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अमित शाह का दावा और शुभेंदु अधिकारी की शपथ पूरी


जिस पार्टी ने पूरे 15 साल तक एकछत्र राज किया, सत्ता से बाहर होते ही महज 30 दिनों के भीतर वो ताश के पत्तों की तरह कैसे ढह सकती है? एक महीने पहले सत्ता गई, फिर पार्टी गई और अब चुनाव चिन्ह बचाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र में जो हाल उद्धव ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की एनसीपी का हुआ था, आज बिल्कुल वही इतिहास बंगाल में दोहराया जा रहा है! ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल हुए अभी एक महीना ही बीता है कि उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस दो फाड़ हो चुकी है। हालात ये हो गए हैं कि ममता बनर्जी को आज अपने हाथों से बनाया चुनाव चिन्ह तक अपने पास रखने के लिए जोड़तोड़ करनी पड़ रही है।

टीएमसी के बागी नेता ऋतुब्रत बनर्जी ने 58 विधायकों के समर्थन का पत्र स्पीकर को सौंपकर पार्टी पर ही कब्जा जमा लिया है। ममता बनर्जी को देश में दीदी के नाम से जाना जाता है, लेकिन इसी दीदी ने जिस शोभनदेव बंधोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाया था, स्पीकर ने उन्हें दरकिनार कर ऋतुब्रत बनर्जी को 'नेता प्रतिपक्ष' की मान्यता दे दी है। बंगाल की 293 सीटों पर हुए चुनाव में 207 सीटें जीतकर मुख्यमंत्री बने शुभेंदु अधिकारी की वो कसम सच हो गई है, जो उन्होंने दीदी को हराने के लिए खाई थी!  आखिर टीएमसी के अंदर यह बगावत कैसे हुई? कैसे एक 'नकली हस्ताक्षर' ने पूरी पार्टी तोड़ दी? और कैसे ममता बनर्जी का 'भतीजा मोह' उनके ही राजनीतिक पतन का कारण बन गया? आइए, आज इस पूरी 'इनसाइड स्टोरी' में अमित शाह के दावे और शुभेंदु अधिकारी की शपथ का लाइव पोस्टमार्टम करते हैं! 

राजनीति में कोई भी मुलाकात इत्तेफाक नहीं होती। टीएमसी के टूटने की कहानी भी यूं ही नहीं हुई है। कहानी की असली स्क्रिप्ट लिखी गई 22 मई को दिल्ली के बंग भवन में, जहां बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी और टीएमसी नेता ऋतुब्रत बनर्जी के बीच एक 'अचानक' मुलाकात हुई थी। इस मुलाकात के कुछ ही दिन बाद बंगाल विधानसभा में भूचाल आया। 

इस विवाद की शुरुआत होती है ममता बनर्जी की एक चिट्ठी से। टीएमसी आलाकमान ममता बनर्जी ने शोभनदेव बंधोपाध्याय को पश्चि बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाने का पत्र स्पीकर को भेजा, लेकिन ऋतुब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने सियासी बम फोड़ते हुए दावा किया कि उस पत्र पर उनके और कई साथी विधायकों के 'हस्ताक्षर नकली' हैं! बौखलाई ममता बनर्जी ने तुरंत एक्शन लिया और ऋतुब्रत को पार्टी से निकाल दिया, लेकिन दीदी यह भूल गईं कि चुनाव हारने के बाद पार्टी पर उनकी पकड़ ढीली हो चुकी है। ऋतुब्रत बनर्जी ने पलटवार किया और टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों की परेड करा दी। दलबदल कानून के तहत पार्टी तोड़ने के लिए दो-तिहाई, यानी 53 विधायकों की जरूरत होती है, और बागी गुट के पास 58 विधायक मौजूद हैं। स्पीकर ने भी देर नहीं की और बागी गुट को ही असली विपक्ष मानकर ऋतुब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर बिठा दिया। ऋतुब्रत बनर्जी ने टीएमसी पार्टी और चुनाव चिन्ह पर भी दावा ठोक दिया है। 

सवाल यह उठता है कि 55 साल की मेहनत से देश की राजनीति में अपना विशेष मुकाम बनाने वाली ममता बनर्जी आज इतनी कमजोर कैसे हुईं कि अपने हाथों से बनाया चुनाव चिन्ह तक बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। इसको समझने से पहले वो कहानी समझते हैं, जहां से ममता बनर्जी का सियासी उदय हुआ था। 

