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RCA की सियासत पिच पर लहूलुहान होता IPL


राजस्थान क्रिकेट एसो​सिएशन की पिच पर इंडियन प्रिमियर लीग लहूलुहान होकर क्लिन बोल्ड हो गया है। यह पिच राजस्थान की सत्ता में बैठे राजनेताओं ने अपने बेटों के लिए बनाई थी, लेकिन बीच में आरसीए ने आईपीएल खेलने के लिए टीम बुला ली, जो न केवल क्लीन बोल्ड हो गई, बल्कि आईपीएल के पहले राउंड में बीसीसीआई भी लहूलुहान होकर गुहाहाटी चली गई। वैसे भी यह बात सही है कि जिस पिच पर नेताओं के बेटे खेलने चाहिए, वहां यदि खिलाड़ी खेलेंगे तो यही हाल होगा। अब तक की कहानी से आप समझ ही गए होंगे कि आज का Content मजेदार होने वाला है।

राजस्थान के स्पोर्ट्स में इन दिनों जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह किसी भी खेल प्रेमी के लिए चिंता का सब्लेक्ट होना चाहिए। विशेष रूप से तब, जब प्रदेश के खेल विभाग की कमान एथेंस ओलंपिक के रजत पदक विजेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़ जैसे दिग्गज खिलाड़ी के हाथ में हो। लेकिन विडंबना देखिए कि एक पेशेवर खिलाड़ी की लीडरशिप में भी राजस्थान का स्पोर्ट्स ए​डमिनिस्ट्रेशन सुधार की राह पकड़ने के बजाय पॉलिटिकल दांव-पेंच और अपनों को ओबलाइज करने की पुरानी बीमारी से ग्रस्त नजर आ रहा है। राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की वर्तमान स्थिति इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। राजस्थान में गर्वंमेंट बदलने के कुछ समय बाद फरवरी 2024 में जब एसएमएस स्टेडियम और आरसीए कार्यालय को सील किया गया था, तब इसे प्रशासन की शुद्धि और पारदर्शिता की दिशा में उठाया गया कदम बताया गया था। अशोक गहलोत के सुपुत्र वैभव गहलोत के रिजाइन करने के बाद खेल प्रेमियों को उम्मीद थी कि अब क्रिकेट का मैनेजमेंट नेताओं के ड्राइंग रूम से निकलकर फील्ड के पसीने तक पहुंचेगा। किंतु, पिछले दो वर्षों का घटनाक्रम कुछ और ही स्टोरी बयां कर रहा है।

एडहॉक कमेटी का अपॉइंटमेंट रेगुलेशन के अनुसार 3 महीने के भीतर चुनाव संपन्न कराने के लिए हुआ था, लेकिन इस कमेटी के वर्क टाइम को जिस तरह बार-बार विस्तार दिया जा रहा है, वह मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। पहले भाजपा नेता डीडी कुमावत और अब बीजेपी एमएलए जसवंत यादव के बेटे मोहित यादव को कंवीनर की जिम्मेदारी देना, यह स्पष्ट करता है कि क्रिकेट की पिच का इस्तेमाल आने वाली पीढ़ी के पॉलिटिकल 'लॉन्चिंग पैड' के रूप में किया जा रहा है। मोहित यादव के अपॉइंटमेंट ने उन आरोपों को और हवा दी है कि भाजपा भी उसी 'पुत्रमोह' की राह पर चल पड़ी है, जिसका वह कभी कांग्रेस के दौर में विरोध करती थी। चर्चाएं तो यहां तक हैं कि खुद खेलमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ से लेकर चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर, सांसद घनश्याम तिवाड़ी और पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ जैसे कद्दावर नेताओं के करीबियों और परिजनों की खेल प्रशासन में बढ़ती सक्रियता केवल खेल प्रेम के चलते नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीतिक बिसात बिछाने के लिए है। 

अजीब विरोधाभास है कि जिस राज्य में स्पोर्ट्स मिनिस्टर खुद एक ओलंपियन हों, वहां खेल बजट में 15% की वृद्धि के बावजूद जमीनी स्तर पर एथलीट्स आज भी बेसिक फैसेलिटीज के लिए तरस रहे हैं। क्रिकेट, जो बीसीसीआई के माध्यम से हजारों करोड़ के फंड से लबरेज है, सरकारी ऊर्जा का 90% हिस्सा सोख रहा है, जबकि आर्चरी, हॉकी और कबड्डी जैसे खेल, जिनमें राजस्थान का नेचुरल टेलेंट रहा है, ये सब उपेक्षा के शिकार हैं। प्रदेश में खेल प्रशिक्षकों के लगभग 40% पद खाली पड़े हैं और ग्रामीण क्षेत्रों की खेल अकादमियां महज सरकारी फाइलों में दौड़ रही हैं। सवाल यह उठता है कि क्या खेल मंत्री की प्राथमिकता केवल क्रिकेट के विवादों का निपटारा करना और नई एडहॉक कमेटियां बनाना है? अन्य खेलों के पास न तो आईपीएल जैसा ग्लैमर है और न ही बड़े प्रायोजक, वे पूरी तरह सरकार की दृष्टि पर निर्भर हैं। ऐसे में यदि खेल विभाग का पूरा तंत्र केवल क्रिकेट एसोसिएशन के राजनीतिक पुनर्गठन में उलझा रहेगा, तो राजस्थान के भावी ओलंपियनों का सपना कौन पूरा करेगा?

