'मंदिर में 200 करोड़ का डाका!'


रात के करीब ग्यारह बज रहे थे। अयोध्या में रामलला के मंदिर की प्राचीरों पर दीपों की रोशनी थिरक रही थी। भक्त जा चुके थे, शंख की आवाज थम चुकी थी, लेकिन मंदिर के उस बंद कमरे में जहाँ दिनभर के चढ़ावे की गिनती होती थी, एक आदमी ने नजरें इधर-उधर घुमाईं, कैमरे का ब्लाइंड स्पॉट देखा और नोटों की एक गड्डी अपने जूते के तले में दबा ली। यह उस रात की सातवीं चोरी थी। और यह पहली रात नहीं थी। 7 जून 2026 की सुबह आरोप लगाया कि राम मंदिर के दानपात्रों से 7 से 7.5 करोड़ रुपये का गबन हुआ है। 23 जून को पीएमओ ने जांच के आदेश दिए और योगी सरकार ने एसआईटी गठित की।

एसआईटी की टीम ने सर्वर रूम खुलवाया और सीसीटीवी का डेटा खींचा। 27 अप्रैल से 5 जून 2026 के बीच के महज 40 दिनों के फुटेज ने पूरी टीम को हिलाकर रख दिया। फुटेज में गिनती करने वाले कर्मचारी नोटों की गड्डियाँ जेबों, कपड़ों और जूतों में छिपाते साफ नजर आए। 40 दिनों में 70 बार। और यह तो बचा हुआ सच था क्योंकि टिन्नू ने पहले ही 8 महीने पुराना सीसीटीवी डेटा डिलीट करवा दिया था। असली तस्वीर और भी काली थी। एक दृश्य में शख्स नोट जूते में दबाता है, दूसरे में शौचालय जाता है और पैसे छिपाकर लौटता है, तीसरे में मोजे में नोट भरता है। यह रामलला का पावन कक्ष था। एसआईटी की 20 पन्नों की रिपोर्ट ने खुलासा किया कि यह रैकेट दो से तीन साल से चल रहा था। यानी प्राण प्रतिष्ठा के दिन से ही, जिस दिन शंख फूँके जा रहे थे, उसी दिन से यह खेल शुरू हो गया था। 25 जून को एफआईआर दर्ज हुई और 26 जून की सुबह आठों आरोपी गिरफ्तार हो गए। दो करोड़ नकद, लग्जरी कार, तीन आईफोन, स्टील की टंकी में काली पन्नी में लिपटी नकदी और टिन्नू के घर से करोड़ों का सोना बरामद हुआ। उसी शाम महासचिव चंपत राय ने इस्तीफा दे दिया। जब यह सब चल रहा था, तब बाहर लाखों भक्त आँखें भरी हुईं, आखिरी नोट जेब से निकालकर दान पेटी में डाल रहे थे और भीतर उन्हीं नोटों को छूने वाले हाथ उन्हें जूतों में दबा रहे थे। यानी भूत बाहर नहीं था, भूत मंदिर के भीतर बैठा था।

राम मंदिर की लड़ाई 500 साल पुरानी है, जब आक्रांताओं ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बना दी थी। करीब 70 साल से आजाद भारत में राम मंदिर की लड़ाई कई अदालतों में चली। 22 जनवरी 2024 को वो दिन आया, जब रामलला को करीब 500 साल बाद पुन: भव्य मंदिर में विराजमान किया गया। भारत के करोड़ों हिंदुओं ने सदियों लंबी लड़ाई के बाद जब अपने आराध्य का मंदिर बनते देखा तो उन्होंने अपनी जेब का आखिरी रुपया भी उस पावन दरबार में समर्पित कर दिया, किसी बुजुर्ग माँ ने अपनी पेंशन से बचाए पैसे दान पेटी में डाले, किसी किसान ने खेत की उपज से कुछ निकालकर रामलला के लिए अर्पित किया, किसी मजदूर ने महीनों की मेहनत की कमाई से दस रुपये का नोट चढ़ाया, लेकिन उसी दान पेटी को खोलने वाले, उन्हीं नोटों को गिनने वाले, उन्हीं सिक्कों को छूने वाले लोग वो रुपये अपनी जेबों में ठूँस रहे थे, जूतों में दबा रहे थे, मोजों में छिपा रहे थे, शौचालय की छत पर रख रहे थे, और यह एक दिन नहीं दो दिन नहीं बल्कि केवल 40 दिनों में 70 बार हुआ। उस राम की महिमा देखिये, जिसने रामलला के खजाने में सेंध लगाई, जो मंदिर से जुड़ने से पहले कोई टेंपो चला रहा था, कोई स्कूल में पढ़ा रहा था, कोई गाड़ी ठीक कर रहा था, और जो मंदिर के चढ़ावे को हाथ लगाने के बाद करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन गया।