दरअसल, 1970 के दशक में पश्चिम बंगाल की राजनीति में वामपंथ जबरदस्त तरीके से पैर पसार रहा था। तब ममता ने खुद को वामपंथ विरोधी मुख्य चेहरे के रूप में स्थापित किया। 70 के दशक में युवा कांग्रेस कार्यकर्ता ममता बनर्जी अपने आक्रामक तेवरों के लिए जानी जाने लगी थीं। एक बार कोलकाता में कांग्रेस विरोधी प्रदर्शन के दौरान उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री और वामपंथी नेता ज्योति बसु के काफिले को रोककर उनकी कार के बोनट पर चढ़ गईं। यह तस्वीर और खबर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनीं। ममता के इस साहसिक विरोध ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का ध्यान आकर्षित किया। इस घटना के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें एक जुझारू और निर्भीक युवा नेता के रूप में पहचानना शुरू किया। इंदिरा गांधी ने उनको दिल्ली बुलाया और तारीफ करी।

इसके बाद उन्होंने कांग्रेस के लिए बंगाल में खूब काम किया। उनका पहला बड़ा सियासी मोड़ 1984 के लोकसभा चुनाव में आया, जब उन्होंने जादवपुर सीट से वामपंथ के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर सबको चौंका दिया। इस ऐतिहासिक जीत ने उन्हें रातों-रात राष्ट्रीय स्तर पर 'जायंट किलर' के रूप में पहचान दिलाई। ममता के आक्रामक रवैये के कारण वामपंथी सरकार ही नहीं, बल्कि कांग्रेस को भी कई तरह की दिक्कतें होने लगी थीं। ममता अपने आक्रामक रुख पर कायम थीं, लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं चाहती थी। इसलिए 90 के दशक तक ममता को लगा कि बंगाल कांग्रेस, सत्ताधारी सीपीएम के खिलाफ ढुलमुल रवैया अपना रही है। उन्होंने प्रदेश कांग्रेस पर "वामपंथियों की बी-टीम" होने का आरोप लगाया। सोनिया गांधी से मिलीं, लेकिन उन्होंने ममता बजर्नी को बंगाल में अपने हिसाब से राजनीति करने की छूट नहीं दी। इससे नाराज होकर ममता ने 22 दिसंबर 1997 को कांग्रेस छोड़ दी। फिर 8 दिन बाद 1 जनवरी 1998 को ममता​ बनर्जी ने 'तृणमूल कांग्रेस' की नींव रखी। 1999 की एनडीए सरकार के साथ गठबंधन किया और वाजपेयी सरकार में देश की पहली महिला रेल मंत्री बनकर उन्होंने बंगाल के लिए कई बड़े प्रोजेक्ट्स शुरू किए, इससे बंगाल में उनका कद काफी मजबूत हुआ। 

2004 में केंद्र की सत्ता यूपीए के पास जा चुकी थी। इसलिए ममता के लिए फिर से बंगाल में धमाल मचाने का मौका आ चुका था। ममता लगातार वामपंथी सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रही थीं, लेकिन उनके उदय का सबसे निर्णायक अध्याय भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन था। सिंगूर में टाटा के नैनो प्रोजेक्ट और नंदीग्राम केमिकल हब में किसानों की ज़मीन लिए जाने के खिलाफ उन्होंने सड़क से संसद तक उग्र आंदोलन किया। 'मां, माटी, मानुष' के नारे ने वामपंथ के पारंपरिक वोट बैंक को पूरी तरह ममता की ओर मोड़ दिया। इसी जन-आंदोलन की बदौलत 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने बंगाल में वामपंथ के 34 साल पुराने ऐतिहासिक शासन को उखाड़ फेंका और सत्ता हासिल की। इसके बाद ममता ने बंगाल में लगातार 3 चुनाव जीतकर 15 साल शासन किया। बंगाल में आज जो शुभेंदु अधिकारी सीएम बने हैं, वो 2016 से 2021 के शासन के दौरान उनके सबसे करीबी मंत्री थे, लेकिन उस दौरान ममता ने अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को शुभेंदु अधिकारी से ज्यादा त्वज्जो देना शुरु कर दिया, जिससे नाराज होकर अधिकारी टीएमसी छोड़कर भाजपा ज्वाइन कर ली। पांच साल तक नेता प्रतिपक्ष बनकर अधिकारी टीएमसी सरकार की पोल खोलने और आंदोलन करने में अपनी जान झौंक दी।

