Popular

मोसाद: दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी कैसे काम करती है?


भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाकर अजीत डोभाल ने 7 साल पहचान छुपा पाकिस्तान में रहकर जासूसी की, जिसके किस्से आज भी अक्सर आपको सुनने को मिल जाते होंगे। अजीत डोभाल तब भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के लिए काम करते थे, उनका वो कारनामा भारत को आतंकवाद से मुक्त करने के काम आया, लेकिन आपको शायद पता नहीं होगा कि दुनिया की सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी इस्राइल की मोसाद है और इसके अंडर कवर एजेंट्स कई देशों में 20, 30,40 साल तक गुजार देते हैं और किसी को भनक तक नहीं लगती। 

आज हम इसी मोसाद की बात करेंगे, जिसकी एक्जेक्ट इंफोर्मेशन के कारण महज 95 लाख आबादी का इस्राइल जैसा देश दर्जनभर से ज्यादा इस्लामिक देशों से लड़ रहा है। यही वो इंटेलीजेंस एजेंसी है, जिसके कारण एक झटके में ईरान के सभी टॉप कमांडर्स को मारकर इस्राइल बड़ा युद्ध जीतने की कगार पर खड़ा है।

पिछले वीडियो में मैंने आपको बताया था कि मोसाद ने सीआईए के साथ मिलकर ईरान में ओपरेशन मिडनाइड हैम्मर और ओपरेशन एपिक फ्यूरी कैसे पूरा किया। आज इस वीडियो में आपको बताने जा रहा हूं मोसाद की स्टार्टिंग, वर्किंग स्टाइल और सक्सेज ओपनेशंस की कहानी...........

तो बात तब की है, जब 1972 का म्यूनिख ओलंपिक चल रहा था। दुनिया ओलंपिक खेलों का जश्न मना रही थी, लेकिन एक रात, फिलिस्तीनी आतंकवादी संगठन “ब्लैक सितंबर” ने 11 इज़रायली एथलीट्स को बंधक बनाया और बेरहमी से मार डाला। इसके चलते पूरी दुनिया शोक में डूब गई, लेकिन इज़रायल ने शोक नहीं मनाया। उसने 'ब्लैक सितंबर' के आतंकवादियों की एक लिस्ट बनाई और अगले 20 सालों तक, उस लिस्ट का एक-एक नाम दुनिया के किसी भी कोने में काटा जाता रहा। यही है मोसाद, जिसने खुफिया जानकारियों से इस्राइल जैसे छोटे देश को दुनिया की टॉप कंट्रीज में खड़ा कर रखा है।

1949 में मोसाद तब आया, जब इज़रायल को आज़ाद हुए सिर्फ एक साल हुआ था। उसके चारों तरफ दुश्मन थे मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, इराक जैसे बड़े और खूंखार देश। इस्राइल छोटा देश था, उसकी फौज भी नई थी, संसाधन बहुत कम थे, लेकिन इज़रायल के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियन को पता था कि असली ताकत बंदूक में नहीं, जानकारी में होती है। तब उन्होंने एक ऐसी संस्था बनाई जो पर्दे के पीछे से दुनिया को बदल सके। इसका नाम रखा, हामोसाद लेमोडीन उलेतकफीदिम मेयूहादिम, यानी “खुफिया और विशेष कार्यों के लिए संस्था।” जिसे शॉर्ट में मोसाद कहा गया।

इसका हैडक्वार्टर राजधानी तेल अवीव में है। यह सीधे इज़रायल के प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है, किसी संसदीय समिति या किसी मंत्री को नहीं। इसका बजट गुप्त होता है, कर्मचारियों की संख्या गुप्त होती है और ऑपरेशन भी गुप्त ही होते हैं। अनुमान है कि इसमें 7,000 से 10,000 लोग काम करते हैं, लेकिन उनमें से ज़्यादातर की पहचान आज भी दुनिया को पता नहीं है।

मोसाद को तीन मुख्य स्तंभों से समझा जा सकता है।

पहला — Kidon, यानी “भाला”। यह मोसाद की सबसे खतरनाक और सबसे गुप्त इकाई है। इसका एकमात्र काम है टार्गेटेड हत्याएं करना। Kidon के ऑपरेटिव्स ऐसे ट्रेंड होते हैं कि वो किसी को भी, कहीं भी, बिना सबूत छोड़े खत्म कर सकते हैं।

दूसरा है— Caesarea। यह विदेशी धरती पर लंबे समय के ऑपरेशन चलाता है। इसके एजेंट्स किसी देश में सालों तक आम नागरिक बनकर रहते हैं, वहां दुकान चलाते हैं, सरकारी नौकरी करते हैं, उस देश के बड़े लोगों को दोस्त बनाते हैं, समाज में घुल-मिल जाते हैं और जब वक्त आता है, तो अपना असली काम करते हैं।

तीसरा — Tsomet। इसका काम है विदेशी नागरिकों को इज़रायल के लिए काम करने पर राज़ी करना। यानी, मोसाद के जासूस बनाना। इस काम में मोसाद को दुनियाभर में फैले Sayanim की मदद मिलती है, वे यहूदी नागरिक होते हैं, जो किसी भी देश में रहते हैं और स्वेच्छा से मोसाद की सहायता करते हैं। इनमें डॉक्टर, वकील, अधिकारी, बैंकर, होटल मालिक, कारोबारी जैसे सभी लोग शामिल होते हैं। बदले में ये कुछ नहीं माँगते, यही मोसाद की ideology की ताकत है।

