बीजेपी उत्तर प्रदेश का चुनाव योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर लड़ेगी, या चुनाव से पहले ही योगी को हटाने की तैयारी चल रही है? मुख्यमंत्री योगी ही रहेंगे या चुनाव के बाद या चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश के सीएम की सीट पर कोई और बैठने वाला है? सवाल यह उठता है कि चुनाव के बाद योगी आदित्यनाथ को इतनी आसानी से सीएम पद से हटाया जा सकता है, जितना शिवराज सिंह को हटाकर दिल्ली बुला लिया गया? ऐसी कौन सी तस्वीरें सामने आईं, जिन्होंने योगी के करोड़ों समर्थकों को बेचैन कर दिया? क्या योगी के लगातार बढ़ते कद से मोदी और शाह असहज हैं, या फिर यह विपक्ष द्वारा प्रचारित किया गया सिर्फ राजनीतिक अफवाहों का तूफान है?
2027 के उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले या ठीक बाद, लखनऊ के मुख्यमंत्री आवास से योगी आदित्यनाथ की विदाई होने वाली है? क्या दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में एक ऐसी खिचड़ी पक रही है, जिसके बारे में योगी के कट्टर समर्थकों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा? याद कीजिए मध्य प्रदेश का वो नजारा, जब शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर चुनाव लड़ा गया, पार्टी को प्रचंड़ बहुमत ऐतिहासिक आया, लेकिन जब मुख्यमंत्री बनने की बारी आई, तो मोहन यादव को बिठाकर शिवराज सिंह को दिल्ली बुला लिया गया। क्या यही फॉर्मूला उत्तर प्रदेश में भी दोहराया जाने वाला है? आज हम इस वीडियो में उन तस्वीरों की इनसाइड स्टोरी बताएंगे, जिसने लखनउ से लेकर दिल्ली तक के सियासी पारे को 7वें आसमान पर पहुंचा दिया है।
उत्तर प्रदेश में अगले साल की शुरुआत में ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बीजेपी की केंद्रीय टीम से लेकर खुद सीएम योगी आदित्यनाथ अपनी-अपनी तैयारियों में जुट चुके हैं, लेकिन इसी बीच ऐसी तस्वीरें सामने आईं, जिन्होंने योगी समर्थकों को बैचेन कर दिया है। पहली तस्वीर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन लखनउ में गाड़ी से उतरते हैं। उनके स्वागत के लिए सामने एक लाइन में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके ठीक बगल में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य हाथ में गुलदस्ता लिए खड़े हैं। प्रोटोकॉल और राजनीतिक शिष्टाचार कहता है कि पहला गुलदस्ता सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लिया जाना चाहिए था, लेकिन हुआ इसके बिल्कुल उलट!
नितिन नबीन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक तरह से अनदेखा करते हुए सीधे केशव प्रसाद मौर्य की तरफ बढ़े और उनसे पहले गुलदस्ता लिया। इस दौरान योगी आदित्यनाथ के चेहरे के भाव, उनकी आंखों की हरकत साफ बयां कर रही थी कि वो इस अप्रत्याशित व्यवहार से असहज थे। हालांकि बाद में नितिन नबीन ने योगी से भी गुलदस्ता लिया, लेकिन राजनीति में टाइमिंग और बॉडी लैंग्वेज ही सब कुछ होती है।
दूसरी तस्वीर दिल्ली की है। योगी आदित्यनाथ जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिलने पहुंचे, तो उस मुलाकात की जो तस्वीर बाहर आई, उसने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। तस्वीर में योगी आदित्यनाथ के बैठने का संकोच भरा अंदाज और उनके चेहरे पर दिख रही शिकन साफ इशारा कर रही थी कि दिल्ली दरबार में इस समय सबकुछ उनके अनुकूल नहीं चल रहा है, जबकि इसी तस्वीर में गृहमंत्री अमित शाह सरदार पटेल की बड़ी तस्वीर के नीचे फैलकर बैठै हैं, मानो योगी आदित्यनाथ से पांच साल का हिसाब पूछ रहे हों।
फिर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें यूपी भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने कहा कि चुनाव परिणाम के बाद मोदी, शाह, राजनाथ सिंह और योगी जैसे नेता तय करते हैं कि सीएम कौन होगा, यूपी चुनाव से पहले सीएम का चेहरा नहीं बनाया जाएगा। फिर एक और वीडियो सामने आया, जिसमें नितिन नबीन ने कहा कि उत्तराखंड़ या उत्तर प्रदेश में जो हमारे सिटिंग सीएम हैं, वो ही सीएम का चेहरा होंगे, बदलने का सवाल ही पैदा नहीं होता है।
आखिर इन तस्वीरों और बयानों के पीछे की असली वजह क्या है? असल में देश की राजनीति में पिछले कुछ सालों से एक मजबूत परसेप्शन बन चुका है। धारणा यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद, अगर देश में भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद का कोई सबसे स्वाभाविक और मजबूत चेहरा है, तो वो योगी आदित्यनाथ हैं, लेकिन राजनीति की बिसात पर मोहरे इतनी आसानी से नहीं चलते।
हर नागरिक जानता है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पावर में रहते हुए योगी का यह रास्ता इतना आसान नहीं होने वाला। पिछले 4 दशकों से नरेंद्र मोदी के साथ बिना किसी सवाल के, बिना किसी लालच के, मोदी को राम मानकर लक्ष्मण के जैसे हमेशा, हर निर्णय में बिना शर्त साथ रहने वाले आधुनिक चाणक्य अमित शाह को ही मोदी अपना उत्तराधिकारी देखना चाहेंगे। यह बात जगजाहिर है कि केंद्र सरकार के हर बड़े संकट को टालने और पार्टी की चुनावी रणनीति बनाने का काम अमित शाह ही करते हैं