पहले समझिए इस पूरी साजिश का ढाँचा कैसा था। राम मंदिर में रोज आने वाले करोड़ों रुपये के चढ़ावे और नकदी की गिनती के लिए एक विशेष डोनेशन काउंटिंग यूनिट बनाई गई थी, इस काम के लिए एक आउटसोर्सिंग एजेंसी के जरिए संविदा पर कर्मचारी रखे गए थे, और इन्हीं कर्मचारियों ने मिलकर एक ऐसा सिंडिकेट बनाया, जिसने भगवान के घर को अपना एटीएम बना लिया। एसआईटी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के अनुसार 27 अप्रैल से 5 जून 2026 के बीच उपलब्ध सीसीटीवी फुटेज में लगभग 70 संदिग्ध घटनाएं सामने आईं, जिनमें गणनाकर्मी नोटों की गड्डियां और खुले नोट अपने कपड़ों, जेबों और जूतों में छिपाते दिखाई दिए, जांच दल का कहना है कि यह किसी एक दिन की घटना नहीं बल्कि लगातार दोहराया जाने वाला पैटर्न था। इन आरोपियों ने सबसे पहले गिनती कक्ष के उन कोनों की पहचान की जहाँ सीसीटीवी कैमरों की नजर नहीं पहुँचती थी, नोटों की गड्डियां गिनते समय वे बेहद शातिर तरीके से बड़ी नकदी को उन ब्लाइंड स्पॉट्स में सरका देते थे, सीसीटीवी कैमरों से बचकर निकाली गई नकदी को आरोपी अपने कपड़ों में छिपाकर अस्थायी रूप से शौचालय के भीतर छिपा देते थे और ड्यूटी खत्म होने के बाद या परिसर से बाहर जाने के बहाने वह नकदी धीरे-धीरे मंदिर परिसर से बाहर अपने ठिकानों तक पहुँचा देते थे।

अब एक-एक आरोपी की असली कहानी सुनिए। पहला नाम अविनाश शुक्ला का है, जो मंदिर से पहले एक साधारण प्राथमिक विद्यालय का शिक्षक था जिसकी आय बेहद सीमित थी। मंदिर में कैश मिलान की जिम्मेदारी मिली और फिर पुलिस ने इसके घर से 20 लाख रुपये से अधिक की नकदी, विदेशी मुद्रा, सोने के जेवरात और सबसे हैरान करने वाली बात यह कि "रामराज्य कोष" लिखा एक फर्जी डोनेशन बॉक्स भी बरामद हुआ, जिसमें क्यूआर कोड भी था, यानी एक तरफ रामलला के नाम से चढ़ावा चुराओ और दूसरी तरफ रामलला के नाम से खुद का डोनेशन बॉक्स भी चलाओ। पूछताछ के दौरान जब अविनाश को पिछले 45 दिनों की सीसीटीवी फुटेज दिखाई गई तो वह टूट गया और उसने चढ़ावे से लगातार चोरी करने की बात स्वीकार कर ली, उसने बताया कि चोरी के पैसों से कार खरीदी, गांव में घर बनवाया और भाई को भी बड़ी रकम दी।

दूसरा नाम रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू है। मंदिर से पहले उसके पिता नया घाट पर चाय बेचते थे और टिन्नू टेंपो और ऑटो चलाता था। राम मंदिर निर्माण शुरू हुआ तब ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का निजी ड्राइवर बना। चंपत राय का भरोसा जीतकर वह मंदिर प्रशासन और वीआईपी मैनेजमेंट का मुख्य चेहरा बन गया। इस रसूख के कारण उसके पास काउंटिंग रूम और दान पेटियों की चाबियों तक अनधिकृत पहुँच हो गई। राम मंदिर के खजाने में चोरी का मामला उजागर होने के बाद 13 जून 2026 को टिन्नू के पैतृक आवास पर छापेमारी में भारी मात्रा में शुद्ध सोना जब्त किया गया। जांच में पता चला कि उसके पास अयोध्या और लखनऊ में करीब 50 करोड़ रुपये से अधिक की बेनामी संपत्तियां हैं। अयोध्या अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास उसका 70 कमरों वाला छात्रावास है। बस्ती जिले में 20 से 22 बीघा खेती की जमीन खरीदी और देवरिया जिले में भी करोड़ों की बेनामी संपत्ति का दावा है। और इससे भी बड़ा खुलासा यह कि 2021 में ही एक व्यक्ति ने हेराफेरी की शिकायत चंपत राय से की थी, लेकिन शिकायत करने वाले को ही गिनती के काम से हटा दिया गया और उसके बाद टिन्नू ने करीब 8 महीने पुराने सीसीटीवी फुटेज डिलीट करवा दिए।