राजस्थान क्रिकेट प्रशासन में जारी यह अस्थिरता केवल पूर्ववर्ती सरकार की देन नहीं कही जा सकती। वर्तमान हस्तक्षेपों ने स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है। पेशेवर प्रबंधन के नाम पर राजनीतिक नियुक्तियां खेल की शुचिता को समाप्त कर रही हैं। यदि राज्यवर्धन सिंह राठौड़ वास्तव में राजस्थान को खेल हब बनाना चाहते हैं, तो उन्हें क्रिकेट को राजनीति के चंगुल से मुक्त कर चुनाव कराने होंगे और अपना ध्यान उन खेलों पर केंद्रित करना होगा जो आज भी सरकारी मदद की बाट जोह रहे हैं। खेल का मैदान प्रतिस्पर्धा के लिए होना चाहिए, न कि परिवारवाद और राजनीतिक पुनर्वास के लिए। आज राजस्थान की जनता और खिलाड़ी समुदाय यह पूछ रहा है कि क्या एक पदक विजेता के मंत्री रहते हुए भी खेल केवल राजनीति का गुलाम बना रहेगा? 

आने वाला समय और सरकार के फैसले ही तय करेंगे कि राजस्थान का खेल प्रशासन पेशेवर दिशा में मुड़ेगा या फिर यह केवल सत्ता के गलियारों का एक हिस्सा बनकर रह जाएगा। खिलाड़ी तो आज भी सुविधाओं और संसाधनों को तरस रहे हैं, जो सरकार को देने चाहिए, यह सरकार की ड्यूटी है, ना कि वैकल्पिक काम है। लेकिन खेलमंत्री राज्यवर्धन राठौड़ की कार्यशैली से ऐसा लगता है कि उनका मुख्य काम रीलबाजी करके जनता का ध्यान अपनी तरफ खींचना है। राठौड़ की तरह अन्य मंत्री भी आज अपने विधानसभा क्षेत्र तक सीमित दिखाई दे रहे हैं। पूरे प्रदेश के मंत्री होने के बावजूद अपने निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित होना यह जाहिर करता है कि इनके पास काम की कमी है, जिम्मेदारी का अभाव है, दिल्ली से मिलने वाले निर्देशों का इंतजार करते हैं और संभवत: मंत्रीमंडल के अधिकांश सदस्य अयोग्यताओं से लबरेज हैं, जिनको काम करना आता ही नहीं है।

यही वजह है कि अधिकांश मंत्री अपने स्टाफ से रीलें बनवाकर सोशल मीडिया के सहारे सस्ती लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं। बड़ी विडंबना है कि तीन बार के मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत को भी आज लोकप्रियता बनाने के लिए सोशल मीडिया की बड़ी टीम रखनी पड़ रही है। इस मामले में वसुंधरा राजे इनसे अलग दिखाई देती हैं, जो रीलबाजी करके सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में नहीं हैं। हालांकि, आलाकमान ने उनको सियासी गर्त में धकेल रखा है, जिसके चलने उनकी प्रतिभा का दमन हो रहा है। दुर्भाय है कि लंबे सियासी अनुभव वाली वसुंधरा राजे को सत्ता से पूरी तरह बाहर किया हुआ है। जबकि, सरकार को चाहिए कि पूर्व मुख्यमंत्रियों, पूर्व मंत्रियों के अनुभव का लाभ लिया जाए और प्रदेश के विकास में इनको भागीदार बनाया जाए। 

किंतु अनफोर्चुनेटली जब दिल्ली में बैठी टॉप लीडरशिप ही वसुंधरा राजे के बढ़ने वाले प्रभाव से डरती है तो प्रदेश की लीडरशिप को क्या दोष दिया जाए। एक जमाना था, जबकि पार्टीबाजी से उपर उठकर पुराने नेताओं से लीडरशिप राय लेती थी, सलाह को मानती थी, उनके अनुभव से राजस्थान को लाभ होता था, लेकिन अब परिस्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी हैं, अब लीडरशिप को डर लगता है कि कहीं ये लोग सत्ता में होवी हो गए तो क्या होगा? यही वजह है कि आज खेलों से लेकर राजनीति के किसी भी सैक्टर में अनुभवी, योग्य और काम करने वाले ईमानदार लोगों को सत्ता से दूर रखा जाता है। हालांकि, ये चीजें प्रदेश के भले के लिए नहीं हैं, लेकिन सत्ता की चाहत रखने वाले हमेशा इनसिक्योर होते हैं, उनको यही डर रहता है कि किसी योग्य को नजदीक ले लिया तो वो उसकी कुर्सी नहीं खा जाए।

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