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RPSC को भंग कर भाजपा सरकार तीन साल पुराना वादा निभाएगी


राजस्थान हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एसआई भर्ती परीक्षा 2021 को रद्द कर हिस्ट्री लिख दी। पांच साल पहले 859 पदों के लिए हुई इस परीक्षा के पेपर 15 से 20 लाख रुपये में बेचे गए, यानी पेपर खरीदने—बेचने के लिए करोड़ों का लेनदेन हुआ। एसओजी द्वारा पकड़े गए RPSC सदस्य बाबूलाल कटारा ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने अपने परिजनों को नकल कराई थी, यानी रियलीटी में देखा जाए तो एक्जाम से पहले ही पेपर लीक हो चुका था। लंबे समय से पेपर लीक और इंटरव्यू में लेनदेन के आरोपों से घिरी RPSC को कोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। 

हाईकोर्ट के डिसीजन से एक बार फिर आरपीएससी को भंग करने की मांग जोर पकड़ने लगी है। हालांकि, एक बार फिर विपक्ष मौन साधकर सरकार के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। लेकिन सवाल यह है कि जो भाजपा अपॉजिशन में बैठकर इस संस्था को भंग करने की डिमांड करती थी, वो पॉवर में आते ही चुप क्यों हो गई? भाजपा को सत्ता मिलते ही वो आवाज कहां गायब हो गई, जो सत्ता में आते ही आरपीएससी भंग करने का दम भरा करती थी?

अब कोर्ट का इतना बड़ा डिसीजन आया है तो उम्मीद है कि सत्ताधारी भाजपा सरकार भी आरपीएससी को भंग करने पर गंभीरता से विचार कर रही होगी। इन चीजों को आगे डिटैल से समझेंगे, लेकिन अभी पहले एक बार शॉर्ट में RPSC को ही समझते हैं। आरपीएससी का गठन 16 अगस्त 1949 को एक अध्यादेश जारी कर किया गया था। संविधान के भाग-14 में आर्टिकल 315 से 323 तक राज्य लोक सेवा आयोग की संरचना, कार्यकाल, सेवा शर्तें और शक्तियों के बारे में प्रावधान दिया गया है। RPSC के चैयरमेन और मैम्बर्स का अपॉइंटमेंट स्टेट के गवर्नर द्वारा किया जाता है, लेकिन उन्हें पद से हटाने का अधिकार केवल प्रेसिडेंट को है। 

एक सदस्य छह साल की अवधि या 62 वर्ष की आयु में से जो भी पहले हो, तब तक पद पर रह सकता है। कमीशन के आधे सदस्यों को भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन कम से कम 10 वर्ष काम करने का अनुभव होना कंप्लसरी है। संविधान में सदस्यों की संख्या और योग्यता का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, ये सब राज्यपाल के विवेक पर छोड़ा गया है। अधिकारिक रूप से RPSC में 1 अध्यक्ष और 10 सदस्य होने चाहिए। बाबूलाल कटारा पेपर लीक के कारण जेल में है, कुमार विश्वास की पत्नी मंजू शर्मा और एक्स चीफ सेक्रेटरी निरंजन आर्य की पत्नी संगीता आर्य ने हाईकोर्ट की एकलपीठ के फैसले के बाद जांच और गिरफ्तारी के डर से इस्तीफा दिया था, जबकि एक अन्य सदस्य जसवंत राठी का निधन होने के कारण वर्तमान में एक चैयरमेन और 6 मैम्बर हैं।

विपक्ष में रहते भाजपा से लेकर हनुमान बेनीवाल, सचिन पायलट और किरोडीलाल मीणा ने आरपीएससी भंग करने की बात की। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार RPSC भंग कर सकती है? एक्चुएल यह है कि स्टेट गवर्नमेंट को आरपीएससी भंग करने का अधिकार है ही नहीं। RPSC एक संवैधानिक संस्था है, इसके चैयरमेन या किसी मैम्बर को भारत का राष्ट्रपति हटा सकता है। जबकि संविधान के आर्टिकल 317(2) के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की जाँच के दौरान राज्यपाल द्वारा आरोपी अध्यक्ष या सदस्य को निलम्बित किया जा सकता है। यानी राज्य सरकार सीधे RPSC भंग नहीं कर सकती, इसके लिए संविधान संशोधन या केंद्र सरकार की मंशा ज़रूरी है।