म्यूनिख ओलंपिक जिनोसाइड के बाद प्रधानमंत्री गोल्डा मीर ने मोसाद को एक आदेश दिया कि “ब्लैक सितंबर” के हर सदस्य को ढूंढो और खत्म करो। चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में हो, इसके लिए चाहे जितना भी वक्त लगे। फिर शुरू हुआ Operation Wrath of God, जो इतिहास का सबसे लंबा और सबसे व्यवस्थित बदले का ऑपरेशन माना गया। रोम में एक आतंकी को गोली मारी गई। 

पेरिस में एक को बम से उड़ाया गया। बेरूत में एक साथ तीन PLO कमांडर्स के अपार्टमेंट में घुसकर उन्हें मार दिया गया और इज़रायली कमांडो वहाँ से सुरक्षित निकल भी गए। एक बार नॉर्वे के छोटे से शहर Lillehammer में मोसाद ने गलती से एक बेगुनाह मोरक्कन वेटर को मार दिया, जिसे वो फ़िलिस्तीनी कमांडर अली असन सलामेह समझ बैठे थे। यह मोसाद की सबसे बड़ी सार्वजनिक गलती थी, लेकिन सलामेह को आखिरकार 1979 में बेरूत में कार-बम से खत्म कर दिया गया।

एडोल्फ ईचमैन वो Nazi अधिकारी था, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लाखों यहूदियों को मौत के घाट उतारने का काम किया था। युद्ध खत्म होने के बाद वो अर्जेंटीना में “रिकार्डो क्लेमेंट” नाम से एक आम इंसान की तरह ज़िंदगी जी रहा था। मोसाद ने 10 साल की तलाश के बाद उसे ढूंढा। अर्जेंटीना सरकार को बताए बिना अर्जेंटीना की धरती पर उसे अगवा किया। इज़रायल लाया गया, उसपर मुकदमा चला और 1962 में उसे फाँसी दे दी गई। यह इतिहास का पहला सफल स्टेट-फंडेड इंटरनेशनल किडनैप था।

Operation Entebbe — 1976 में एयर फ्रांस का एक विमान हाईजैक कर युगांडा के एनटेबे एयरपोर्ट पर ले जाया गया, जहां 102 यहूदी यात्रियों को बंधक बनाया गया। तानाशाह आदी अमीन ने आतंकियों का साथ दिया। इज़रायल से एयरपोर्ट की दूरी थी 4,000 किलोमीटर। मोसाद ने बिना एक बार भी युगांडा की ज़मीन पर पैर रखे खुफिया तरीके से एयरपोर्ट का पूरा नक्शा, सुरक्षा की तैनाती और आतंकियों की दिनचर्या इकट्ठा की। फिर इज़रायली कमांडो रात के अंधेरे में उतरे और सिर्फ 53 मिनट में सभी बंधकों को छुड़ा लिया। इस ओपरेशन का नाम था ओपरेशन एनटेबे, जिसमें सिर्फ एक इज़रायली सैनिक शहीद हुआ, उसका नाम था कमांडर योनातन नेतन्याहू, जो आज के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बड़े भाई थे।

मोसाद नये हथियारों का सबसे पहले प्रयोग करती है। 2010 में दुनिया ने पहली बार एक ऐसा हथियार देखा, जिसने warfare की परिभाषा बदल दी। टक्सनेट एक computer worm था, जिसने ईरान के नातांज़ परमाणु संयंत्र की 1,000 से अधिक सेंट्रीफ्यूज को बिना किसी बम के, बिना किसी सैनिक के अंदर से तोड़ दिया।

यह worm इतना सटीक था कि सिर्फ उन्हीं मशीनों को निशाना बनाता था, जो सीमेंस के एक विशेष software पर चलती थीं और वो भी तब, जब उनकी गति एक खास सीमा पर हो। बाकी सब computers इससे बिल्कुल अछूते रहे। माना जाता है यह मोसाद और CIA का संयुक्त ऑपरेशन था। मोसाद ने इससे ईरान का परमाणु कार्यक्रम कई साल पीछे धकेल दिया। इस ओपरेशन में एक भी सैनिक नहीं मरा, एक भी मिसाइल नहीं चली। यह 21वीं सदी के युद्ध का नया चेहरा था।

दुनियाभर में 57 इस्लामिक देशों से दुश्मनी झेल रही मोसाद सिर्फ एक खुफिया एजेंसी नहीं है, यह एक रिसर्च की फिलोस्फी है। उस देश की फिलोस्फी, जिसने Holocaust जैसा महादंश झेला, जिसे नक्शे से मिटाने के लिए नाजियों और इस्लामिक टैरेरिस्ट द्वारा बार-बार कोशिश की गई, और फिर उसने एक लाइन के बाद तय किया कि अब कभी नहीं। इस्राइल के लिए मोसाद ने एक नारा दिया, “Never Again”,  यह सिर्फ नारा नहीं, मोसाद की operating procedure है, जिसे मोसाद का हर एजेंट अंतिम सांस तक जीता है, चाहे वो दुनिया के किसी भी कोने में बैठा हो।

Post a Comment

Previous Post Next Post