दो से अधिक बच्चों पर रोक लगाने वाली सरकारें अब 10 बच्चों पर 13 लाख का इनाम दे रही है। यानी नसबंदी के नारों की जगह 'बेबी बोनस' ने ले ली है.....याद है आपको? दशकों तक हमारे दिमाग में एक ही डर बिठाया गया, "जनसंख्या का बम फटने वाला है!" हर दीवार पर, हर बस के पीछे बस एक ही ज्ञान लिखा होता था, 'हम दो, हमारे दो'। 1970 के दशक में इंदिरा गांधी सरकार के समय संजय गांधी ने 'जनसंख्या नियंत्रण' के नाम पर लाखों लोगों की जबरन नसबंदी तक करवा दी थी। तब हमें बताया गया था कि इंसानियत अपनी ही भीड़ में कुचलकर मर जाएगी।
लेकिन आज इस कहानी ने 180 डिग्री का यू-टर्न ले लिया है! आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू खुले मंच से कह रहे हैं, "जनसंख्या ही हमारी असली संपत्ति है!" और सिर्फ कह नहीं रहे, बल्कि ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों के लिए सरकारी खजाना खोल दिया है। उनकी सरकार ने ऐलान किया है कि जो परिवार तीसरा बच्चा पैदा करेगा उसे 30,000 रुपये और चौथे बच्चे पर 40,000 रुपये का नकद इनाम दिया जाएगा। इधर राजस्थान सरकार को देखिए! जो राज्य 90 के दशक में जनसंख्या रोकने के लिए कानूनी सख्ती दिखा रहा था, उसने अपना 30 साल पुराना फैसला पलट दिया है। अब दो से ज्यादा बच्चों वाले लोग भी बेखौफ होकर पंचायत और स्थानीय चुनाव लड़ सकते हैं। आखिर अचानक ऐसा क्या हो गया? जो सरकारें कल तक आबादी रोकने के लिए नारे लिखवा रही थीं, वो आज आबादी बढ़ाने के लिए पैसे क्यों बांट रही हैं? आज के इस वीडियो में हम बात करेंगे दुनिया के सबसे बड़े झूठ और उस 'डेमोग्राफिक टाइम-बम' की, जो अब फटने ही वाला है। कुर्सी की पेटी बांध लीजिए, क्योंकि जो आंकड़े आज आप देखने वाले हैं, वो आपकी नींद उड़ा देंगे।
इस पूरे खेल को समझने के लिए आपको एक जादुई नंबर समझना होगा, TFR यानी टोटल फर्टिलिटी रेट। एक समाज को अपनी आबादी स्थिर रखने के लिए हर महिला का औसतन 2.1 बच्चों को जन्म देना जरूरी है, यानी 100 महिलाओं को 210 बच्चों को जन्म देना अनिवार्य है। इसे 'रिप्लेसमेंट लेवल' कहते हैं। अगर आंकड़ा 2.1 से नीचे गया, तो मतलब आबादी घटनी शुरू हो जाएगी, और आज दुनिया के ज्यादातर देशों का TFR पाताल में जा चुका है। इसके कारण दुनियाभर की सरकारें इस कदर डरी हुई हैं कि बच्चे पैदा करने पर 'बाय वन गेट वन फ्री' जैसी स्कीमें चला रही हैं। जैसे कपड़े, जूते और आर्टिफिसयली ज्वेलरी की दुकाने पर होता है।
....तो आप जरा इन देशों का हाल देखिए:—
——दक्षिण कोरिया दुनिया का सबसे तेजी से विलुप्त होता देश है। यहां जन्मदर इतनी गिर चुकी है कि स्कूल बंद करके उन्हें 'नर्सिंग होम्स' में बदला जा रहा है। सरकार बच्चे पैदा करने पर लाखों रुपये का सीधा कैश बोनस, फ्री हाउसिंग और टैक्स में भारी छूट दे रही है, फिर भी कोई बच्चा पैदा करने को राजी नहीं है। यहां तक कहा जा रहा है कि दुनिया के किसी भी देश से लोग आएं और हमारे यहां आकर शादी करें, बच्चे पैदा करे, उनको सभी सुविधाएं सरकार देगी।
——जापान में बच्चों के डायपर से ज्यादा बुज़ुर्गों के डायपर बिकते हैं। इस विकसित देश में आज 90 लाख से ज्यादा घर खाली पड़े हैं, जिन्हें 'अकिया' कहा जाता है। सरकार लोगों को मुफ्त में घर बांट रही है और कह रही है कि जापान में आओ, यहां बसो और परिवार बढ़ाओ। मतलब आप कुछ भी मत करो, आप तो दिनरात केवल जनसंख्या बढ़ाने का काम करो, बाकी काम सरकार करेगी।
