एक ऐसा फैसला जो भाजपा को उत्तर प्रदेश में 5-10% अतिरिक्त वोट दिला सकता है, लेकिन साथ ही 10-15% ओबीसी वोट गंवा भी सकता है! मोदी सरकार के सामने यही यक्ष प्रश्न है कि वोट पाने का इंतजाम किया जाए या वोट थामने का काम जाए? भाजपा सरकार इस विषय पर गंभीरता से सोच रही है और यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार केंद्र की तरफ देख रही है।
इसलिए आज के इस वीडियो में बात उस सियासत की, जो हर चुनाव से पहले जातियों को तराजू पर तौलती है। आपको पता होगा हाल के दिनों में संसद की चौखट से एक नई मांग गूंजी है। सवर्ण समाज के सांसदों ने कहा कि 'सवर्ण आयोग' का गठन किया जाए। इसके लिए कई सांसदों ने प्रधानमंत्री और सरकार को चिट्ठियां लिख दी हैं। तर्क यह दिया जा रहा है कि जब देश में एससी आयोग है, एसटी आयोग है, ओबीसी आयोग है, मूसलमानों के लिए वक्फ बोर्ड जैसी संस्थाएं हैं, तो फिर ईडब्ल्यूएस यानी आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए कोई संवैधानिक या कानूनी छत क्यों नहीं?
खासकर तब, जब हाल के महीनों में यूजीसी के नए दिशानिर्देशों और नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के भीतर यह बेचैनी उभरी कि उनकी शिकायतों की सुनवाई के लिए कोई मंच ही नहीं है। लेकिन सवाल सिर्फ एक आयोग की मांग का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर ये आयोग करते क्या हैं? इन्हें कितना फंड मिलता है? क्या ये सच में समाज का भला करते हैं या सिर्फ राजनीतिक दलों के लिए वोट बटोरने का 'संवैधानिक मुखौटा' भर हैं? और सबसे बड़ा सवाल, अगर मोदी सरकार सवर्ण आयोग बना देती है, तो क्या इसका सीधा राजनीतिक फायदा उत्तर प्रदेश के चुनावी रण में मिलेगा?
पहले समझिए कि इन आयोगों की हकीकत क्या है। हमारे देश में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत आता है। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) अनुच्छेद 338A और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) को 102वें संविधान संशोधन के जरिए अनुच्छेद 338B में संवैधानिक दर्जा दिया गया। इन आयोगों के पास सिविल कोर्ट जैसी ताकतें होती हैं। ये समन जारी कर सकते हैं, गवाहों को बुला सकते हैं, सरकारी विभागों से रिकॉर्ड मांग सकते हैं और समाज के खिलाफ हो रहे भेदभाव की जांच कर राष्ट्रपति को रिपोर्ट सौंप सकते हैं, लेकिन आपको पता है इसकी ज़मीनी हकीकत क्या है? इनका सालाना बजट उठाकर देख लीजिए। इन आयोगों का बजट कुछ दर्जनों करोड़ रुपयों में सिमट जाता है, मसलन 20, 30 या 40 करोड़ रुपये। और यह पैसा भी कहां खर्च होता है? समाज के उत्थान पर नहीं। बजट का 80 से 90 फीसदी हिस्सा चेयरमैन, वाइस चेयरमैन और सदस्यों के वेतन, सरकारी बंगलों, गाड़ियों के पेट्रोल, दफ्तर के रखरखाव और कर्मचारियों की सैलरी में निकल जाता है।
यानी जिस आयोग को करोड़ों लोगों के अधिकारों की रक्षा का पहरेदार बताया जाता है, व्यावहारिक तौर पर वह सत्ताधारी दलों के उन नेताओं के लिए 'पुनर्वास केंद्र' बनकर रह जाता है, जिन्हें मंत्री पद नहीं मिल पाता। उनकी सिफारिशें सरकारों के लिए बाध्यकारी नहीं होतीं; वे महज सलाहकारी होती हैं, जो अक्सर मंत्रालयों की अलमारियों में धूल फांकती हैं। सवाल यह है कि फिर यह मांग क्यों उठ रही है? जब 2019 में 103वें संविधान संशोधन के जरिए सवर्णों और सामान्य वर्ग के गरीबों को 10% EWS आरक्षण दिया गया, तो लगा कि आर्थिक आधार पर न्याय की शुरुआत हो गई। लेकिन हालिया दिनों में यूजीसी से लेकर सरकारी नियुक्तियों और प्रशासनिक विवादों में सामान्य वर्ग के युवाओं को लगा कि अगर उनके खिलाफ कोई नीतिगत अन्याय होता है तो वे जाएं कहां? एससी-एसटी के पास एट्रोसिटी एक्ट और आयोग है। ओबीसी के पास समर्पित आयोग है, लेकिन सवर्ण समाज के पास ऐसा कोई दरवाजा नहीं है जहां वे 'रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन' यानी विपरीत भेदभाव की गुहार लगा सकें। इसी असंतोष को भांपते हुए नेताओं ने 'सवर्ण आयोग' का पासा फेंका है।
