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हनुमान बेनीवाल दिलाएंगे जाटों को आरक्षण?


"क्या आप जानते हैं कि राजस्थान का एक जाट जब जयपुर या जोधपुर में रहता है, तो उसे ओबीसी के तहत आरक्षण का लाभ मिलता है... लेकिन वही जाट जब भरतपुर या धौलपुर की सीमा में कदम रखता है, तो उसका आरक्षण खत्म हो जाता है? एक ही राज्य, एक ही जाति, लेकिन कानून दो अलग-अलग बने हुए हैं, और ऐसा सिर्फ यहीं पर है। आखिर ऐसा क्यों है कि भरतपुर और धौलपुर के जाटों को केंद्र और राज्य की आरक्षण सूचियों से बाहर कर दिया गया? 

आज 27 साल बाद भी यहां के जाट आरक्षण से वंचित हैं और अब इस मामले में ने फिर से तूल पकड़ लिया है। सोमवार को नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने भरतपुर में एक बड़ी रैली करके राज्य और केंद्र सरकार को चेतावनी दी है। उन्होंने जाट आरक्षण संघर्ष समिति से ज्ञापन लेकर पीएम मोदी को देने का वादा किया है और साथ ही इन दोनों जिलों के जाट समाज को ओबीसी में आरक्षण दिलाने का वादा किया है। लेकिन भरपुर-धोलपुर के जाट समाज को आरक्षण की यह कहानी न तो यहां खत्म होती है और न ही यहां से शुरु हुई थी।

"कहानी शुरू होती है 1990 के दशक के उत्तरार्ध से। राजस्थान में जाटों को आरक्षण दिलाने का श्रेय मुख्य रूप से 'जाट आरक्षण संघर्ष समिति' और राजस्थान के कद्दावर जाट नेताओं के पुरजोर प्रयासों को जाता है। इस आंदोलन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1999 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान राजस्थान में जाटों को केंद्र में ओबीसी आरक्षण देने का वादा किया। 

इसके बाद सरकार गठन होने के उपरांत 27 अक्टूबर 1999 को वाजपेयी सरकार ने एक ऐतिहासिक फैसला लेते हुए केंद्रीय ओबीसी सूची में राजस्थान के जाटों को शामिल किया। इसके ठीक 5 दिन बाद, 3 नवंबर 1999 को राजस्थान की तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार ने राज्य की ओबीसी सूची में भी जाटों को आरक्षण दे दिया। 

यानी वर्ष 1999 में केंद्र और राज्य, दोनों जगह जाट समाज को ओबीसी का अधिकार मिल गया। लेकिन इसी नोटिफिकेशन में वो पेंच फंसा, जो आज भी भरतपुर और धौलपुर के युवाओं के लिए जी का जंजाल बना हुआ है।" 

"अब आते हैं सबसे बड़े सवाल पर कि भरतपुर और धौलपुर को बाहर क्यों रखा गया? जब 1999 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपनी रिपोर्ट दी, तो उसने एक कानूनी और ऐतिहासिक तर्क सामने रखा। आयोग का कहना था कि भरतपुर और धौलपुर रियासतें थीं, जहाँ जाट राजाओं का शासन था। 

इतिहास गवाह है कि महाराजा सूरजमल के नेतृत्व में भरतपुर एक अजेय और शक्तिशाली जाट साम्राज्य था। चूंकि इन दोनों जिलों में जाट समाज ऐतिहासिक रूप से 'शासक वर्ग' रहा था, इसलिए आयोग ने माना कि ये सामाजिक और राजनीतिक रूप से पिछड़े नहीं हैं, बल्कि संपन्न हैं। 

सवाल यह उठता है कि यदि यही आधार है तो फिर राजस्थान के अधिकांश भाग पर शासन करने वाले राजपूत समाज को तो ईडब्ल्यूएस का रिजर्वेशन मिलना ही नहीं चाहिए, लेकिन इन तथ्यों को अदालतें भी अनदेखा करती हैं। भरतपुर-धोलपुर में शासन करने वाले दो राजपरिवार थे, जबकि इन्हीं दो परिवारों की आड़ लेकर ओबीसी आयोग की रिर्पोट में लाखों की संख्या में गरीब और मध्यव​र्गीय परिवार आरक्षण से ​वंचित कर दिया गया। 

जब इन जिलों के जाट समाज को आरक्षण नहीं मिला तो उसके बाद लंबा कानूनी संघर्ष चला। साल 2013 में केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने एक विशेष प्रावधान के तहत भरतपुर और धौलपुर के जाटों को भी केंद्रीय सूची में शामिल कर लिया था, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया। 'राम सिंह बनाम केंद्र सरकार' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2015 के ऐतिहासिक फैसले में कहा कि आरक्षण केवल सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जा सकता है, न कि राजनीतिक दबाव में। 