तीसरा नाम अनुकल्प मिश्रा का है, जो महज 15,000 रुपये महीने की नौकरी करता था, लेकिन पुलिस ने उसके पास से 16.8 लाख रुपये नगद बरामद किए। जांच में सामने आया कि उसने 65 लाख रुपये का आलीशान मकान बनवाया, एक फार्महाउस है, एक प्रीमियम मोटरसाइकिल है और एक महंगी एसयूवी भी बुक करा रखी थी। चौथा नाम लवकुश मिश्रा का है, जो पहले ऑटोमोबाइल मैकेनिक था और मुश्किल से 10 से 12 हजार रुपये महीना कमाता था। काउंटिंग टीम में आने के बाद उसके पास से 14.25 लाख रुपये की नगद राशि बरामद हुई। पाँचवाँ नाम करुणेश पांडेय का है, जो दान पेटी खोलने वाला संविदा कर्मचारी था। उसके ठिकानों से 18 लाख रुपये से अधिक की नगद राशि बरामद हुई। छठा नाम रमाशंकर मिश्रा का है, जिससे 7.3 लाख रुपये मिले। सातवाँ नाम मनीष यादव का है, जो टिन्नू यादव का भतीजा है और जिसे सिफारिश से 15 अप्रैल 2026 को काउंटिंग रूम में घुसाया गया था, और आठवाँ नाम सुभाष चंद्र श्रीवास्तव का है, जो सेवानिवृत्त बैंक मैनेजर था और जिसे बैंकिंग विशेषज्ञता के कारण गिनती की निगरानी के लिए रखा गया था। इसने चोरों को रोकने के बजाय अपनी देखरेख में इस कृत्य को बढ़ावा दिया।

रकम का बंटवारा अयोध्या के 14 कोसी परिक्रमा मार्ग पर भीखापुर के पास एक सुनसान बाग में किया जाता था। इनका एक ही मकसद था, दिन में रामलला का नाम लो और रात को उनके ही धन का बंटवारा करो।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह सब इतने दिनों तक कैसे चला? काउंटिंग कर्मियों के लिए जेब रहित वेशभूषा का प्रतिबंध लागू नहीं था, मोबाइल फोन रखने पर कोई पाबंदी नहीं थी, हुंडीवार गणना का कोई अलग लेखा-जोखा नहीं था। बायोमैट्रिक अटेंडेंस तक नहीं थी, और ट्रस्ट के प्रतिनिधि डॉ. अनिल मिश्रा जो वित्तीय मामलों के मुख्य जिम्मेदार थे, उन्हें कर्मचारियों की तलाशी न होने की पूरी जानकारी थी, फिर भी उन्होंने कोई लिखित आदेश जारी नहीं कराया।

25 जून को एसआईटी की अंतरिम रिपोर्ट आने और राम जन्मभूमि थाने में एफआईआर दर्ज होने के बाद महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया जिसे ट्रस्ट ने स्वीकार कर लिया, उनकी जगह 74 वर्षीय पूर्व आईएफएस अधिकारी और वरिष्ठ आरएसएस पदाधिकारी कृष्ण मोहन को कार्यवाहक महासचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पुलिस ने आरोपियों से 79 लाख 85 हजार 493 रुपये की नकदी बरामद की है। पाँच मुख्य संदिग्धों से करीब दो करोड़ रुपये नगद, एक लग्जरी कार और तीन आईफोन बरामद हुए, और आशंका जताई जा रही है कि गबन की गई कुल राशि, सोना-चांदी और भक्तों द्वारा चढ़ाए गए आभूषणों का वास्तविक आंकड़ा 200 करोड़ रुपये तक हो सकता है, हालाँकि आधिकारिक पुष्टि अभी लंबित है।

यह घटना इस बात की सबसे बड़ी सीख है कि भगवान के घर में सुरक्षा केवल बाहरी दुश्मनों से नहीं बल्कि भीतर छिपे विभीषणों से भी करनी होगी। अब समय आ गया है कि पूरे वित्तीय प्रबंधन को पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और अभेद्य बनाया जाए ताकि फिर कभी कोई आस्था के इस खजाने पर डाका डालने का दुस्साहस न कर सके।

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