——90 के दशक में 'वन चाइल्ड पॉलिसी' लागू करके चीन ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। आज चीन बूढ़ा हो रहा है और वहां की कम्युनिस्ट पार्टी लोगों के आगे गिड़गिड़ा रही है कि कृपया तीन बच्चे पैदा करें! यानी चीन भी अब घटती जनसंख्या से जूझ रहा है।
——रुस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अब सोवियत संघ के जमाने का 'मदर हीरोइन' वाला अवॉर्ड वापस ले आए हैं, यानी जो महिला 10 या उससे ज्यादा बच्चे पैदा करेगी, उसे रूस की सरकार सम्मान के साथ 10 लाख रूबल, यानी करीब 13 लाख रुपये का इनाम दे रही है। आपको यदि रसियन में इंटरेस्ट है तो रुस में जाकर सरकारी खर्चे पर लाभ उठा सकते हैं।
——हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन ने तो हद ही कर दी। उन्होंने कानून बना दिया है कि जो महिला 4 या उससे ज्यादा बच्चे पैदा करेगी, उसे जिंदगी भर जीरो इनकम टैक्स देना होगा! यानी जो महिलाएं 4 से ज्यादा बच्चे पैदा करेगी, वो जीवनभर सरकारी टैक्स के झंझट से मुक्त हो जाएगी।
घटती जनंसख्या केवल इन 6 देशों की टेंशन नहीं है, बल्कि यूरोप से लेकर कनाडा तक, गोरे देशों में आबादी इस कदर सिकुड़ रही है कि वो दूसरे देशों से नौजवानों को आयात कर रहे हैं। "हमारे देश आओ, काम करो, बच्चे पैदा करो और यहीं की नागरिकता ले लो।" क्यों? क्योंकि उन्हें समझ आ गया है कि बिना इंसानों के न तो फैक्ट्रियां चलेंगी और न ही देश! आप सोच रहे होंगे, "अरे, वो सब तो विदेशी हैं, अपना भारत तो दुनिया का सबसे युवा देश है! हमारी आबादी तो 140 करोड़ पार कर गई है।"
यही तो सबसे बड़ा भ्रम है! जिस 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' पर हम छाती चौड़ी करते हैं, उसकी एक्सपायरी डेट आ चुकी है। ताज़ा 'सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम' और नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के डेटा के अनुसार भारत का नेशनल TFR गिरकर 1.9 से 2.0 पर आ चुका है। यानी हम भी 'रिप्लेसमेंट लेवल' 2.1 से नीचे जा चुके हैं! और भारत के भीतर एक और खतरनाक बंटवारा हो चुका है, जिसे द नॉर्थ-साउथ डिवाइड कहते हैं। एक तरफ उत्तर भारत के राज्य हैं, जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार, जहां औसतन जन्मदर अभी भी 2.4 के ऊपर है। यहां युवाओं की भारी भीड़ है और रोजगार की कमी एक बड़ा संकट है। दूसरी तरफ दक्षिण भारत के राज्य हैं, जैसे केरल, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश, यहां जन्मदर गिरकर 1.5 से 1.7 के बीच आ चुकी है। इसका सीधा मतलब है कि दक्षिण में तेजी से आबादी बूढ़ी हो रही है और वर्कफोर्स की भारी कमी पैदा हो गई है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले 15 से 20 सालों में दक्षिण भारत पूरी तरह यूरोप और जापान की तरह बूढ़ा हो जाएगा।
यही कारण है कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को हजारों रुपये का लालच देना पड़ रहा है। दक्षिण के नेताओं को दो बड़े डर सता रहे हैं। पहला डर है आर्थिक, अगर युवा नहीं होंगे तो हमारी फैक्ट्रियों और आईटी कंपनियों में काम कौन करेगा? उत्तर भारत से आ रहे प्रवासियों पर निर्भरता बढ़ेगी, जिससे स्थानीय राजनीति गर्माएगी। दूसरा सबसे बड़ा डर है राजनैतिक, यानी परिसीमन का डर। 