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नायक सिर्फ़ फ़िल्म में नहीं होते


27 मार्च 2026 की दोपहर के 12 बजकर 34 मिनट। ज्योतिषियों ने यही समय शुभ बताया था। नेपाल के राष्ट्रपति भवन में एक 36 साल का रैपर-इंजीनियर देश के सबसे युवा निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ले रहा था। बालेंद्र शाह, जिन्हें लोग "बालेन" कहते हैं, कभी हिप-हॉप के मंच पर रहे, फिर काठमांडू के मेयर बने, और अब नेपाल की सत्ता की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठे थे। यह फ़िल्म "नायक" का वो दृश्य था जो असल ज़िंदगी में साकार हो रहा था।

लेकिन आगे बढ़ने से पहले नायक के इस दृष्य की पृष्ठभूमि समझनी ज़रूरी है। 2025 में नेपाल की Gen Z पीढ़ी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ और तत्कालीन PM KP Sharma Oli की सरकार के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरी। उस आंदोलन में कम से कम 77 युवा मारे गए और 700 घायल हुए। संसद भवन में आग लगा दी गई, मंत्रियों के घर फूंक दिए गए और पीएम Oli को हेलीकॉप्टर से बचाकर निकालना पड़ा। इस आंदोलन ने नेपाल के एक पूरे राजनीतिक युग को राख कर दिया। इसके बाद पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया, जिन्होंने पिछले महीने चुनाव कराए। इस चुनाव में बालेन शाह की पार्टी RSP को 182 सीटें मिलीं और बालेन ने पूर्व पीएम Oli को बालेन ने उन्हीं की सीट पर हरा दिया।

इस प्रचंड़ जीत से प्रधानमंत्री बने बालेन शाह की शपथ के 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि नई सरकार ने अपने वादों के मुताबिक पहला वार किया। Gen Z आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर गोली चलवाने के आरोप में पूर्व PM Oli और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक को उनके घरों से गिरफ़्तार कर लिया गया। नए गृहमंत्री सुदान गुरुंग, जो ख़ुद Gen Z आंदोलन से उभरे युवा नेता हैं, उसी शाम पुलिस हेडक्वार्टर जा पहुंचे और अफ़सरों से कहा कि जब तक गिरफ़्तारी नहीं होती वे वहीं बैठे रहेंगे। और जब तक पुलिस ने ओली और लेखक को गिरफ्तार कर हथकड़ियों में नहीं देखा, तब तक सुदान गुरुंग वहीं बैठे रहे। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा "Promise is a promise: Nobody is above the law." यान वादा तो वादा ही होता है, कानून से उपर कोई नहीं है।

नेपाल में मनी लॉड्रिंग को खत्म करने के लिए 5 लाख से उपर के लेनदेन को बैंकिंग वैरिफिकेशन के दायरे में लाया गया है। दुनियाभर में रहने वाले नेपालियों को वोटिंग राइट देने का काम किया जाएगा, यानी एक तरह से नेपाल भी इस्राइल की तरह दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले नेपालियों को अपना नागरिक मानेगा। नेपाल में मुस्लिम घुसपैठ की बड़ी समस्या है, इसे रोकने के लिए घुसपैठ को सख्ती से रोकने का काम शुरू कर दिया है, इसमें कठोर सजा का प्रावधान किया जा रहा है। पांचवी कक्षा तक किसी भी स्टूडेंट की परीक्षा नहीं होगी, इससे बच्चों का बचपन बचा रहेगा और उसे सफलता के लिए मशीने बनाने की अंधी दौड़ में धकेलने से रोका जाएगा। स्कूलिंग और एग्जाम की अंधी दौड़ ने भारत में बच्चों का बचपन निलग रहा है, जिससे नेपाल ने बड़ी सीख ली है। 

