेगा, यह सीट 2004 से बीजेपी के पास है, ठीक यही कहानी दौसा की है, राजेश पायलट के जमाने से यहां मीणा समाज का दबदबा रहा है, अगर यह सामान्य होती है तो मीणा बनाम गुर्जर का पुराना जमीनी संघर्ष लोकसभा तक पहुंच जाएगा, और टोंक-सवाई माधोपुर के अलग होने से मुस्लिम, मीणा और गुर्जर का त्रिकोणीय गठजोड़ बनेगा, फिलहाल यह दोनों सीटें कांग्रेस के पास हैं।
जोधपुर सीट पर तीन बार से जीत रहे केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की जमीन भी खिसक सकती है, अगर जाट बहुल विधानसभाएं अलग होती हैं तो यह विशुद्ध शहरी सीट बन जाएगी, जहां कांग्रेस से सीधी टक्कर होगी, वहीं बाड़मेर-जैसलमेर के दो सीटों में बंटने पर जाट-राजपूत की सियासी जंग तेज होगी, जिसमें SC और मुस्लिम मतदाता किंगमेकर बनेंगे। जयपुर में अभी दो सीटें हैं, आगे तीन से चार होने की चर्चा है, शहरी इलाकों में बीजेपी और ग्रामीण में कांग्रेस मजबूत रहेगी, लेकिन ग्रामीण में आरएलपी से टक्कर मिलेगी, सीकर, झुंझुनूं और चूरू बेल्ट में किसान आंदोलन के बाद से चेतना बदली है, नई सीटों से जाट और सैनिक परिवारों का प्रभाव बढ़ेगा, कोटपुतली-बहरोड़ और नीमकाथाना जैसी नई सीटों से यादव और गुर्जर मतदाता हरियाणा बॉर्डर बेल्ट के नए किंगमेकर बनेंगे।
मेवात और भरतपुर बेल्ट में मेव मुस्लिम बनाम गैर-मेव ध्रुवीकरण गहरा है, बीजेपी यहां सवर्ण-ओबीसी गोलबंदी पर भरोसा करेगी तो कांग्रेस मेव-जाटव-यादव सोशल इंजीनियरिंग पर, हाड़ौती में कोटा-बूंदी-बारां-झालावाड़ बेल्ट पारंपरिक रूप से बीजेपी का गढ़ रहा है, धाकड़, गुर्जर और मीणा जातियां यहां निर्णायक हैं, अगर बारां अलग सीट बनती है तो SC प्रभाव बढ़ने से कांग्रेस को सेंध लगाने का मौका मिल सकता है, और मेवाड़-वागड़ बेल्ट में भारत आदिवासी पार्टी के उभार ने बीजेपी-कांग्रेस दोनों की नींद उड़ा रखी है, अगर यहां दो स्वतंत्र ST सीटें बनती हैं तो मुख्यधारा की पार्टियों के लिए जमीन बचाना मुश्किल होगा, जबकि उदयपुर-चित्तौड़गढ़ में राजपूत, ब्राह्मण और जैन समाज के दबदबे से बीजेपी की जमीन और मजबूत होगी।
कुल मिलाकर, यह परिसीमन सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, यह राजस्थान की पूरी सियासी बिसात को नए सिरे से बिछाने वाला है, कुछ आंकड़े अभी पुख्ता हैं, जैसे EAC-PM की 38 सीटों वाली रिपोर्ट और उसमें नामित तीन सीटें, बाकी बहुत कुछ अभी अटकल के दायरे में है, खासकर नागौर का आरक्षण, और अगर वो अटकल सच साबित हुई, तो हनुमान बेनीवाल की सियासत का सबसे बड़ा इम्तिहान शुरू हो जाएगा।
अब आपकी क्या राय है, क्या नागौर सीट वाकई आरक्षित होनी चाहिए, और अगर ऐसा हुआ तो बेनीवाल को डीडवाना-कुचामन से लड़ना चाहिए या बाड़मेर का रुख करना चाहिए, अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें, वीडियो पसंद आया हो तो लाइक करें, शेयर करें, और सियासी भारत को सब्सक्राइब करना न भूलें, धन्यवाद, जय हिंद, जय राजस्थान।
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