इतना सबकुछ होने के बाद भी अमित शाह की राह में एक बड़ा पेंच है। अगर हम जमीनी हकीकत की बात करें तो अमित शाह के पास वो देशव्यापी जनधार नहीं है, जो नरेंद्र मोदी या योगी आदित्यनाथ ने हासिल की है। योगी की लोकप्रियता आज सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि त्रिपुरा से लेकर कर्नाटक और महाराष्ट्र से लेकर बंगाल के चुनावों तक उनकी भारी मांग रहती है। और यही वो त्रिकोण है, जो इस समय भाजपा के अंदरूनी समीकरणों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है। इतिहास गवाह है कि 2017 में जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी, तो उत्तरांचल में योगी के जादू के साथ ही पूरी तरह से पीएम मोदी के करिश्मे की जीत थी। तब योगी आदित्यनाथ को सीएम की कुर्सी सौंपी गई, लेकिन 2022 का चुनाव बिलकुल ही अलग था।
पांच साल में योगी आदित्यनाथ ने कानून व्यवस्था, माफियाओं पर बुल्डोजर एक्शन और अपनी फायरब्रांड छवि के दम पर, अपने बलबूते उत्तर प्रदेश में दोबारा पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। अब जब योगी आदित्यनाथ तीसरे कार्यकाल की तरफ बढ़ रहे हैं, तो उनके सामने चुनौतियां विपक्षी पार्टियों से नहीं हैं। विपक्षी पार्टियां जैसे समाजवादी पार्टी या कांग्रेस योगी के तगड़े जनाधार और विकास कार्यों के आगे फिलहाल बैकफुट पर दिखाई देती हैं। कई विश्लेषक तो यह मान रहे हैं कि विपक्ष तीसरी बार भी विपक्ष में बैठने की तैयारी कर रहा है।
लेकिन असली संकट विपक्ष नहीं, बल्कि दिल्ली बनाम लखनऊ की यह अंदरूनी खींचतान है। राजनीतिक गलियारों में दबी जुबान में यह चर्चा आम है कि मोदी और शाह की जोड़ी नहीं चाहती कि योगी आदित्यनाथ लगातार तीसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें। क्योंकि मोदी की बढ़ती उम्र और योगी का देश में तेजी से बढ़ता ग्राफ सीधे तौर पर अमित शाह के भविष्य के प्रधानमंत्री पद के रास्ते को छोटा कर रहा है। अगर योगी 2027 के चुनावों के बाद फिर से सीएम बनते हैं, तो 2029 के आम चुनावों के बाद वो पीएम पद के सबसे तगड़े दावेदार बन जाएंगे। और यही वो बैचेनी है जो इस समय दिल्ली बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को परेशान कर रही है।
ठीक इसी तरह की अफवाहें और खबरें 2022 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भी उड़ी थीं कि योगी को बदला जा रहा है और यूपी के तीन टुकड़े करने का काम किया जा सकता है, लेकिन तब ऐसा कुछ नहीं हुआ और योगी ने अपना दूसरा कार्यकाल भी सफलतापूर्वक पूरा करने की ओर कदम बढ़ा दिए। किंतु एक बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी की राजनीति में कुछ भी पूर्वानुमान लगाने योग्य नहीं होता। पिछले 12 सालों में इस जोड़ी ने ऐसे-ऐसे फैसले लिए हैं, जिन्होंने न सिर्फ विपक्ष को, बल्कि खुद भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं को हैरान कर दिया है।
क्या पता, उत्तर प्रदेश का आगामी चुनाव योगी आदित्यनाथ के चेहरे और उनकी लीडरशिप में ही लड़ा जाए, योगी रात-दिन एक करके भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत भी दिला दें... लेकिन जैसे ही नतीजों के बाद मुख्यमंत्री चुनने की बारी आए, तो दिल्ली से एक नया लिफाफा खुले और मध्य प्रदेश की तरह किसी नए चेहरे को उत्तर प्रदेश की गद्दी सौंप दी जाए! राजनीति में इसे 'सरप्राइज एलिमेंट' कहा जाता है, और मोदी-शाह इसके उस्ताद माने जाते हैं। इन तमाम कयासों और चर्चाओं के बीच, एक हकीकत यह भी है कि 2029 से पहले योगी आदित्यनाथ के साथ ऐसा कोई भी आत्मघाती रिस्क लेना दिल्ली के लिए आसान नहीं होगा। योगी का जनाधार बहुत बड़ा है, उनकी छवि बेहद साफ और आक्रामक है। सबसे बड़ी बात यह है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों से होकर ही गुजरता है। अगर यूपी में जरा सा भी असंतोष पैदा हुआ, तो 2029 का लोकसभा चुनाव भाजपा के हाथ से फिसल सकता है।
अब देखना यह है कि क्या मोदी-शाह की जोड़ी अमित शाह के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए योगी आदित्यनाथ को किनारे करने का जोखिम उठाएगी या फिर योगी का बढ़ता कद दिल्ली को अपने फैसले बदलने पर मजबूर कर देगा? पार्टी 2014 से पहले मोदी को पीएम नहीं बनाना चाहती थी, लेकिन उनके तेजी से बढ़ते कद और उनकी देशव्यापी मांग ने पार्टी को मजबूर कर दिया था। ठीक ऐसा ही इस बार योगी के साथ होता दिखाई दे रहा है, जिनका चमत्कार देश देखना चाहता है। आपको लगता है चुनाव से पहले या बाद में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटाया जा सकता है? या बीजेपी उत्तर प्रदेश में मध्य प्रदेश वाला फॉर्मूला दोहराएगी?

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