नेपाल की इस सत्ता परिर्वतन की क्रांति से एक ज़रूरी सवाल उठता है। Gen Z आंदोलन श्रीलंका में भी हुआ, बांग्लादेश में भी हुआ। भयानक महंगाई के बाद 2022 में श्रीलंका में Gotabaya Rajapaksa की सरकार का तख़्तापलट हुआ और लोगों ने राष्ट्रपति भवन पर कब्ज़ा किया। 2024 में बांग्लादेश में Sheikh Hasina को देश छोड़कर भागना पड़ा, लेकिन दोनों जगह वही पुरानी व्यवस्था है। वही नौकरशाही, वही सरकारी ढाँचा, शासन का वही पुराना दर्रा, इन दोनों देशों में बदला तो सिर्फ़ नेताओं का नाम। नेपाल में फ़र्क़ यह है कि सत्ता में आई पीढ़ी ख़ुद वो पीढ़ी है, जिसने आंदोलन किया था और वह व्यवस्था को जड़ से बदलने की कोशिश कर रही है, न कि उस पर सवार होने की। तो नेपाल में सत्ता भी बदली, शासन भी और शासन का रूप भी पूरी तरह से बदल दिया गया।

बालेन शाह की पहली ही कैबिनेट बैठक में 100 बिंदुओं का शासन सुधार एजेंडा पास किया गया। भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई, डिजिटल सेवाएं, Gen Z आंदोलन के पीड़ितों को न्याय और नौकरशाही से राजनीति को अलग करने जैसे चार स्तंभों पर यह एजेंडा टिका था। बालेन शाह की सरकार ने 15 दिनों के भीतर एक ऐसी समिति बनाने का फ़ैसला किया जो 1990 के बाद सत्ता में रहे हर बड़े नेता और अधिकारी की संपत्ति की जाँच करेगी। सरकार ने एक झटके में 35 साल का हिसाब माँग लिया। 22 से अधिक केंद्रीय मंत्रालयों को 30 दिनों में घटाकर 17 करने का आदेश दिया गया। सरकारी दफ़्तरों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों से राजनीतिक संगठनों और छात्रसंघों को बाहर करने का फ़ैसला लिया गया। "Government Courier Service" के ज़रिए पासपोर्ट, नागरिकता प्रमाण पत्र और ड्राइविंग लाइसेंस घर पर डिलीवर करने के आदेश जारी कर दिए गए। निजी अस्पतालों में 10% बेड ग़रीबों के लिए मुफ़्त रखने का जो क़ानून पहले कभी लागू नहीं हुआ था, उसे सख़्ती से लागू करने का ऐलान किया गया।

भारत के पड़ोसी तीन देशों में जेन जी आंदोलन हुए और सत्ताएं बदली, लेकिन सही मायनों में केवल नेपाल में ही सत्ता का असली रूप बदला, तो नेपाल की नई व्यवस्था के बाद भारत में भी कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं, इसलिए उसी की तर्ज पर अब भारत की बात करते हैं। नेपाल जो कर रहा है वो भारत के लिए एक दर्पण है। भारत में भी सरकारी दफ़्तरों में पड़े लाखों लंबित जाँच आयोगों की रिपोर्टें धूल खा रही हैं, जो कभी लागू नहीं होतीं। भारत में भी छात्रसंघों और नौकरशाही में राजनीतिक दख़लंदाज़ी व्यवस्था को खोखला करती है। भारत में आईएएस और आईपीएस अधिकारी कहने को तो जनता के नौकर हैं, लेकिन इनका काम जनता के उपर राज करना है। इनकी व्यवस्था आज भी अंग्रेजी शासन वाली ही है। 

यानी आईएएस अधिकारी जिले का राजा है, एसपी जनता की रक्षा के बजाए उसे डराने का काम करता है। आम आदमी कलेक्टर या एसपी से मिलने नहीं दिया जाता, वो इनको देखकर भूत की तरह डरता है। आम आदमी को ऐसा माहौल दे दिया गया है कि जैसे कलेक्टर एसपी किसी दूसरी दुनिया के प्राणी हैं, और ये लोग सिर्फ हमारे उपर राज करने के लिए हैं, हमारे काम करने के लिए नहीं। इसी जनता के नौकर हैं, इसी आम आदमी के टैक्स से उनको तनख्वाह मिलती है, जिससे इनका घर और जीवन चलता है, लेकिन ये लोग इसी आम आदमी पर रौब झाड़कर राज करते हैं, काम बिलकुल नहीं करते हैं। काम तो केवल अपने आकाओं के करते हैं, जो या तो नेता हैं या पैसे वाले बड़े कारोबारी। 