फिर सवाल यह उठता है कि ये सब चीजें पता होने के बावजूद विपक्ष में रहते भाजपा ने आरपीएससी को भंग करने का झूठा वादा क्यों किया? विपक्ष में रहते बीजेपी ने बड़े जोर-शोर से कहा था कि सत्ता मिलते ही RPSC भंग करेंगे और 17 भर्ती परीक्षाओं की जांच CBI से करवाएंगे। यही डिमांड कांग्रेस के भीतर से सचिन पायलट ने भी की थी। चार महीनों तक जयपुर में धरना देकर हनुमान बेनीवाल ने भी आरपीएससी भंग कर नई संस्था गठन की मांग की। सांसद रहते किरोड़ीलाल मीणा ने भी यही आवाज उठाई थी। इसलिए प्रदेश की जनता ने मान लिया था कि भाजपा सत्ता में आई तो इस बार आरपीएससी में बदलाव होगा।

बड़े—बड़े वादों और कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार की विफलताओं के चलते दिसंबर 2023 में बीजेपी सत्ता में आई। आज भाजपा सरकार बने 29 महीने बीत चुके हैं, लेकिन RPSC ज्यों की त्यों खड़ी है। 17 भर्तियों की CBI जांच का कोई नाम-निशान नहीं। अशोक गहलोत सरकार में गरजने वाले सचिन पायलट आज विपक्ष में होने के बाद भी राजस्थान का कोई मुद्दा नहीं उठाते, वो शायद बड़े नेता राहुल गांधी के साथ दिल्ली की राजनीति में व्यस्त हैं। किरोड़ीलाल मीणा अब मंत्री हैं, उन्हें सत्ता का स्वाद मिल गया है तो संभवत: सत्ता के नशे में RPSC को भूल चुके हैं। हनुमान बेनीवाल आज भी अकेले ही RPSC भंग करने और UPSC की तर्ज पर नई पारदर्शी संस्था बनाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।

यही राजस्थान की राजनीति का सबसे बड़ा दोगलापन है। जो मांग विपक्ष में होती है, वो सत्ता में आते ही गायब हो जाती है। बीजेपी ने विपक्ष में रहते RPSC भंग करने का वादा किया था, लेकिन अब वही RPSC राजा हरिश्चंद्र का शासन बनकर काम कर रही है, उसी पुराने ढर्रे पर काम कर रही है, तमाम भर्ती परीक्षाएं करवा रही है और इंटरव्यू भी ले रही है।

अब असली सवाल यह है कि क्या RPSC की जगह नई पारदर्शी संस्था बन सकती है? UPSC की तरह काम करने वाली कोई संस्था राज्य सरकार या केंद्र सरकार द्वारा बनाई जा सकती है? तकनीकी रूप से इसका जवाब हां है। राज्य सरकार RPSC के ढांचे में बदलाव के लिए विधानसभा में कानून ला सकती है। सदस्यों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जा सकती है, जैसे लोकायुक्त की तर्ज पर एक स्वतंत्र समिति का गठन हो, जो राज्यपाल को नाम recommend करे। परीक्षाओं का डिजिटलाइजेशन और real-time monitoring हो तो काफी कुछ बदल सकता है। लेकिन यह सब करने की इच्छाशक्ति भी होनी चाहिए, जो विपक्ष में खूब दिखती है और सत्ता में आते ही हर पार्टी की लापता हो जाती है।

SI भर्ती 2021 के रद्द होने से राजस्थान के हज़ारों युवाओं का सपना एक बार फिर टूटा है, जिन्होंने सालों मेहनत की, लाखों रुपये कोचिंग पर खर्च किए, उनको कोई जवाब देने वाला नहीं है। RPSC में जिस सदस्य बाबूलाल कटारा ने घपले की बात मानी, उसके खिलाफ जेल जाने के अलावा क्या कार्रवाई हुई? आज तक उसे बर्खास्त तक नहीं किया गया, कटारा आज भी केवल सस्पेंड है। बीजेपी सरकार के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं है। राजस्थान की जनता यह जानना चाहती है कि क्या RPSC का सुधार होगा या यह संस्था भ्रष्टाचार की पाठशाला बनी रहेगी। भाजपा के पास आज सत्ता है, केंद्र में भी भाजपा की सरकार है, अगर सही नीयत होती तो अब तक रास्ता निकल चुका होता, लेकिन चुनाव में वादे सिर्फ इलेक्शन जीतने के लिए होते हैं, सुधार के लिए नहीं, तो RPSC जैसी संस्थाएं यूं ही खड़ी रहती हैं और सरेआम, बहुत ही बेशर्मी से युवाओं के सपने तोड़ती रहती हैं।

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