अब आते हैं सबसे बड़े और कड़वे राजनीतिक सवाल पर, अगर भाजपा की केंद्र सरकार सवर्ण आयोग का गठन करती है, तो क्या इसका फायदा उत्तर प्रदेश के चुनाव में मिलेगा? बिलकुल मिलेगा, लेकिन कैसे और कितना, इसका गणित बहुत गहरा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को समझिए। यूपी में सवर्ण आबादी लगभग 18 से 20 फीसदी मानी जाती है, जिसमें ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य और कायस्थ शामिल हैं। यह वोट बैंक दशकों से भाजपा की राजनीति की रीढ़ रहा है, लेकिन पिछले कुछ चुनावों और राजनीतिक घटनाक्रमों को देखिए। साल 2024 के आम चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया कि जब विपक्ष ने 'पीडीए' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का नारा बुलंद किया, तो भाजपा के सामाजिक समीकरणों में दरारें दिखीं। विपक्ष ने संविधान और आरक्षण के मुद्दे पर ऐसा नैरेटिव गढ़ा कि भाजपा बैकफुट पर आ गई और उसे अति-पिछड़ों और दलितों को साधे रखने के लिए लगातार अपनी नीतियां झुकानी पड़ीं।
इसका नतीजा क्या हुआ? उत्तर प्रदेश का सवर्ण मतदाता, खासकर युवा वर्ग अंदर ही अंदर यह महसूस करने लगा कि पार्टियां उनका वोट तो 'गारंटी' मानकर जेब में रखती हैं, लेकिन नीतियां सिर्फ बहुजनों और अल्पसंख्यकों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं। यूजीसी विवाद ने इस आग में घी का काम किया। इसलिए अगर मोदी सरकार 'सवर्ण आयोग' या 'सामान्य वर्ग कल्याण आयोग' के गठन का ऐलान करती है, तो यूपी में इसका असर तीन स्तरों पर होगा: पहला— कोर वोटर का भावनात्मक तुष्टिकरण होगा। सवर्ण आयोग बनते ही भाजपा अपने कोर सवर्ण मतदाता को यह संदेश देने में कामयाब होगी कि 'हम सिर्फ सबका साथ-सबका विकास की बात नहीं करते, बल्कि आपकी पहचान और आपके अधिकारों की भी फिक्र करते हैं।' यह सवर्णों के भीतर पनप रही उपेक्षा की भावना पर सीधे मरहम लगाने जैसा होगा।
दूसरा— वोट बैंक की लामबंदी और टर्नआउट होगा। यूपी के चुनाव में जब सवर्ण मतदाता उदासीन होकर घर बैठ जाता है, तो भाजपा को भारी नुकसान होता है। सवर्ण आयोग की घोषणा उस उदासीन वोटर को बूथ तक खींच लाने का मनोवैज्ञानिक औजार बनेगी। ब्राह्मण और ठाकुर राजनीति के बीच जो गाहे-बगाहे खींचतान चलती है, वह एक साझा 'सवर्ण अस्मिता' के नीचे दब जाएगी। तीसरा— विपक्ष की घेराबंदी होगी। जैसे ही सवर्ण आयोग की बात होगी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे दल धर्मसंकट में फंस जाएंगे। अगर वे इसका विरोध करते हैं, तो उन पर सीधा 'सवर्ण विरोधी' होने का ठप्पा लगेगा, जिससे उनका बचा-खुचा अगड़ा वोट भी छिटक जाएगा। और अगर वे इसका समर्थन करते हैं, तो उनका बहुजन और पिछड़ा वोट बैंक यह सवाल पूछेगा कि आप सवर्ण आयोग का समर्थन क्यों कर रहे हैं? यानी भाजपा विपक्ष की जातिवादी पिच पर ही एक नया बाउंसर फेंक देगी।
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। क्या यह फायदा असीमित होगा? अगर सवर्ण आयोग को वैधानिक या संवैधानिक ताकत दी गई, तो विपक्ष यूपी के 50 फीसदी से ज्यादा ओबीसी और 21 फीसदी दलित मतदाताओं के बीच यह माहौल बनाने की कोशिश करेगा कि 'कमंडल की राजनीति अब सवर्ण वर्चस्व को दोबारा स्थापित करने की कोशिश कर रही है।' यह अति-पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों को भाजपा से दूर छिटकाने का हथियार बन सकता है, जिसे भाजपा ने पिछले दस सालों में बड़ी मशक्कत से अपने साथ जोड़ा है। सवर्ण आयोग बने या न बने, आयोगों का पुराना इतिहास यही बताता है कि इनसे आम आदमी की जिंदगी में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आता है। न बेरोजगारी खत्म होती है, न आर्थिक तंगी दूर होती है, लेकिन चुनावी प्रयोगशाला में यह एक ऐसा 'जातिगत झुनझुना' है, जिसकी खनक उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में सत्ता की चाबी घुमाने का माद्दा रखती है। सवाल यह नहीं है कि आयोग सवर्णों को क्या देगा। सवाल यह है कि सवर्ण आयोग के नाम पर पार्टियां क्या हासिल करेंगी? और जवाब साफ है वोट, सत्ता और राजनीतिक समीकरणों की बिसात पर एक और शह-मात का खेल खेला जाएगा। अब फैसला आपको करना है कि आप आयोगों की कागजी ताकत पर भरोसा करते हैं या ज़मीनी हकीकत पर। अंत में, आपको क्या लगता है सवर्ण आयोग बनाने से भाजपा को तीसरी बार सरकार बनाने की जमीन मजबूत होगी या समाजों में दूरियां बढ़ाने का काम किया जाएगा?

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