नेपाल में पीएम और गृहमंत्री के लिए ट्रैफिक रोकने का काम बंद कर दिया गया है, लेकिन भारत में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री, न्यायाधीश जैसे वीवीआईपी लोगों के लिए सकडें जाम कर दी जाती हैं। आम आदमी कातर आखों से इस वीआईपी मूवमेंट को देखता रहता है, लेकिन उसके हाथ में इसे बदलने का कोई हथियार नहीं है। कहने को तो वोट देकर सरकार बदलने का अधिकारी आम आदमी को है, लेकिन सरकार बदलने से शासन नहीं बदलता और ये सब प्रोटोकॉल, नियम, कायदे संविधान का बनाया गया शासन—प्रशासन ही बनाता है। भारत में भी निजी अस्पताल ग़रीबों के लिए आरक्षित बेड का नियम है, लेकिन ये सिर्फ कागज़ पर ही हैं। Aadhaar और DigiLocker जैसी पहल के बावजूद डिजिटल सेवाओं के मामले में आम आदमी अभी भी सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटता है, अपनी वेदनाएं लेकर अधिकारियों के दरवाजों पर महीनों चक्कर काटता है। 

नेपाल का यह मॉडल बताता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो "सरकार आपके दरवाज़े पर" सिर्फ़ नारा नहीं, हक़ीक़त बन सकता है। दुर्भाग्य यह है कि भारत में आज भी ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी, रूस और दक्षिण अफ्रीका से लिया गया उधार का संविधान चल रहा है। कहने को तो आजाद हुए 78 साल हो चुके हैं, लेकिन भारत में आज भी, भारत की जनता, यहां की भौगोलिक स्थिति, आर्थिक हालात और आमजन की जरूरत के हिसाब से संविधान और कानून व्यवस्था का इंतजार किया जा रहा है। आप कमेंट करके बताइए कि भारत में क्या सुधार होना चाहिए, किस तरह परिवर्तन किया जाना चाहिए और किन जगहों पर सुधार की सख्त जरूरत है।

ऐसा नहीं है कि नेपाल में जो अचानक हुआ है, वो सबकुछ ठीक है। हो सकता है यह नई व्यवस्था अच्छी साबित हो जाए और नेपाल आने वाले कुछ ही बरसों में विकसित देश बन जाए, लेकिन इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। ताबड़तोड़ फ़ैसलों की अपनी क़ीमत होती है। नेपाल की शासन की समस्या कभी योजनाओं की कमी नहीं रही। पुराने सरकारी सचिवों का कहना है नौकरशाही प्रतिरोध, क़ानूनी अड़चनें और कमज़ोर निगरानी ने हर सुधार को मझधार में छोड़ा है। केपी शर्मा Oli और रमेश Lekhak की गिरफ़्तारी के बाद सुप्रीम कोर्ट के दखल से मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त आधार न होने के कारण दोनों को रिहा करना पड़ा। यानी जोश में उठाए गए क़दम क़ानूनी ज़मीन पर लड़खड़ा सकते हैं। 

विशेषज्ञों को चिंता है प्रधानमंत्री कार्यालय पर अत्यधिक केंद्रीकरण से निर्णय प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है और मंत्रालयों में जवाबदेही की बजाय निर्भरता बढ़ सकती है। छात्रसंघ हटाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ 14 राजनीतिक संगठन एक साथ सड़क पर आ गए। विपक्ष पहले से ही इसे "बदले की राजनीति" बता रहा है। इस बीच सबसे बड़ा ख़तरा यह है कि अगर 100 दिनों में वादे पूरे न हुए तो जो Gen Z जनता उसे सत्ता में लाई, वही उससे भी हिसाब माँग सकती है। नेपाल की इस कहानी का सबक़ एक ही है, नायक बनना आसान है, लेकिन नायक बने रहना बहुत मुश्किल है। इसलिए नेपाल समेत दुनिया का पूरा जेन—जी देख रहा है कि ये नेता आज जैसे ही बने रहेंगे, या धीरे—धीरे वीआईपी ट्रीटमेंट के आदी बनकर पुराने डर्रे को आत्मसात कर लेंगे। नेपाल की इस नई व्यवस्था पर आपकी क्या राय है, कमेंट करके जरूर बताएं।

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