2026 के बाद लोकसभा सीटों का परिसीमन, यानी Delimitation होना है। जिस राज्य की आबादी कम होगी, संसद में उसकी सीटें कम हो जाएंगी। मतलब आबादी घटाकर इन राज्यों ने जो अच्छा काम किया, उसी की सजा इन्हें राजनैतिक पावर खोकर भुगतनी पड़ेगी! लेकिन भारत की समस्या सिर्फ 'कम होती आबादी' नहीं है। भारत के सामने एक ऐसा संकट खड़ा है, जिसने हमारी नेशनल सिक्युरिटी की जड़ें हिला दी हैं। और वो संकट है अस्वाभाविक जनसांख्यिकीय बदलाव, यानी अंग्रेजी में बोलें तो अननेचुरल डेमोग्राफिक चेंज। दुनियाभर में यह पैटर्न देखा जा रहा है कि एक तरफ हिंदू और ईसाइयों की जन्मदर में भारी गिरावट आ रही है, तो दूसरी तरफ मुस्लिम आबादी की जन्मदर अपेक्षाकृत अधिक है। इसके अलावा घुसपैठ इस आग में घी का काम कर रही है। इसी खतरे को भांपते हुए मई 2026 में भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। इस अननेचुरल डेमोग्राफिक चेंज को रोकने के लिए भारत सरकार ने 'डेमोग्राफिक चेंज पर हाई-लेवल कमिटी' का गठन किया है।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर केंद्र सरकार को इतनी बड़ी कमेटी क्यों बनानी पड़ी? क्योंकि भारत के सीमावर्ती राज्यों जैसे असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और झारखंड के आदिवासी इलाकों में डेमोग्राफी पूरी तरह से पलट चुकी है। बांग्लादेश और म्यांमार से हो रही घुसपैठ ने कई जिलों का भूगोल और समाज पूरी तरह बदल दिया है। यहां दूसरे देशों से आकर मुस्लिम बस रहे हैं, जो आदिवासियों की जमीनें हड़प रहे हैं और यहां का सदियों पुराना सामाजिक ढांचा चरमरा रहा है। कमेटी को खास तौर पर यह काम सौंपा गया है कि वो देश के उन हिस्सों की पहचान करे, जहां धार्मिक और सामाजिक समुदायों की आबादी 'असामान्य' रूप से बदल रही है। यह कोई छोटी बात नहीं है! जब किसी एक इलाके की डेमोग्राफी अचानक बदलती है, तो वहां दंगे, जमीन के झगड़े और अलगाववाद पैदा होता है। सरकार अब इस खतरे से निपटने के लिए एक सख्त नीति और कानून लाने की तैयारी कर रही है।
अब मान लीजिए कि हम यूं ही आबादी घटाते रहे, तो क्या दुनिया स्वर्ग बन जाएगी? क्या ट्रैफिक जाम खत्म हो जाएंगे? बिल्कुल नहीं! एक घटती हुई आबादी का आर्थिक प्रभाव परमाणु बम से ज्यादा खतरनाक होता है। आज की पूंजीवादी व्यवस्था बढ़ती आबादी पर टिकी है। लोग पैदा होते हैं, तो वो घर खरीदते हैं, गाड़ियां खरीदते हैं, फोन खरीदते हैं। जब लोग ही नहीं होंगे, तो कंपनियां सामान किसे बेचेंगी? रियल एस्टेट मार्केट धड़ाम से गिर जाएगा, दुनिया की ग्रोथ जीरो हो जाएगी। आज भारत में औसतन 4 से 5 काम करने वाले युवा मिलकर 1 बुजुर्ग की पेंशन का भार उठाते हैं। 2050 आते-आते, जब भारत बूढ़ा हो जाएगा, तो सिर्फ 1 या 2 युवाओं पर 3 बुजुर्गों को पालने की जिम्मेदारी होगी। सरकारों को टैक्स बढ़ाना पड़ेगा, और युवा इस भारी टैक्स के बोझ तले पिस जाएंगे। एक जवान देश रिस्क लेता है, नई तकनीक बनाता है। जबकि एक बूढ़ा देश सिर्फ अपनी बची-खुची पूंजी को बचाने में लगा रहता है।
तो लब्बोलुआब यह है दोस्तों, कि इंसानियत इस वक्त एक दोधारी तलवार पर चल रही है। एक तरफ दुनिया सिकुड़ रही है और सरकारें लोगों को बच्चे पैदा करने के लिए करोड़ों रुपये का लालच दे रही हैं। दूसरी तरफ भारत जैसे देशों में डेमोग्राफी का ऐसा 'अननेचुरल' बदलाव हो रहा है जो कल को भयंकर टकराव का कारण बन सकता है। हम ना तो 'जनसंख्या विस्फोट' झेल सकते हैं और ना ही 'डेमोग्राफिक विंटर'! हमें जरूरत है एक बैलेंस की। क्या आंध्र प्रदेश की तरह 'तीसरे बच्चे पर कैश' देने की नीति पूरे भारत में लागू होनी चाहिए? या फिर घुसपैठ, लेकिन असामान्य जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए पूरे देश में एक सख्त कानून आना चाहिए? क्योंकि जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक दुनिया की डेमोग्राफी और बदल चुकी होगी।
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