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अशोक गहलोत इतना बड़ा झूठ कैसे बोल लेते हैं?


भारतीय राजनीति में एक शब्द बहुत चलता है "वंशवाद", अथवा परिवारवाद। हर पार्टी दूसरे पर यह आरोप लगाती है, लेकिन आज हम बात करेंगे एक ऐसे नेता की, जो खुद वंशवाद के खिलाफ सबसे ऊँची आवाज़ में बोलते हैं और जिनके अपने घर में वंशवाद की सबसे मज़बूत जड़ें हैं। यह नेता हैं राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जिन्होंने हाल ही में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और उनके मंत्रियों को अपने बेटों को सत्ता से दूर रखने की सलाह दी है और अपने दूसरे बयान में कहा है कि उन्होंने कभी भी अपने बेटे वैभव गहलोत को सत्ता के करीब नहीं आने दिया और खुद के सीएम रहते बेटे को पांच साल तक किराए के मकान में रखा। 

इससे पहले की इस बयान का पोस्टमोर्टम करें, उससे पहले गहलोत साहब की राजनीतिक ताक़त को समझते हैं। अशोक गहलोत तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे। उससे पहले इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरसिम्हा राव की सरकारों में मंत्री रहे और तीन बार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे। इस दौरान पाँच बार जोधपुर से सांसद चुने गए। 1999 से अब तक लगातार 6 बार से जोधपुर की सरदारपुरा सीट से विधायक हैं। गहलोत राजस्थान की राजनीति में पाँच दशक से सक्रिय हैं। यानी अशोक गहलोत सिर्फ एक नेता नहीं, वो एक पॉलिटिकल institution हैं। लेकिन इसी institution के भीतर एक ऐसी कहानी चलती है जो राजस्थान की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल बन चुकी है, और वो सवाल है उनके सुपुत्र वैभव गहलोत।

वैभव गहलोत केवल अशोक गहलोत के बेटे नहीं हैं। वैभव 2019 में जोधपुर से लोकसभा चुनाव लड़े, करोड़ों रुपये खर्च हुए, बड़ी रैलियां हुईं, कांग्रेस के बड़े नेता और कांग्रेस की पूरी सरकार जोधपुर में लगी रही, लेकिन फिर भी बुरी तरह से चुनाव हारे। और संयोग देखिए, यह वही जोधपुर सीट थी, जहाँ से उनके पिता अशोक गहलोत 5 बार सांसद रह चुके थे। चुनाव हारने के कुछ महीने बाद क्या हुआ? अक्टूबर 2019 में वैभव गहलोत Rajasthan Cricket Association के अध्यक्ष बन गए। तब राजस्थान में अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे। अशोक गहलोत ने दावा किया कि आरसीए के चुनाव में उनकी कोई भूमिका नहीं थी, तो गहलोत साहब यह बताओ कि आपकी ही पार्टी के बड़े नेता रामेश्वर डूडी को हार क्यों मिली? क्या वैभव गहलोत का राजनीतिक वैभव इतना था कि रामेश्वर डूडी जैसे नेता को आरसीए का चुनाव हरा दे? नहीं, बिलकुल भी नहीं।

RCA चुनाव में वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामेश्वर डूडी का नामांकन तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया गया। डूडी एक मज़बूत दावेदार थे। उनके बाहर होने के बाद वैभव गहलोत का रास्ता साफ हो गया। तब सीपी जोशी आरसीए के अध्यक्ष थे और विधानसभा अध्यक्ष उनको अशोक गहलोत ने बना दिया था। तो जो तकनीकी आधार पर रामेश्वर डूडी का नामांकन खारिज किया गया था, वो तकनीक सबको पता है कि क्या थी और कहां से संचालित हो रही थी। BJP के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ ने सीधा आरोप लगाया था कि "गहलोत पुत्र-मोह में इतने अंधे हो गए कि कई योग्य नेताओं को किनारे कर दिया।" इसके बाद दिसंबर 2022 में जब RCA चुनाव हुए तो वैभव गहलोत दूसरी बार RCA अध्यक्ष बने, और इस बार निर्विरोध चुने गए, यानी तमाम चुनौती समाप्त कर दी गई। वैभव का वैभव इतना था कि 2019 में लोकसभा का चुनाव हारे, और RCA की अध्यक्ष की सीट मिली। 2022 में फिर RCA अध्यक्ष बने। विश्लेषकों ने साफ लिखा है, यह अशोक Gehlot का अपने बेटे को electoral defeat के बावजूद public profile बनाए रखने का तरीका था।