आज जो पार्टी टूट रही है, उसे ममता बनर्जी ने अपने खून-पसीने से सींचा था। सिंगूर और नंदीग्राम के ऐतिहासिक किसान आंदोलनों ने दीदी को बंगाल की 'स्ट्रीट फाइटर' बना दिया था। 2011 में सत्ता मिलते ही टीएमसी का डीएनए बदलने लगा। जिस जनता ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया था, वही जनता 2025 आते—आते पार्टी नेताओं के 'कटमनी' और 'सिंडिकेट राज' से त्रस्त हो गई। आवास योजना से लेकर राशन वितरण तक, हर जगह टीएमसी के स्थानीय नेताओं की उगाही का बोलबाला हो गया। कोयला घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला और संदेशखाली जैसी घटनाओं ने बंगाल के लोगों के मन में टीएमसी के प्रति गहरा आक्रोश भर दिया। इसी जनता के गुस्से को भाजपा ने भुनाया और 2026 के चुनाव में 207 सीटों का प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया। लेकिन पार्टी के टूटने का सबसे बड़ा कारण चुनाव हारना नहीं, बल्कि 'भतीजावाद' है। टीएमसी के तमाम दिग्गज नेताओं की सबसे बड़ी टीस ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी थे। पार्टी के पुराने और संघर्षशील नेताओं को दरकिनार करके अभिषेक बनर्जी को अघोषित रूप से टीएमसी का 'सुप्रीमो' बना दिया गया। 

ऋतुब्रत बनर्जी ने बगावत करते ही जो सबसे पहली बात कही, वो इसी दर्द को बयां करती है। बागियों ने कहा कि "हम ममता बनर्जी को आज भी अपना मार्गदर्शक मानते हैं, लेकिन अभिषेक बनर्जी से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। वो पार्टी को एक कॉर्पोरेट कंपनी की तरह चला रहे थे।" यही वजह है कि 58 विधायकों ने अभिषेक के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। चुनाव की करारी हार ने इन विधायकों को यह साफ कर दिया था कि अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है।  याद कीजिए 2021 का विधानसभा चुनाव, जब एक बार ममता बनर्जी ने अहंकार में कहा था कि अमित शाह कौन है? जबकि उस दौरान अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। तब अमित शाह ने एक रैली में सीना ठोक कर कहा था कि वो एक छोटे से कार्यकर्ता के रूप में बंगाल से टीएमसी को उखाड़ फेंकने आए हैं। आज वो कसम पूरी होती नजर आ रही है। 

कभी ममता के सबसे बड़े रणनीतिकार रहे शुभेंदु अधिकारी, आज बीजेपी की तरफ से सीएम बनकर टीएमसी के ताबूत में आखिरी कील ठोक रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी से टीएमसी का चुनाव चिन्ह 'जोड़ा फूल' छिन जाएगा?विधायकों का दो-तिहाई आंकड़ा ऋतुब्रत बनर्जी के पास है। चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक अगर बागी गुट असली टीएमसी होने का दावा ठोकता है, तो शिवसेना और एनसीपी के बाद तृणमूल कांग्रेस देश की तीसरी ऐसी बड़ी पार्टी होगी, जिसकी संस्थापक से ही उसका चुनाव चिन्ह छिन जाएगा। 

यदि चुनाव आयोग ने टीएमसी का चुनाव चिन्ह बागी गुट को दे दिया तो 15 साल का राज, एक महीने में खाक होने की कहानी साकार हो जाएगी! शुभेंदु अधिकारी की शपथ पूरी हो जाएगी और अमित​ शाह का दावा सच हो जाएगा। राजनीति का यही वो क्रूर सच है जो बताता है कि जब जनता का भरोसा टूटता है और नेताओं का अहंकार बढ़ता है, तो बड़े-बड़े किले ढहने में वक्त नहीं लगता। आपको लगता है ममता बनर्जी इस राजनीतिक चक्रव्यूह से अपनी पार्टी को बाहर निकाल पाएंगी? या बंगाल में टीएमसी हमेशा के लिए इतिहास बन जाएगी? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर बताएं!

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