कोर्ट ने 9 राज्यों में जाट आरक्षण को रद्द कर दिया, जिसके तहत भरतपुर और धौलपुर के जाटों का केंद्रीय आरक्षण भी छिन गया। अब अदालतों को कौन समझाए कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछडेपन के कारण ही ये लोग आरक्षण की मांग कर रहे हैं।

"अब सवाल उठता है कि जब राज्य के बाकी जाटों को आरक्षण है, तो इन दोनों जिलों के लिए सरकारें निर्णय क्यों नहीं ले पा रही हैं? इसके पीछे मुख्य रूप से कानूनी और तकनीकी बाधाएं हैं। पहली बाधा है ओबीसी आयोग का वो सर्वे, जो शायद दिल्ली के बंद कमरों में बैठकर किया गया था। 

सुप्रीम कोर्ट के सख्त दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी जाति को आरक्षण सूची में दोबारा जोड़ने के लिए राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के पास यह साबित करने के लिए पुख्ता आंकड़े होने चाहिए कि वर्तमान में भरतपुर-धौलपुर का जाट समाज सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ चुका है। दूसरी बाधा है 50% की सीमा का डर, जिसके तहत आरक्षण का कुल कोटा 50% की कानूनी सीमा को पार न करे, यह भी सरकारों के लिए एक बड़ी सिरदर्दी है। 

हालांकि, इन जिलों के जाट ओबीसी के वर्तमान आरक्षण में ही खुद के लिए मांग कर रहे हैं, अलग से नहीं मांग रहे हैं। तीसरा कारण है राजनीतिक नफा-नुकसान। यदि केंद्र सरकार बिना ओबीसी आयोग की मजबूत सिफारिश के सीधे कोई अध्यादेश लाती है, तो उसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। यही वजह है कि राज्य और केंद्र सरकारें फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं और मामला कमेटियों और सर्वे रिपोर्टों के बीच अटका हुआ है।" 

"आइए अब बात करते हैं उस पहलू की, जिसने राजस्थान में जाट समाज की तकदीर बदल दी। 1999 में आरक्षण मिलने के बाद जाट समाज को व्यापक स्तर पर लाभ हुआ। प्रशासनिक सेवाओं जैसे सेक्टर्स में राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में जाट युवाओं की भागीदारी और चयन दर में भारी उछाल आया और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को सरकारी नौकरियों में एंट्री मिली। 

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में मेडिकल, इंजीनियरिंग और यूनिवर्सिटी दाखिलों में ओबीसी कोटे के तहत जाट परिवारों के बच्चों को बड़े कॉलेजों में सीटें मिलीं, जिससे समाज में शिक्षा का स्तर तेजी से सुधरा। इसके साथ ही आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण भी हुआ, जिसके तहत जो समाज मुख्य रूप से खेती-किसानी पर निर्भर था, सरकारी नौकरियों की बदौलत उनके पास आय का एक स्थायी जरिया आया और समाज का मिडिल क्लास मजबूत हुआ। 

इस आरक्षण ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और युवाओं के आत्मविश्वास को एक नई उड़ान दी, यही वजह है कि भरतपुर और धौलपुर के युवा भी खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं और इस अधिकार की मांग कर रहे हैं।" नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल की लीडरशिप में यहां के जाट समाज ने फिर से हूंंकार भरी है। बेनीवाल ने वादा किया है कि वो इस मामले को संसद में उठाएंगे और पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से मिलकर मजबूत पैरवी करेंगे। 

"तो कुल मिलाकर बात यह है कि भरतपुर और धौलपुर के जाटों का दर्द यह है कि राजा-महाराजाओं का दौर सदियों पहले बीत चुका है। आज का आम युवा वहां भी खेती और सामान्य पृष्ठभूमि से आता है, लेकिन अतीत के ऐतिहासिक शासक वर्ग के टैग के कारण उनका वर्तमान प्रभावित हो रहा है। 

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या राजस्थान सरकार की ताजा सर्वे रिपोर्टें इन युवाओं को न्याय दिला पाती हैं या यह मुद्दा राजनीति की भेंट चला रहेगा। देखना यह भी दिलचस्प होगा कि हनुमान बेनीवाल इस मुद्दे को मंजिल तक कितना ले जा पाते हैं? आपकी इस पूरे मुद्दे पर क्या राय है? क्या इतिहास को देखकर आज के युवाओं का आरक्षण तय होना चाहिए या आज की जमीनी हकीकत को देखा जाना चाहिए? अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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