फिर भाजपा की भजनलाल सरकार आने के बाद फरवरी 2024 में Rajasthan State Sports Council ने SMS Stadium और RCA office को dues न चुकाने के कारण seal कर दिया। इसके बाद no-confidence motion आया और वैभव गहलोत को RCA अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस बार उन अशोक गहलोत का दिल दुखा जो कभी अपने बेटे को सपोर्ट नहीं करने का दावा करते हैं और उन्होंने बयान दिया, "यह राजनीति हो रही है, मेरे बेटे को target किया जा रहा है।" और 2024 के लोकसभा चुनाव में क्या हुआ? वैभव को जालौर सीट से टिकट मिला, अशोक गहलोत और पूरी कांग्रेस की जान लगाने के बाद भी लगातार दूसरी बार बुरी तरह से हारे। पांच साल पहले टिकट मिला, हारे और 2024 में टिकट मिला, लेकिन फिर हारे, यानी दोनों चुनावों में करोड़ों—करोड़ रुपये फूंकने के बाद भी वैभव गहलोत अपने पिता अशोक गहलोत का वैभव नहीं बचा पाए। इसपर राजेंद्र राठौड़ ने कहा "अशोक गहलोत ने बेटे को आगे बढ़ाया, और जनता ने दो बार नकार दिया।"

अब यहाँ एक सवाल उठता है जो हर राजस्थानी के मन में है। क्या यह महज़ संयोग है कि 2019 में लोकसभा हारने के ठीक बाद वैभव RCA अध्यक्ष बने, जब उनके पिता मुख्यमंत्री थे? क्या यह संयोग है कि RCA चुनाव में वरिष्ठ नेता रामेश्वर डूडी का नामांकन रद्द हुआ और वैभव निर्विरोध जीते? क्या यह संयोग है कि 2019 में जोधपुर और 2024 में जालौर, दोनों बार परिवार के प्रभाव वाले क्षेत्रों से ही टिकट मिला? यह सवाल इसलिए और भी ज़रूरी हो जाते हैं, क्योंकि अशोक गहलोत खुद कांग्रेस के भीतर और बाहर वंशवाद और परिवारवाद के खिलाफ बोलते रहे हैं। Outlook India ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि 'वैभव का RCA में प्रवेश एक ऐसे move के रूप में देखा गया जो senior Gehlot ने अपने बेटे की public profile बनाए रखने के लिए किया।'

यहाँ एक बात और जोड़नी ज़रूरी है। RCA एक ऐसी संस्था है जो राजस्थान में cricket को promote करती है। हर साल इसका 70—80 करोड़ से अधिक का बजट होता है, उसको आरसीए अध्यक्ष और सहयोगी खर्च करते हैं, यानी 20 फीसदी कमीशन भी मान लें तो आरसीए अध्यक्ष को करीब 15 से 20 करोड़ की कमाई हर साल होती ही है। इसके अलावा अन्य कमाई के रास्ते खुले होते हैं, जो अलग हैं। आरसीए के पास stadiums हैं, IPL matches हैं, युवा cricketers का भविष्य है। जब कोई नेता का बेटा political setback के बाद सीधे ऐसी संस्था का अध्यक्ष बन जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि cricket को राजनीतिक rehabilitation का माध्यम बनाया जा रहा है।

BJP ने एक बात और कही जो ध्यान देने योग्य है कि "यह विडंबना है कि गहलोत अब दूसरों को परिवारवाद न करने की सलाह देते हैं।" अशोक गहलोत राजस्थान की राजनीति के सबसे अनुभवी खिलाड़ी हैं। उनकी administrative capabilities को उनके समर्थक और विरोधी दोनों मानते हैं। लेकिन जब एक नेता अपने बेटे के लिए जनता की संस्थाओं का दरवाज़ा खोलता है, चाहे वो electoral politics हो या sports administration तो जनता को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि यह पिता का प्यार है या सार्वजनिक संसाधनों का निजी उपयोग? और ऐसे समय में अशोक गहलोत दावा करते हैं कि उन्होंने कभी भी वैभव को सपोर्ट नहीं किया, बल्कि पांच साल सीएम रहते बेटे को सीएमआर में रहने तक नहीं दिया, उसको किराए के मकान में रहना पड़ा, तब गहलोत का यह बयान किसी को पचता नहीं और कई गंभीर सवाल भी उठाता है। राजस्थान की जनता ने 2019 में और 2024 में वैभव गहलोत को अपना जवाब दे दिया। लेकिन सवाल अभी भी खड़ा है, क्या राजनीतिक परिवारों के बच्चों के लिए रास्ते बनाने की यह परंपरा कब खत्म होगी?


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